Monday, 16 November 2015

बृहल्लांगुलाचार्य का मत


 
सर्कस में काम करने के बाद लौट आये शेर को जंगल के शेरों ने कहा-‘‘आप मनुष्यों में रहकर आये हैं। हम सब जानना चाहते हैं कि मनुष्य किस प्रकार का प्राणी है। इसलिए आप हमारी सभा को संबोधित करके बताइये कि उसकी क्या स्थिति है और वह क्या खाता है?’’
शेर की स्वीकृति मिलते ही जंगलभर में डुग्गी पिटवा दी गयी कि ‘‘बृहल्लांगुलाचार्य कल आम सभा में मनुष्य नाम के प्राणी के विषय में जानकारी देंगे।’’
बृहल्लांगुलाचार्य का अर्थ है-बड़ी पूंछवाला। लेकिन इतना बड़ा नाम न बताया जाय तो सभा में आयेगा कौन? हम अपने नाम के पीछे बी.ए., एम.ए. आदि पूंछ लगाते हैं, वैसे ही शेर के लिए घोषित किया गया-‘‘बृहल्लांगुलाचार्य, मैन लैण्ड रिटर्न्‍ड’’(बड़ी पूंछवाला मनुष्यों की दुनिया से लौटा हुआ)
जंगल की विराट सभा में मनुष्य का लक्षण बताते हुए उस शेर ने कहा-‘‘मनुष्य किसी काम के लायक प्राणी नहीं है। मैं उनके बीच रहा, तब मैंने छोटे-बड़े, सब प्रकार के मनुष्यों को एक-दूसरे की शिकायत करते देखा। हर एक अपने-आपको बचाता और दूसरे के लिए कहता था कि वह आदमी पैसा खाता है। इसलिए मैंने विचार किया कि पैसा जरूर कोई खाने लायक स्वादिष्ट वस्तु होनी चाहिए।
एक दिन जब मेरा मालिक बाहर गया तो उसकी जेब में पंजा डालकर मैंने पैसे निकाल लिये। सुन्दर पीले, सफेद, चमकीले। मैंने सोचा-मनुष्य ने खाने की कितनी सुंदर चीज ढूंढ़ निकाली है। और फिर झट से एक अपने मुंह में रख लिया। लेकिन ... ’’
शेर ने क्षणभर रुककर कहा-‘‘मेरे दांत भी उसे चबाने से टूट जायेंगे, ऐसा लगा।
‘‘मैंने सुना था कि लोग कुछ चीजें चूसते हैं इसलिए हो सकता है, यह चूसने की चीज हो। चूसते-चूसते मेरी जीभ में छाले पड़ गये। पैसा न खारा था, न खट्टा, न तीखा, न मीठा।
‘‘फिर मुझे किसी की बात याद आयी, जब कहा गया था कि वह बहुत-सा पैसा हजम कर गया। तो, मैंने पैसा निगल लिया।’’
बीच ही में किसी ने टोका -‘‘तो ... ’’
‘‘... तो विश्वास कीजिये, अभी तक पेट में इस कदर दर्द उठता है कि पूछो मत।’’
सभा हैरानी के साथ सुनती रही।
शेन ने अपनी अंतिम प्रतिक्रिया व्यक्त की-‘‘मुझे लगता है कि यह मनुष्य महामूर्ख प्राणी है! जिस पैसे का खाने, पीने, निगलने आदि में उपयोग नहीं कर सकते, उसके लिए वह मर मिटता है।’’
(दादा की बोधकथाऍं)

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