वो देखो प्रिय..! दूऊऊऊऊऊर..........!
सुदूऊऊऊऊऊऊऊर........! पश्चिम की ओर--------------!!
अँधेरी निशा में.....नदी के किनारे.....धधकती किसी की चिता जल रही है...................!!!
सुदूऊऊऊऊऊऊऊर........! पश्चिम की ओर--------------!!
अँधेरी निशा में.....नदी के किनारे.....धधकती किसी की चिता जल रही है...................!!!
कल देर रात तैलंगस्वामी मन्दिर के ऊपरी बुर्ज से बनारस में दक्षिणमुखी हुई गंगा की गोलाकार रवानी देखते हुए सोच रहा था-रामकृष्ण देशाटन करते हुए जब काशी आये तो काशी तैलंग की कीर्ति से सुवासित हो रही थी.परमहंस उनसे मिलने गये और जब लौटे....तो कहते गये कि तैलंग तो सचल विश्वनाथ हैं..रामकृष्ण परमहंस के अध्यात्म की आभा खमंडल भर दीपित होती है.कभी दक्षिणेश्वर जाइए.उनके अंतिम कमरे में खड़े हो जाइए पलभर के लिए.यहीं देह छोडी थी उन्होंने.इस पलभर के बाद वे देरतक प्राप्त होते रहेंगे आपको.हुगली पार करने के बाद ही आप उनसे छूटेंगे,वो भी जरा सा..तबतक बेल्लूर आ जायेंगे आप और विवेकानन्द पकड़ लेंगे आपको.ये दोनों छूटते ही नही हमसे..आपसे..किसी से भी.इस संयुक्त दार्शनिक भाव की विरासत जिन परमहंस के नाम थी,उन्होंने जब इतना कहा तो तैलंग का आध्यात्मिक फलक और विस्तृत..और गहरा हुआ.उसके बाद तैलंग ने अपनी प्रतीति लिखी--परमहंस बिल्ली के उस बच्चे की तरह हैं,जिसे उसकी माँ ने जहाँ बिठा दिया,जीवनभर वहीँ डंटे रहे.पत्नी को भी शक्ति के बाने में महसूस कर लिया और इस तरह शक्ति के अगम श्रोत से नहा उठे.गृहस्थ संन्यास मार्ग का ये अनूठा दार्शनिक अपनी तरह का पहला है....शायद अंतिम भी हो.............!
तिलभांडेश्वर महादेव की दीवारों से सटकर गंगा को बहते हुए देखिये.यहाँ गंगा का घुमाव गोल है.हीरे के हार सा आकार.इस घुमाव के दायरे में आने वाले घाटों के भवन इस हार में लॉकेट्स की तरह हैं.यही वो जगह है जहाँ काशी करवट लेती बताई गयी है.यहाँ सीढियां करीब करीब सीधी खडी होती हैं.बहुत संभलकर चढना पड़ता है.इसीलिए अन्य घाटों से देखिये तो गंगा सामने दूर लेटी हुई नजर आती है.लेकिन यहाँ पंचगंगा घाट से देखिये तो वह सामने नही,बल्कि थोडा नीचे से काशी को ठेलते हुए बहती है.यहाँ गंगा काशी को उसकी हद में रहने की चेतावनी दे रही हो मानो.अगल-बगल हैं सदियों पुराने निर्माण.भवन स्थापत्य के विलक्षण नमूने.ऐसा लगेगा मानो किसी ने फेवीक्विक लगा दिया हो,आँखें वहीँ चिपक गयी हों जैसे.घाट-घाट होते थोड़ी दूर तक देखिये.आँखें जरा सिकोडिये...महाश्मशान मणिकर्णिका अपने पूरे लावण्य पर है.मृत्यु का महोत्सव बराबर चल रहा है.हह.
मुझे शम्भूनाथ सिंह याद आ रहे हैं.......
मुझे शम्भूनाथ सिंह याद आ रहे हैं.......
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