Saturday, 14 February 2015

धर्म,धर्म की दुकाने और धर्म की किताबें...

धर्म,धर्म की दुकाने और धर्म की किताबें...ये सब आसमानी बातें हैं.धर्म शब्द का महत्व अपने आप में यदि कुछ है तो उसका सीधा सम्बन्ध हमारे कर्त्तव्य,हमारी सोच व हमारे आचरण से है.बाकी तो केवल बताया भर जाता है कि धर्म के प्रतिष्ठान ज़िन्दगी को जीना सिखाते हैं.बताया यह भी जाता है कि धर्म की किताबों में ज़िन्दगी के ढंग लिखे गये है.श्रीमद भागवत पुराण के पहले ही पृष्ठ पर बारहवें और तेरहवें श्लोक में ये घोषणा की गयी है कि जिस मनुष्य के घर में भागवत शास्त्र मौजूद नही है,उसे वैष्णव नही समझा जा सकता.उसे यमराज के पाश से मुक्ति नही मिल सकती.यूंकि जैसे जिनके घर में भागवत पुराण होता है,उनको यमराज के पाश से मुक्ति मिल ही जाती है और वे अमर हो जाते हैं.गरुण पुराण मरण के महात्म्य का पुराण है.उसमे ढपोरशंखी कल्पनाएँ है.अनुगामी और पाठक को यह पुराण इतना हडकाता है कि अगर दूर से कोई सुन भी ले तो कभी पढने की जुर्रत नही करेगा.यह कट्टरता का तत्व है जो हमारे ग्रंथों में साफ़ दिखाई देता है.अब कौन सोचे कि ये किताबें हमें ज़िन्दगी जीने के तरीके कैसे बतायेंगी भला..! इन्ही किताबों में ईश्वर क्या कहता है,मनुष्यों की दुनिया को कैसा देखना चाहता है,यह भी बताया गया है.लेकिन ईश्वर जो चाहता है,वह बताने के बाद ये किताबें वो सब कुछ बोलने लगती हैं,जिनके बारे में यही किताबें बताती हैं कि ईश्वर ऐसा नही चाहता.समूह में ज़िन्दगी जीने के ढंग बताने के लिए मनुष्यों की दुनिया ने अपने-अपने संविधान लिख रखे हैं.जिन्हें अपने-अपने समय में अपने-अपने देशों के अपने-अपने मनीषी विद्वानों ने लिखा है.बदलते हुए समय चक्र के साथ ज़िन्दगी के ढंग भी बदलते चले गये और मनुष्य ने अपनी-अपनी सुविधा के मुताबिक़ उनमे अनेक अमेंडमेंट कर डाले.आधुनिक समय में ज़िन्दगी जीने का ढंग बताने वाली अपनी लिखी संविधान की इन किताबों में जब इतने अमेंडमेंट जेनुइन माने जाते है,तो सवाल है कि धर्म की इन आसमानी किताबों में अमेंडमेंट क्यों नही किया जाना चाहिए,जिनसे अपने-अपने जीवन के लिए प्रबल आस्था भाव से लोग अब भी निर्देश ग्रहण करते हैं...????

No comments:

Post a Comment