Monday, 16 November 2015

बनारस का गोवर्धन पूजन

बनारस मे गोवर्धन पूजा के दिन यादव बंधुओं का 'लाग' निकलता है। लाग बोले तो खूब लम्बा शाहाना किस्म का जुलूस। ये भी बनारस का एक लक्खा उत्सव है,जिसमे श्रीकृष्ण-राधिका, शिव-पार्वती,राम-जानकी आदि की कई कई झाँकियाँ निकलती हैं,रथ होते हैं,बग्घियाँ होती हैं,घुड़सवार होते हैं,मोटर साइकिलें होती हैं और अब तो बड़ी बड़ी वीआईपी गाडियाँ भी होती हैं....साथ मे होते हैं यादव बंधु और आम लोग। बीच शहर के बेनियाबाग से चलकर लाग यहाँ गंगा किनारे खिड़किया घाट पर सभा मे बादल जाता है। एक नया ट्रेंड ये है कि जब प्रदेश मे समाजवादी पार्टी की सरकार होती है तब इसका उत्साह दूना इसलिए हो जाता है कि बड़े बड़े सरकारी वीआईपीज़ के शामिल होने से इसका रुतबा जरा सरकारी किस्म का हो जाता है। अब इस सरकारी रुतबे का आलम कल देखने लायक था।
हम गोदौलिया से चले तो पैदल चलने के अलावा कोई चारा नही था। मैदागिन पहुंचे तो जुलूस मिल गया। माथे पर पीली पगड़ियाँ बांधे हजारों लोग चल रहे थे। यहाँ तक तो सब ठीक चल रहा था,लेकिन उसके बाद उत्सव की फिजाँ बदलने लगी। विश्वेश्वरगंज के बाद प्रहलादघाट तक की लगभग 5 किलोमीटर सड़क का अपहरण हो गया। पीले साफे वालों का जबर्दस्त घेरा बन गया सड़क के दोनों तरफ और ट्रैफिक पूरी तरह मुल्तवी हो गया। बिलकुल वैसे ही जैसे अखिलेश के शपथ ग्रहण समारोह के बाद मंच पर कब्जा कर के उनके अति उत्साही कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाया था। भारी से भारी वो हर पटाखा बजना शुरू हुआ जिसे केवल तकनीकी तौर पर बम नहीं कहा जा सकता। आम राहगीर का एक कदम चलना भी असंभव हो गया। हम गलियों मे घुस गए। आकर मुकीमगंज मे निकले तो इधर का नजारा देखकर रूह कांप गयी। पटाखों की लगातार बढ़ती आवाजों और बारूदी धुएं से पटा हुआ आसमान तथा कागजों से पटी हुई सड़क। सांस के किसी भी रोगी और गर्भवती किसी भी स्त्री के लिए मौत का पूरा सामान था। हजारों लोगों के तमाशे से जान बचाकर भागते सैकड़ों औरतों,मर्दों और बूढ़ों को कल देखा हमने। लेकिन कोई जाएगा कहाँ। पूरी सड़क पर जहरीला धुआं और साँसों की घुटन...पूरे पाँच किलोमीटर तक। एक तरफ उत्साहित नौजवानों का सरकारी उत्सव और दूसरी तरफ अशक्त लोगों की बीमार पीड़ा। हर दस कदम नही,हर पाँच कदम पर एक बड़ा बम,हर दो कदम पर सुतली बम,हर एक कदम पर जानलेवा आवाज। अगल-बगल भागती हुई औरतें,गिरते-पड़ते बूढ़े और सांस रोक-रोककर सांस खींचते सांस के रोगी। पुलिस के अफ़सरान आँखें बचाकर ऊपर देख रहे थे,जैसे कि लोक जीवन को कोई बाधा न हो। ये भी हुआ कि सड़क किनारे जीपीओ के पास एक बूढ़े अधनंगे फकीर की लाश पड़ी थी। उत्सव अपने उल्लास पर था इसलिए लाश देखने की फुर्सत किसी को नही थी।
इस तरह के लोकोत्सवों के प्रशंसक हैं हम लेकिन कल सरकारी संरक्षण मे चले इस अराजक तांडव के बाद मन बेहद दुखी हुआ। मेरे मित्र कविवर केशव शरण के टखने मे बम का छर्रा लगा और वे जलन के मारे बेहाल उठे। वे मेरे ही बुलाने पर कल शायद पहली बार लाग देखने आए थे। वीआईपी गाड़ियों का रेला और अनियंत्रित पटाखों के धमाकों पर बगल मे खड़े पुलिस अफसरों की चुप्पी देखकर वे मेरा हाथ पकड़कर गंगा घाटों की तरफ खींच ले गए। कल बनारस मे एक वही जगह शांत थी,वरना पूरा का पूरा शहर कल पटाखों के धमाकों पर था। कल बनारस मे दीवाली से ज्यादा पटाखे बजे। परसो से अबतक हमारे पेड़ों पर एक भी चिड़िया नही बोली है। करो राज अखिलेश बाबू....ज्यादा समय कहाँ बचा है अब....! नहीं सुधरे तो आज जो भाग रहे हैं सड़कों पर,वही कल सुधार देंगे तुमको भी....!

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