(अस्सी का गला घोंटने की तैयारी,जान खतरे में.)
बनारस क्योटो बन रहा है.अभी तक चारो तरफ लोगो में,अखबारों में,चैनलों पर एक ही चर्चा थी--ये होगा....,वो होगा....,पुल बनेगा.....सड़क बनेगी...,मेट्रो चलेगी....,स्मार्ट सिटी बनेगी....,घाट संवरेंगे......,कचरा गाडी हुई गंगा में फिर से अमृत बहाया जाएगा.....और उस अमृत की धारा में जल परिवहन होगा.फिर बनारस क्योटो बन जायेगा.अभी ये जानकर कि इस स्थायी भाव 'होगा' के होते हुए बनारस को क्योटो बनाने का काम शुरू भी हो गया है,बड़ा अच्छा लगा .वैसे बनारस को क्योटो बनाने का विरोध बहुत हुआ,जिसमे नगर के धार्मिक व सांस्कृतिक स्वरुप को बचाए रखने की मांग शामिल थी.लेकिन इसके बाद का दृश्य देखने लायक है,देखने लायक ये है कि दो धुर विरोधी राजनीतिक दलों की सरकारें भी कैसे मिल कर काम करती हैं,तब जब उनके हित समान होते हैं.बनारस को क्योटो बनाने की ये कला देखने लायक है.आइये चलें अस्सी...! अस्सी तो आप सभी जानते होंगे.बनारस में अस्सी तब से है जब से बनारस है क्योंकि इसीलिए तो बनारस बनारस है.वरुणा और अस्सी बनारस की पहचान के लिए दो ज़रूरी नदियाँ हैं और दोनों का ही अस्तित्व खतरे में है.पिछले दिनों हम लोगों ने अस्सी को बचाने के लिए कुछ ज़बरदस्त प्रदर्शन व प्रयास किये थे.साथियों ने पूरी तरह गंदे नाले में तब्दील हो चुकी अस्सी नदी में घुसकर घंटों तक मल और मैला साफ़ किया था.एक तरफ वरूणा है,जो फैक्टरियों का केमिकल वेस्ट पीकर नाला हुई है,दूसरी तरफ अस्सी है,जो लोगों का सीवर ढोकर गन्दी नाली में तब्दील हुई है.फादर आनंद,आनंद प्रकाश तिवारी,ब्रजभूषण दुबे और वल्लभाचार्य पाण्डेय जैसे समाजसेवियों के साथ सैकड़ों लोगों के एकसाथ गंदे पानी में उतरने से समाज में हलचल बढ़ी और सरकारों ने भी आन्दोलन से अपनी सहमति जताई.सोशल मीडिया पर भी आप सब ने अस्सी के पक्ष में अपना ज़बरदस्त समर्थन दिया.स्थानीय जनसमर्थन भी बढ़ने लगा लेकिन इधर......!
इस 'होगा-होगा' के बीच जो चुपचाप 'हो' गया,वो सब तो इसके बाद ही हुआ.हुआ ये कि पानी में उतरने के बाद अपनी पोस्ट्स में मैंने साकेत नगर कॉलोनी का ज़िक्र किया था,जिसके तुरंत बाद अस्सी नदी गंगा में उतर जाती है.एकतरफ प्रदेश व देश की सरकारें सार्वजनिक बयान दे रही हैं और हुंकार भर रही हैं कि गंगा और वरुणा को बचाने के लिए सबकुछ किया जाएगा.. हालांकि ये सभी समझते हैं कि इस 'सबकुछ' का मतलब एक बड़े से बजट के अलावा और कुछ नही होता है.ऐसा बोलकर सरकारें जनता से बताती हैं कि हम आपकी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा सा हिस्सा वरुणा और अस्सी के नाम पर अवमुक्त करने वाले हैं और उस पैसे पर मौज करने वाले हैं.दूसरी तरफ....,यानी अंदरखाने...,यानी कि मौके...पर हो ये रहा है कि नदी के विशाल पाटों पर सालों से काबिज पॉश अवाम नदी की छाती पर चढ़कर उसका खून पी रही है.हम लोगों ने आन्दोलन के समय ही नदी की ज़मीन की पैमाइश की मांग की थी.सीधे स्थानीय पीएमओ और सम्बंधित विभागों व सरकारों को पत्र भेजे गये थे,शिकायत की गयी थी,नदी को जिंदा करने की मांग लिखी गयी थी.ऐसा मानते हैं कि कोई भी नदी अधिकतम बाढ़ के समय अपने मध्य में जिस उच्चतम बिंदु पर होती है,उसके 500 मीटर दोनों तरफ नदी की अपनी ज़मीन होती है.जैसे हमारी आपकी खसरा-खतौनी होती है,उसी तरह नदियों की भी खसरा-खतौनी होनी चाहिए.ये उसकी अपनी निजी ज़मीन होती है.ये ज़मीन नदी की अपनी मिल्कियत,अपनी जागीर होती है.नदियाँ जब सामान्य दशा में होती हैं,उस समय निचाट मैदानों में उनके पाटों पर भूमिहीनों को खेती करते देखा जा सकता है.यहाँ तक तो फिर भी ठीक है,क्योंकि बाढ़ के समय नदियाँ अपनी ज़मीन वापस पा लेती है.लेकिन वही नदियाँ जब शहरों में पहुँचती हैं,तो वे विकास की भेंट किस तरह चढ़ती हैं,अस्सी उसका ज़बरदस्त उदहारण है.दशकों से कितने ही सीवर उसमे गिराए जा रहे हैं,कितने ही स्ट्रक्चर उसपर बनाये जा रहे हैं.गाँवों में तो पोखरे और तालाब पाट लेते हैं लेकिन शहरों में तो नदी तक पाट लेते हैं लोग.कूड़े और गन्दगी पाट-पाट कर मकान खड़े कर लिए,दुकाने खडी कर लीं,होटल बना दिए.पुलिया बिछा कर सड़कें बना लीं.गजब की दयानत है..! साकेत नगर में गुप-चुप ढंग से पाइप्स गिरा कर अस्सी को तीन फुट की नाली बनाकर बहाने की कोशिश में तंत्र का हर हिस्सा लगा हुआ है.नगर निगम तो साक्षात सामने है.प्रदेश सरकार ने वरुणा और अस्सी को जिंदा रखने का बीड़ा उठा ही रखा है,लेकिन बनारस को क्योटो तो केंद्र सरकार ही बना रही है.यह बात अब धीरे धीरे आम हो चुकी है कि अस्सी के ऊपर पाइप्स डालकर साकेत नगर में सड़क बनेगी.लोग आन्दोलित हो रहे है..अब आप और हम यह तय करने के लिए स्वतन्त्र हैं कि अस्तित्व ज़रूरी है या विकास..??नदी ज़रूरी है या सड़क..?? काशी उतावली हो रही है.बनारस को क्योटो क्यों बनाया जा रहा है.??
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