आज उस छोकरी का मुस्कुराना गजब ढा गया है.प्रोफेसर का मन सन्नाटे में है.अब क्लास लेने की हिम्मत नही रही.बहुत बेचैन हैं.नदी की और निकल जाते हैं.ठंड उतरने के बाद अचानक से ये जो धूप बढ़ी है,वो अरार पर कुछ ज्यादा ही लगती है.जैकेट के अंदर देह में पसीना महसूस होने लगा है.लेकिन आज तो ये धूप कुछ अंदर से भी निकल रही है.कुछ मातम सा है मन में.एक उम्र बिता दी पर अबतक किसी लड़की की वैसी नजर नही देखी थी,जिसमे कलेजा चाक कर देने वाला ऐसा मजबूर आमन्त्रण हो..! 50 की लपेट में पंहुचे प्रोफेसर ने समाजशास्त्र के ग्रंथों का ये अध्याय नही पढ़ा था,पढ़ा भी हो तो शायद प्रैक्टिकल देखने से रह गया हो.वरना इतने बेचैन क्यों होते.! आखिर हर शहर के अपने-अपने सोनागाछी,अपने-अपने जीबी रोड तो हैं ही और वे इसी सभ्य समाज की जरूरत भी हैं.लेकिन केवल शहरी सभ्य समाज के ही.भारत के गाँवों में तो अभी कहीं ये बाज़ार नही खुला.! सही मायने में गाँव की सभ्यता ही असल भारतीय लोक की सभ्यता है.मुझे लगता है कि शहरों को हमारा ये आरोप जरा गौर से सुनना चाहिए.जरा गम्भीरता से महसूस करना चाहिए कि ग्रामीण संस्कार ने गाँव को अभी सेक्स का बाज़ार खड़ा करने की इजाजत नही दी है.ये भी सही है कि गाँव वाले ही शहर बनाते हैं,लेकिन शहर के तो साहब संस्कार ही विचित्र हैं.वो तो हर चीज़ का बाज़ार खड़ा करता है.हालाँकि देह का व्यापर मनुष्यों की दुनिया में उसके आरम्भ से ही रहा है,लेकिन ये बाज़ार जो बनाया है,उसमें बाज़ार ने अपना चरित्र भी दाखिल किया है .......और सबकुछ बेमुरव्वत हो गया है..! शहरों को नागरिक जीवन के इस कोढ़ पर विचार करना चाहिए.! प्रोफेसर आज उस बारह साला लडकी की सेक्स के लिए आमंत्रित करने वाली चार साला नज़र से घायल हैं.दोपहर से ही पगलाए हुए हैं.
होंठों पर पूरे बचकाने ढंग से पोती गयी लिपस्टिक,एकदम से गोरे,अंडाकार चेहरे पर पाउडर की एक परत,ललाट के बीचोबीच एक चमकीली बिंदी,ऊपरी देह में पूरे बांह का स्वेटर और निचली देह में एक जींस.अपनी माँ का हाथ पकडकर इस रास्ते से आने जाने वाले हर पुरुष को उलट-उलट के देखती ये वही 12 साल की छोकरी है,जिसने आज प्रोफेसर को मुस्कुराकर पूरे आमन्त्रण भाव से देखा है.ये सब उसे उसकी माँ ने सिखाया है जो खुद हमेशा नशे की गिरफ्त में रहती है.अगर शराब न पिए तो पति का भूत सताता है.उसका पति सरकारी मजदूर था.उसके नही रहने के बाद विभाग ने इसे नौकरी दे दी.लेकिन एकमात्र बेटी की इस माँ से नशे में नौकरी नही की गयी.शराब पिए हुए वो कई बार पकड़ी गयी.सस्पेंड हुई.अफसरों ने,साथियों ने कितना समझाया......!...बेटी का ख्याल कर..कायदे से नौकरी कर..उसे ठीक से पाल..शराब मत पी.....लेकिन लेकिन लेकिन...शराब उसने न छोड़ी.हाँ,नौकरी छोड़ दी..........और लोग बताते हैं कि 8 साल की उम्र में ही बेटी के लिए उसने स्टेशन पर पहला ग्राहक खोज लिया था.ये सिलसिला उसी दिन से चला आ रहा है.रोज़ दिनभर शराब के नशे में टुन्न उसकी माँ अपना हाथ पकड़ाकर उसे पूरा इलाका घुमाती है.वो कभी भी,कहीं भी मिल जाती है.लोगों को बेटी दिखाती हुई.सभी को अपनी ओर बुलाती हुई..और वो बेटी...! उसको एक बात मालूम है.सुबह उठकर हाथ मुंह रंगना है और इसके बाद माँ का हाथ पकड़कर जिधर वो जाए,उधर चलते जाना है.उस चलने में होना ये है कि जो भी आदमी मिले,आदमी..यानी पुरुष..(....जी,वही आदमी कहलाने का अधिकार रखता है बस,बाकी को तो औरत कहते हैं....)..तो खैर,जो भी पुरुष मिले,उसे देखकर उसकी ओर घूम घूम के मुस्कुराना है.यानि चलना है माँ के साथ और देखना है आदमी को.उसको आँख मारना है..और उसे अपने शरीर की ओर देखने का इशारा करना है..और ये काम हरेक के साथ करना है,कोई छूटने न पाए.क्या पता कौन 'दाता' मिल जाए..! उम्र कुछ भी हो,ये 'दाता' तो हरेक में होता है.लोग मिल ही जाते हैं.इसके बाद के भी सारे काम उसे स्टेपवाइज़ मालूम हैं..!
देर रात स्टेशन के आखिरी प्लेटफ़ॉर्म पर 12 साल की छोकरी अपनी माँ के साथ अपने रसूखदार समाज से मिलने आती है.उसकी माँ को पूरी तरह नशे की हालत में भी अच्छी तरह याद है कि पुलिस वालों को उनकी फीस देनी है.वो इन जरूरी कामों में लग जाती है.बाज़ार की आवश्यक शर्तें पूरी की जा रही हैं.रात के घटाटोप में हाथी अपने खाने के दांत बाहर निकालता है.स्टेशन के यार्ड में बने पुराने गोदाम,केबिंस,कार्यालय जो अब इस्तेमाल नही होते,उन छोड़ी गयी जगहों पर वो बारह साला लडकी अपनी उम्र की एक रात गुजारती है,इस रात मे चार-पांच घंटे होते हैं और इस रात मे चार-पांच नगे होते हैं.उसे लगता है कि ये अच्छे लोग होते हैं..अपने लोग होते हैं,तभी तो वो खुद भी उनके सामने नंगी हो जाती है.माँ आसपास में ही रहकर पहरेदारी करती है.गुजरती हुई रेलों में भी यही समाज यात्रा कर रहा है,जो देख लेते हैं,वे दूर तक घूरते हैं.ट्रेन रुक जाए तो कुछ ग्राहक भी हो जाते हैं.पैसे भी मिल जाते हैं.12 साल की ये छोकरी बारह एक बजे के आसपास रात में अपनी माँ के साथ कमा धमाकर घर पहुँचती हैं..आज इसी लड़की ने प्रोफेसर को देखा है..प्रोफेसर इसकी कहानी पहले ही सुन चुका है,लेकिन उसने यकीन नही किया था तब....कि ये तो दुनिया है.कहती ही रहती है.दूसरों की निंदा,वो भी अगर औरत हो तो....इस मामले में हमारा समाज स्वयंसिद्ध समाज है.कोई भी औरत जिसका पति न हो या साथ में कोई पुरुष न रहता हो और उसे छिनाल न कहा हो समाज ने,ये गर्व करने लायक नही हैं हमलोग...लेकिन प्रोफेसर को जो यकीन नही था,वही हुआ और ठीक दोपहर को हुआ.वे क्लास को जा ही रहे थे कि माँ-बेटी सामने आ गयीं..और दिनों की तरह आज भी वे गुजर ही जाते लेकिन सम्वेदनशील मन ने शायद लड़की को देखना चाहा होगा.उचाट नजर घूमी होगी..कि लडकी ने उनकी ओर घूमकर अचानक आँख मारी.प्रोफेसर साहब की सांस टंग गयी.जब होश आया तो मन व्याकुल हो उठा है.ठांव नही मिल रही है.आज उस छोकरी का मुस्कुराना गजब ढा गया है.प्रोफेसर का मन सन्नाटे में है.....
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