Saturday, 14 February 2015

एक सर्द रात और पल भर का साथ.....पथरु



तारीख 14/15 जनवरी-2015.आधी रात को नीद खुल गयी.देखा तो घर के बाहर ठंड अपने शवाब पर है.कहती है आज तो मै ही रहूंगी.इधर कई सालों में बनारस की शायद सबसे ज्यादा सर्द रात है.रुई की शक्ल में बर्फ उड़ रही हो जैसे.ठीक-ठीक बर्फ न भी हो,लेकिन ये जो कुछ भी है,बर्फ ही का रॉ मटेरियल है.अब इसकी नियति ही है बर्फ हो जाना.सनसनाती हुई तीखी हवा उत्तर से आती है.वरुणा के ठीक ऊपर से...घर के सामने अशोक के पेड़ कतार में चींख रहे हैं.पूरा बाहरी बरामदा जैसे खामोश बरसती हुई शांत बारिश में नहाया हुआ है.बाहर कदम रक्खो तो चप्पल का निशान पड़ता जाता है.सर्द शबनमी बारिश ने पूरी रात नहलाया है फर्श को.जैसे फर्श चप्पल के निशान पकड़ लेता है,वैसे ही मै लिपट जाता हूँ इस शोर मचातीं हुई रात से.सामने से गुजरती हुई जीटी रोड पर सन्नाटा है.यह घनत्व पाने के लिए ठंढ महीने भर से जतन कर रही है.आलू की फसल मुरझाई पड़ी है,मटर ऊपर उठती ही नही जैसे,किसान को खेती में अभी गेहूं सींचने के आलावा कोई काम नही है.धूप का इंतज़ार बस सभी को है.लेकिन शवाब के पास असवाब अभी ज्यादा है.ठंढ इतनी जल्दी नही रुकेगी,अभी जिंदगियां सिकुड़ी ही रहेंगी.अभी घुटनों की जकड़न नही टूटेगी.अभी सिहरता हुआ पूरा वातावरण गलने में समय लगेगा.लेकिन अगर जीवट हो तो जिजीविषा चुनौती लेना जानती है.ऐसे में कि टेम्परेचर जब एक डिग्री के आस-पास है,रात ऐसी अंधियारी है,हवा ऐसी मतवाली है और वातावरण मौसम के वजन से इस तरह टूट रहा है,प्रकृति की इस पूरी बुनावट के खिलाफ पथरु तब भी चला जा रहा है.
लेकिन कुछ ज्यादा ही भीगी हुई सड़क पथरु की पदचाप नही पकड़ पाती क्योंकि उसके पाँव में चप्पल नही है.ये उसकी बारहों महीने की इस सड़क पर नियमित उपस्थिति है.बारह बजे रात के आस पास पथरु अपनी दो छोटी बच्चियों को उनकी माँ के पास छोड़ने घर जाएगा फिर लौटते हुए वहां धोबी घाट में अपनी गुमटी पर सो जाएगा.लगभग इसी तरह बारह बजे दिन के आस पास उन्हें माँ के पास से ले आने भी जाता है,दिन भर उन्हें दूकान पर रखता है और पढाता है.इस आने जाने में एक तमाशा भी होता चलता है,लेकिन ये ग़ज़ब का तमाशा है.कोई देखता है कोई देखता ही नही.उसके दोनों हाथ नही है.उसकी बेटियां बाप का हाथ पकड कर चलना चाह रही हैं..वो अपने गले में एक लम्बा सा गमछा लटका लेता है और दोनों तरफ गिरा देता है.बेटियां गमछे का दोनों छोर पकड़ कर चलती हैं.कभी कभी वे उस पर झूला भी झूलती हैं.मनुष्य की सभ्यता जिस दौर में है वहां इस 'तमाशे' को देखने के लिए ठिठकने भर का समय किसी के पास नही है .एक अजीब बात ये होती है कि जब कभी आमने सामने होने पर वो पूरे अदब से सिर झुकाता है,तब देखता हूँ उसके कुल शरीर की भंगिमा ऐसी हो जाती है जैसे वो हाथ जोड़ने की कोशिश भी कर रहा हो.मुझे उसके हाथ दिखने लगते हैं.मै निश्चित तौर पर बता सकता हूँ कि जितना सम्मान वह मेरे प्रति दिखाता है उससे कम सम्मान मेरे मन में भी उसके लिए नही है.ये भी एक तमाशा ही है,जो हर बार मेरी आँखों से होकर गुजरता है.पथरु का सारा जीवन अपने संघर्षों की आग में तपने की गाथा है.उसे ठंढ नही लगती,वो चाहे शवाब पर हो या फिर कितने भी भारी घनत्व की हो.वो इस भीषण ठंढ में भी वही गंजी पहने, वही लुंगी पहने और वही गमछा लटकाए चला आ रहा है.पथरु और उसके जैसी हालत में और भी बहुतों का होना पूरी मानवीय सभ्यता के खिलाफ एक सशक्त और सवालिया उपस्थिति है.पथरु अपने कर्त्तव्य से कभी डिगा नही और पथरू के होने से आप विमुख नही रह सकते...

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