Saturday, 14 February 2015

विसर्जन



सरस्वती प्रतिमाओं का विसर्जन देख कर आ रहा हूँ.रविवार को मूर्तियों का भसान नही होता,इसलिए बनारस के कई घाटों पर आज हुआ भसान.देवी प्रतिमा का विसर्जन भी क्या खूब होता है.सबके कलेजे को दहलाता हुआ डीजे धांय-धांय बजता है और लड़के नाचते हैं.इतना बड़ा शोर,रंग गुलाल और भंग की तरंग में डूबी इन टोलियों में हर जगह केवल लड़के ही पाए जाते हैं.बड़े बुजुर्ग,वरिष्ठ नागरिक और तमाम सामाजिक लोग इन आयोजनों से प्रायःअनुपस्थित ही रहते हैं.महिलायें..जिनका आस्था की दुनिया में बड़ा नाम है,वे देवी की मूर्तियों का साथ केवल मंडप तक ही देती हैं.मूर्ति खरीद कर लाने का जिम्मा भी इन लडको का और उसे भसाने का जिम्मा भी इन लडको का ही होता है.मूर्ति के खरीदकर आने पर लोढ़ा और मूसल से स्वागत करने से लेकर विसर्जन के दिन मूर्ति उठते समय तक महिलाओं की यह आस्था हिलोरें लेती रहती है..दो या तीन दिन बाद जब मूर्ति उठती है तो उस दिन देवी की विदाई का दिन होता है.सारा पुण्य-व्यापार निपटा लेने के बाद यह तय पाया जाता है कि धर्म में मनाही है--महिलायें शव के पीछे कैसे चल सकती हैं भला.ये तो श्मशान यात्रा है.जन्म देने वाली स्त्री को मृत्यु की साक्षी बनने से दुनिया का हर धर्म रोकता है.लेकिन मुझे लगता है कि स्त्री को मरघटों पर जरूर होना चाहिए.जीवन के सबसे बड़े संत्रास में करुणा के सबसे गहरे स्रोत के मौजूद होने से मौत की भयावहता थोड़ी तो कम जरूर हो जायेगी.इसीलिए मै तो चाहता हूँ कि मेरे श्मशान (जब कभी मिले.. smile emoticon )पर स्त्री,पुरुष,बाल,वृद्ध सभी पहुंचें..!
खैर....तो देवी की प्रतिमाओं से महिलाओं का राम-राम देवी-मंडप से ही हो जाता है.बचे बडके-बुढवे,आलिम फाजिल लोग तो ये लोग पूजा और परसादी से ही मतलब रखते हैं बस.बाकी की व्यवस्था में बिलकुल इंटरेस्ट नही लेते.ये लोग गाँव मुहल्ले में ही खड़े होकर अपने लडको को नशे में नाचते हुए देख कर तसल्ली कर लेते हैं.उसके बाद नदी के घाट तक की पूरी सड़क इन लडको की होती है.डीजे की धांय-धांय और बजते हुए कानफोडू गानों के बीच बाकी जिंदगियों को रोक लेते हैं ये लडके.सड़क जाम कर देते हैं और ये खुद भी नही जानते,ऐसे-ऐसे सूक्ष्म नुकसान कर रहे होते हैं,कि जिनपर कोई ध्यान भी नही देता..
गंगा में वरुणा जहाँ मिलती है,वहां चूंकि केवल मल और रासायनिक कचरा ही गिरता है,इसलिए गंगा का पानी यहाँ बिलकुल काला है.बिलकुल किनारे पर जाकर बैठिये तो पहले मछलियां आकर दाने चुगती दिखायी पडती थीं.दशाश्वमेध से लेकर इधर पंचगंगा और प्रह्लादघाट तक मछलियाँ अभी भी किनारों पर आती हैं...दिखती हैं... और दाने चुगती हैं.लेकिन आदिकेशव घाट के पास संगम पर पक्की सीढियाँ नही हैं.यहाँ नाविकों के आलावा कोई नही आता.लेकिन आज उधर देखा तो साइबेरियन पंछी भी दिखे.बीच गंगा में तैरते हुए दो ढाई सौ की संख्या में 'दाना चुगो जुलूस' निकाल रक्खा है.हमने आवाज़ दी तो वे पास चले आये.गज़ब की उड़ान लेते हैं वे.ऐसा नही कि सीधे उड़ कर आपके पास चले आयेंगे.किसी हेलिकॉप्टर की तरह बिलकुल आपके सामने से पहले दूर जाते हैं फिर घूम कर खूब बड़ी सी त्रिज्या में कई वृत्त,कई शंकु और कई बेलन बनाते हुए लौटते हैं.फिर सांय-सांय करते आपके पास चले आते हैं वे.घाट से लगभग दस फुट दूर संगम के काले पानी में झुण्ड में बैठते हैं.छप-....छप....-छप...-छप-....छप...! हिंदी समझते हैं वे--आओ आओ...की आवाज़ पर वे हर किसी के पास पहुँचते हैं.हम उन्हें दाने खिला रहे थे.अत्यंत सुरम्य और आध्यात्मिक वातावरण की रचना की थी प्रकृति ने.सारे मल्लाह नाविकों,घाट के दुकानदारों और घुमंतुओं के साथ कुल 25-30 आदमी रहे होंगे.जब पारिस्थितिकी तंत्र इस तरह साँसे ले रहा था.मौसम की इस अंतिम बारिश में जीवन के इस स्वाभाविक विकास की गति को रोक देने वाली डीजे की तीक्ष्ण ध्वनि प्रकृति के कानों में पड़ती है.और अपना सारा जाल समेट लेती है वो...पंछी सारे भाग चले.गिनी चुनी मछलियों ने गहराई में गोंते लगा लिए.फिर हम बुलाते ही रह गये,कोई नही लौटा.
गंगा और वरुणा जहाँ मिलकर खून के आंसू रो रही हैं,वहीँ....,ठीक वहीँ...संस्कृति अपना केचुल उतारने साल में कई बार आती है..दो मुर्दा देहों पर एक तीसरी मुर्दा देह छपाक की आवाज से गिरती है.प्रतिमा विसर्जन हो रहा है..संस्कृति की रक्षा हो रही है....!!

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