'देशभक्ति' नाम की भयंकर बीमारी से बुरी तरह ग्रसित कुछ लाइलाज मरीजों की फेसबुक वालों पर चिंघाड़ मची हुई है.बावजूद उसके कडकडाती हुई ठंड कुछ समझने को राजी नही है.पूरी ठसक के साथ लौट आई है वापस.दिल्ली में हुंकार और फेसबुक पर चिंघाड़ से बेअसर मौसम देशद्रोही होने की राह पर है.रेडिओ मिर्ची पर एक से एक रूमानी गाने ब्रोडकास्ट हो रहे हैं--सब धान बाईस पसेरी वाले इस विकासोन्मत्त दौर में मेरी रूमानियत को ठौर मिलता है बरसीम के खेत में,जहाँ अलस्सुबह,बिलकुल भोर ही में धन्पत्ति अपनी तीन बुज़ुर्ग सखियों के साथ रोज बरसीम काटने जाने के लिए मजबूर है.मुझे कोई आश्चर्य नही.अपनी संस्कृति पर गर्व करने के इस विलासी दौर में भी खेतिहर मजदूर धन्पत्ति उतनी ही मजबूर है,जितनी वो अपने जनम के समय रही होगी.कड़कती हुई ये ठंड,लहराती हुई ये सर्द हवाएं और बरसीम के पत्तों पर झरती ठंडी ओस की बर्फीली बूँदें थमने का नाम नही लेतीं,लेकिन खेत के किनारे मेड पर ठहर जाती हैं चार बूढी सखियाँ.ओस की नदी में उतरती हैं वे बेलाग और शुरू हो जाती है हंसुए की खचर-खचर.पांवों में प्लास्टिक की चप्पलें,फटी हुई बिवाइयाँ,रूखी देह और हड्डी-हड्डी भर हाथ.चार हाथ साथ-साथ हंसिये की बंसिया बजाते हैं और चार हाथ ढहती हुई बरसीम को करीने से बिछाते हैं.ओस की इस बर्फीली नदी का समुन्दर होते जाना देर तक महसूस करती हैं देश की सीनियर सिटीजन ये चार गरीब,बेहद गरीब औरतें और..और गहरे..और गहरे उतरती जाती हैं ठण्ड और थकान से बेहाल..श्लथ भाव.आसमानी ओस के ठंडे समुन्दर में वे भींगती जाती हैं साथ-साथ..और इस तरह हुंकार और चिंघाड़ से बेखबर चार बूढी औरतें काट डालती हैं 9 कुंतल बरसीम..और उलट-उलट के पीछे देखती है चारों कि आता होगा रामसजीवन और लुढ़कती होगी उसकी बैलगाड़ी.बरसीम को गाडी पर लादकर उन्हें रोटी पकानी है और दस बजे से पहले चारा मशीन पर खड़े होकर बाल डालनी है पूरी बरसीम.दूर उफक पर धुन्धुआता जा रहा है आसमान.सूरज निकलने की बेला है,लेकिन अँधियारा घना होता जा रहा है,घना होता जा रहा है,और घना होता जा रहा है...! मुझे भी अपनी संस्कृति पर गर्व होने लगा है.....!!
ज्ञानी होना और बुद्धिजीवी होना हो सकता है की अलग चीज़ हो,पर फिलहाल में सोशल-मीडिया पर जिस तरह से भ्रष्ट तंत्र,लोकत्रंत,समाज,दर्शन,राजनीति जैसे गूढ़ विषयों पर सतत-ज्ञान की ठेला-ठेली मची हुई है उससे एक बात स्पष्ट है की जो भी वक्ति अपने को ज्ञानी या बुद्धिजीवी या स्यवं-घोषित बुद्धिजीवी/ज्ञानी समझते/मानते है उन्होंने भारत-वर्ष को सुधारने का जिमा खुद्दे ले लिय है।
ReplyDeleteइससे अच्छी बात एक रास्ट्र के लिय और क्या हो सकती है की रास्ट्र के नागरिक स्वयं को एक जिम्मेवार मानते/समझते है।
पर इस सोश्ल-मिडिया की दुनिया में भी एक जबरदस्त टीम-वर्क दिखता है
यहाँ एक पोस्ट के ऊपर टिप्पणियों के सहारे ही देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है भले ही वो की गई टिपण्णी जमीनी-स्तर पर एक कानून के रूप में न चल रहा हो ।
ज्ञानी होना और बुद्धिजीवी होना हो सकता है की अलग चीज़ हो,पर फिलहाल में सोशल-मीडिया पर जिस तरह से भ्रष्ट तंत्र,लोकत्रंत,समाज,दर्शन,राजनीति जैसे गूढ़ विषयों पर सतत-ज्ञान की ठेला-ठेली मची हुई है उससे एक बात स्पष्ट है की जो भी वक्ति अपने को ज्ञानी या बुद्धिजीवी या स्यवं-घोषित बुद्धिजीवी/ज्ञानी समझते/मानते है उन्होंने भारत-वर्ष को सुधारने का जिमा खुद्दे ले लिय है।
ReplyDeleteइससे अच्छी बात एक रास्ट्र के लिय और क्या हो सकती है की रास्ट्र के नागरिक स्वयं को एक जिम्मेवार मानते/समझते है।
पर इस सोश्ल-मिडिया की दुनिया में भी एक जबरदस्त टीम-वर्क दिखता है
यहाँ एक पोस्ट के ऊपर टिप्पणियों के सहारे ही देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है भले ही वो की गई टिपण्णी जमीनी-स्तर पर एक कानून के रूप में न चल रहा हो ।