किसी गांव में एक ब्राह्मणदेवता रहते थे। वे बड़े भोजन-प्रिय थे। भोजन का निमंत्रण स्वीकार करना उनका पेशा था। पंडित जी के पड़ोस में एक ग्वालिन रहती थी। वह आये दिन उनको निमंत्रण दिया करती थी। एक बार श्राद्ध के दिन ब्राह्मण देवता का न्योता हुआ। दक्षिणा मिलने वाली थी। ब्राह्मण देवता ने बड़ी ईमानदारी और लगन से खाया। कोई कसर नहीं रखी। आकण्ठ भोजन पाया। दक्षिणा लेकर पान चबाते हुए ज्यों ही रवाना होने लगे कि ग्वालिन बोली-‘‘महाराजजी, एक खोवे का गोला आपके नाम का रह गया है। इसे भी लेते जाइये, नहीं तो मुझे पाप लगेगा’’
पंडितजी खोवे का गोला भला कैसे छोड़ते? उन्होंने घर ले जाकर बड़ी हिफाजत से छींके पर रख दिया।
किया हुआ भोजन कैसे पचे, यह वे अच्छी तरह जानते थे। उसके लिए कड़ी-सी माजून बनाकर खा ली। हल्का सा नशा हुआ। उस नशे में बैठे ब्राह्मण देवता सोचने लगे कि कल इस खोवे का क्या बने। लड्डू या मोदक?
इतने में कहीं से बिलाव आया और लपका उस खोवे के गोले की तरफ।
पंडित जी दहाड़े-‘‘अरे, तू बड़ा चोर है, लुटेरा है। दिन-दहाड़े मेरे सामने से मेरा खोवा ले जाने आया है?’’
नशे की करामात ऐसी कि बिलाव भी बोलने लगा।
‘‘महाराज, आप उलटी बातें न करें। आपके पेट में गले तक अन्न भरा है। तिल रखने की भी जगह नहीं है। तब इस खोवा के हकदार आप कैसे हैं और कैसे यह खोवा आपका है?’’ पंडित जी की आंखों में आंख डालकर बिलाव ने कहा-‘‘मेरे पेट में तीन दिन से भूख की आग धधक रही है। मुझे अन्न का एक कण भी नहीं मिला है। इसलिए इस खोवे पर मेरा अधिकार है।’’
पंडित जी में हिम्मत नहीं कि डण्डा मारकर बिलाव को भगा दें और बिलाव में साहस नहीं कि खोवे का गोला छीन ले जाय। इसलिए क्रिया-प्रतिक्रिया की चर्चा का दौर शुरू हो गया।
ब्राह्मण देवता बोले-‘‘कमबख़्त, तू मुझे ज्ञान सिखाने लगा। तू नास्तिक है। तू बोलशेविक हो गया है। तू कम्युनिस्ट हो गया है। धर्म के खिलाफ बात करता है, नीति और कानून के खिलाफ बात करता है।’’
बिलाव दृढ़ता से बोला-‘‘ब्राह्मणदेवता, जो धर्म, जो नीति, जो कानून अन्न पर भूखों का अधिकार बतलाने के बदले उसका अधिकार बतलाता है, जिसका पेट ठसाठस भरा हो, वह धर्म धर्म नहीं है, वह नीति नीति नहीं है, वह कानून कानून नहीं है।’’
‘‘बच्चू, तुम सीधी तरह नहीं मानोगे, ठहरो।’’ पंडित जी झल्लाकर बोले-‘‘मैं तुम पर अदालत में नालिश करूंगा। संविधान ने मुझे कुछ मूलभूत अधिकार दिये हैं। उनका आधार लेकर मैं सर्वोच्च न्यायलय तक तुम्हें घसीट ले जाऊंगा।’’
बिलाव गंभीरता से बोला-‘‘मुझे मंजूर है। आप जरूर मुकदमा चलाइये। लेकिन ... ’’
‘‘लेकिन क्या?’’ पंडित जी पूछ बैठे।
‘‘गुजारिश है कि आप मेरी दो शर्तें सुन लें।’’-बिलाव ने कहा।
‘‘पहली शर्त यह है कि नालिश दायर करने से पहले आप खुद सात दिन का उपवास कीजिये। उन सात दिनों में अगर आपने पड़ोस की ग्वालिन के यहां से दूध चुराकर नहीं पिया तो मुझे आपकी फरियाद कबूल है।’’
‘‘दूसरी शर्त यह है कि जिस हकिम के इजलास में मेरा मामला चले, वह भी सात दिन का उपवास करे। उन सात दिनों में अगर उसने अपनी मेमसाहब की आलमारी में से बिस्कुट चुराकर नहीं खाये तो उस अदालत का फैसला भी मुझे मंजूर है।’’
पंडित के मुंह में ताला जड़ गया। काटो तो खून नहीं। वे पोथी-पत्रों में आज तक बिलाव के प्रश्नों का जवाब खोज रहे हैं। smile emoticon smile emoticon
(दादा की बोधकथाएँ)
पंडितजी खोवे का गोला भला कैसे छोड़ते? उन्होंने घर ले जाकर बड़ी हिफाजत से छींके पर रख दिया।
किया हुआ भोजन कैसे पचे, यह वे अच्छी तरह जानते थे। उसके लिए कड़ी-सी माजून बनाकर खा ली। हल्का सा नशा हुआ। उस नशे में बैठे ब्राह्मण देवता सोचने लगे कि कल इस खोवे का क्या बने। लड्डू या मोदक?
इतने में कहीं से बिलाव आया और लपका उस खोवे के गोले की तरफ।
पंडित जी दहाड़े-‘‘अरे, तू बड़ा चोर है, लुटेरा है। दिन-दहाड़े मेरे सामने से मेरा खोवा ले जाने आया है?’’
नशे की करामात ऐसी कि बिलाव भी बोलने लगा।
‘‘महाराज, आप उलटी बातें न करें। आपके पेट में गले तक अन्न भरा है। तिल रखने की भी जगह नहीं है। तब इस खोवा के हकदार आप कैसे हैं और कैसे यह खोवा आपका है?’’ पंडित जी की आंखों में आंख डालकर बिलाव ने कहा-‘‘मेरे पेट में तीन दिन से भूख की आग धधक रही है। मुझे अन्न का एक कण भी नहीं मिला है। इसलिए इस खोवे पर मेरा अधिकार है।’’
पंडित जी में हिम्मत नहीं कि डण्डा मारकर बिलाव को भगा दें और बिलाव में साहस नहीं कि खोवे का गोला छीन ले जाय। इसलिए क्रिया-प्रतिक्रिया की चर्चा का दौर शुरू हो गया।
ब्राह्मण देवता बोले-‘‘कमबख़्त, तू मुझे ज्ञान सिखाने लगा। तू नास्तिक है। तू बोलशेविक हो गया है। तू कम्युनिस्ट हो गया है। धर्म के खिलाफ बात करता है, नीति और कानून के खिलाफ बात करता है।’’
बिलाव दृढ़ता से बोला-‘‘ब्राह्मणदेवता, जो धर्म, जो नीति, जो कानून अन्न पर भूखों का अधिकार बतलाने के बदले उसका अधिकार बतलाता है, जिसका पेट ठसाठस भरा हो, वह धर्म धर्म नहीं है, वह नीति नीति नहीं है, वह कानून कानून नहीं है।’’
‘‘बच्चू, तुम सीधी तरह नहीं मानोगे, ठहरो।’’ पंडित जी झल्लाकर बोले-‘‘मैं तुम पर अदालत में नालिश करूंगा। संविधान ने मुझे कुछ मूलभूत अधिकार दिये हैं। उनका आधार लेकर मैं सर्वोच्च न्यायलय तक तुम्हें घसीट ले जाऊंगा।’’
बिलाव गंभीरता से बोला-‘‘मुझे मंजूर है। आप जरूर मुकदमा चलाइये। लेकिन ... ’’
‘‘लेकिन क्या?’’ पंडित जी पूछ बैठे।
‘‘गुजारिश है कि आप मेरी दो शर्तें सुन लें।’’-बिलाव ने कहा।
‘‘पहली शर्त यह है कि नालिश दायर करने से पहले आप खुद सात दिन का उपवास कीजिये। उन सात दिनों में अगर आपने पड़ोस की ग्वालिन के यहां से दूध चुराकर नहीं पिया तो मुझे आपकी फरियाद कबूल है।’’
‘‘दूसरी शर्त यह है कि जिस हकिम के इजलास में मेरा मामला चले, वह भी सात दिन का उपवास करे। उन सात दिनों में अगर उसने अपनी मेमसाहब की आलमारी में से बिस्कुट चुराकर नहीं खाये तो उस अदालत का फैसला भी मुझे मंजूर है।’’
पंडित के मुंह में ताला जड़ गया। काटो तो खून नहीं। वे पोथी-पत्रों में आज तक बिलाव के प्रश्नों का जवाब खोज रहे हैं। smile emoticon smile emoticon
(दादा की बोधकथाएँ)
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