(दो)
समय की शिला पर...!
मधुर चित्र कितने............!!
किसी ने बनाये..किसी ने मिटाए.......!!!
मधुर चित्र कितने............!!
किसी ने बनाये..किसी ने मिटाए.......!!!
सीधी खड़ी सीढ़ियों से उतरते हुए वे नीचे उतरते अपने कदम नही,सामने बिछी तन्वंगी गंग तरंगें देख रही हैं.वर्तुल वलय-सी गंगा उन्हें विमुग्ध कर देती है.वे नियति नटी के इस कायिक सौन्दर्य से विस्मित हैं और अतिरेक में मेरे हाथ पकड़ लेती हैं..हमारे दोनों तरफ खड़े शिलाखंडों से बने ये विशाल भवन और बीच से गंगातट तक उतरता ये रास्ता..कि जैसे गहन गह्वर हो कोई..काशी अपनी अनिर्वचनीय बुनावट के लिए काशी राज-वंश की कृतज्ञ है.इन अनिर्वचनीय निर्मितियों में देश के कोने-कोने की राज-रियासतों से जुड़ी स्थापत्य-परम्परा का संमृद्ध निर्वाह दर्शनीय है..प्रशंसनीय है..! इन मकानों में काशी सांस लेती है.इतिहास के कितने ही पन्ने यहाँ सोये पड़े हैं.यहाँ का भूगोल अक्षांशों पर नही,दिव्यांशों पर खड़ा है.हर घाट की अलग बनावट है.हर पत्थर की अलग विशेषता है.ऊपर विश्व प्रसिद्द बनारस की गलियों का जो महाजाल है,उसमे आप कहीं भी,किसी भी मोड़ पर उतर आयें,परेशान न हों,किधर भी चल पड़ें,अगर आप ढलान की ओर चल रहे हैं तो गंगा के ही किसी न किसी घाट पर जरूर आ मिलेंगे.
हम गंगा के साथ उसकी दिशा में बह रहे हैं.हवा शांत है.बारिश की फुहारें हमे भिंगो रही हैं.वे धीरे से कहती हैं-ठण्ड नही लग रही.एकदम से सुहाना हो गया है मौसम..! यूँ ही कृतज्ञ भाव से ऊपर ताकता हूँ.बादलों की घनी परत आसमान पर औंधी पड़ी है और बूँद-बूँद झर रही है.कुदरत ने काशी को उसके आसमान से ये रजाई ओढा दी है.दो दिन से लगातार बरसती घटाओं के नीचे से ठण्ड अचानक कहाँ सरक गयी,काशी इस बात से बेखबर दुर्गा घाट के ऊपर की छतों से नारा गुंजाती है-हर हर महादेव..यह घोष-ध्वनि सुनकर शायद बादलों की जमावट थोड़ी दरकी है.मै बादलों की रजाई के ऊपर खुले निरभ्र आकाश में चाँद के ठीक नीचे सनसनाती हुई हवाओं की हिमालय छूकर लौटी सर्द सदाओं को बड़े ध्यान से सुनता हूँ.ठांय ठांय हवाएं चल रही हैं बादलों के पार..दो दिन बाद जब धुप खिलेगी,तो गलन जमीन पर उतरेगी.आगे गोला घाट है.नीरव-सा समां और झुरझुराती-सी लहरें मिलकर बोलती हैं यहाँ-कलकल..कलकल..! गंगा की तरंगें घाट के पत्थरों से टकराकर लौट जाती हैं.वो औरत जो आंटे की गोलियां छोड़ गयी थी शाम को आते हुए देखा था हमने,गंगा की मछलियों ने अपने सयाने बच्चों को वो गोलियां लेने भेजा है शायद.अनाज के दाने लेने के लिए वे अपना लाल लाल मुंह खोलती हैं तो मन करता है बस चूम लेना चाहिए इन्हें तो..!
वे मत्स्य क्रीडा देख रही हैं.उनके और गंगा के बीच बस मै खड़ा हूँ.वे निहाल हैं.कर्मदेश्वर घाट पर एक जबरदस्त आकर्षण और है-आठ फुट ऊंचा शिवलिंग..लेकिन दृष्टि छूटे तब तो देखे ये सब.ये पुराने स्थापत्यों की दीवारें फाडकर निकलते पीपल के पेड़ देखने से नजर तो हटे जरा.यहाँ सबकुछ अद्भुत है.दीवारें भी सलामत हैं,पेड़ भी सुरक्षित हैं..और इधर के रहवासी अपने बनारसीपन के साथ इतनी रात गये तक जाग रहे हैं.पंडित गोपीनाथ कविराज,माता आनन्दमयी और श्यामाचरण लाहिड़ी की यह योग-भूमि है..सर्वथा पूजित भूखंड.कबीर को उनके रामानन्द इन्ही घाटों पर मिले.भारतेंदु को उनकी भाषा इन्ही घाटों पर मिली.अवध के नवाब का बांका सिपाही मीर अली बुढवा मंगल की परम्परा को इन्ही घाटों पर मिला.लेकिन जो देखकर उदास हूँ,वो कैसे.कहूँ..! काशी वांग्मय के ये आध्यात्मिक प्रस्तर-पृष्ठ आज मानव-मल से पटे पड़े हैं,ये काशी का पतन है.यह प्रह्लादघाट है.गंगा के पाट हमारी युगल पदचाप के साथ-साथ हमसे दूर होते जाते हैं.गंगा का घुमाव हमसे दूर जाता दिखाई पड़ता है.गंगा का ये घाट फैला हुआ दीखता है.यहाँ से ऊपर चलें तो शहर का शोर मिलेगा.कुछ देर और ठहर जाएँ,तो काशी की भोर मिलेगी,हमे शोर से कटकर निकल लेना था.हमने भोर का निमंत्रण भी छोड़ दिया और आत्म-विभोर-से आगे बढ़ गये.अपनी पहचानी-सी पगडंडियाँ चढकर घर तो आ गये.पर वे पूछ ही बैठीं-जो गुनगुना रहे हैं,वो किसने लिखा था-समय की शिला पर..........! हह...मुझे शम्भूनाथ सिंह याद आ रहे हैं..
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