ज्योतिबा फुले नगर यानी उत्तर प्रदेश का अमरोहा एक पुराना कस्बा है जिसकी गिनती उत्तर प्रदेश के नये बने जिलों में होती है। हमारी इस साल की ५वीं सुबह अमरोहा में हुई। अपने मित्र चन्द्रकान्ती पाल के साथ जब मैं स्टेशन पर उतरा तो कड़ाके की ठंड और कुहरे की धुंध में समाया अमरोहा ठिठुरन और गलन को परे धकेलकर जाग रहा था। हम अमरोहा के जर्रे-जर्रे को बड़े गौर से देख रहे थे। इसे शहर कहें तो गलती होगी, क्योंकि इसकी जीवन्तता मौजूद है इसके कस्बाई स्वभाव में। हमारा रिक्शा हमारी मंजिल की ओर बढ़ रहा था और हम मस्जिद-ओ-मीनारों से निकलती अजान की आवाजों में अमरोहा का इतिहास पढ़ने की कोशिश में डूबे हुए थे। औसत ऊंचाई के मकानों और मुगलिया संस्कृति के अवशेषों को अपने आकार में ढाले इस कस्बे का इतिहास सदियों पुराना है। आम की फसलों और रोहू मछली पर टिके रोजगारों का पूरा संस्कार अमरोहा के नाम में उतर आया है। कहते हैं कि बांसी स्टेट के राजा अमरजोदा (४७४ ई०पूर्व) के नाम पर इसका नाम अमरोहा पड़ा। तारीख-ए-अमरोहा नामक ग्रन्थ में इसका इतिहास पृष्ठ-दर-पृष्ठ दर्ज है। ६७६-११४१ एडी के दौरान अमरोहा पर राजपूतों का राज्य था। कस्बे में प्रवेश करने के लिए ईसाबाद वर्ष १६४२ में सैयद अब्दुल माजिद द्वारा बनवाया गया
मुरादाबादी दरवाजा आज भी अपने ऐतिहासिक गौरव के साथ मौजूद है। मस्जिदों, ईदगाहों, दरगाहों, इमामबाड़ों, दीवानखानों, मदरसों और मंदिरों से भरा हुआ अमरोहा, मुगलिया सल्तनत के प्रभाव का साक्षी है। मुस्लिम आबादी आज भी यहां बहुतायत में मौजूद है। हिंदुओं की बसावट यद्यपि कम है फिर भी सामाजिक समरसता का शबाब यहां देखते बनता है। वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार अमरोहा की आबादी २६४८९० थी, जिसमें ५३ प्रतिशत पुरुष और ४७ प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व था। गौरतलब है कि यहां साक्षरता की दर ६४ प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय साक्षरता दर ५९.५ प्रतिशत से अधिक है। ७९ प्रतिशत पुरुषों और ५१ प्रतिशत महिलाओं की साक्षरता वाले अमरोहा में १५ प्रतिशत आबादी ६ वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों की है। अपने आमों के लिए जाना जाने वाला अमरोहा अपनी अर्थव्यवस्था के लिए हैण्डलूमों, चीनी मिलों, लकड़ी के काम, कपास के उत्पादन और अब कालीनों के निर्माण पर निर्भर है।
वैसे तो देश के नक्शे में अमरोहा किसी तीर्थस्थल के तौर पर दर्ज नहीं है, किन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि हम यहां तीर्थयात्रा पर ही आये थे। कहते हैं–भारत में प्रतिभाओं और मेधाओं की खान है। धरती के नीचे की खनिज सम्पदा से मालामाल अपना देश धरती के ऊपर जन्म लेने वाली प्रतिभाओं के मामले में भी अपना सानी नहीं रखता। लेकिन एक दूसरा विद्रूप भी है, जिसे हमें ईमानदारी के साथ स्वीकार करना चाहिए। हमें स्वीकार करना चाहिए कि हम अपनी प्रतिभाओं का मान करना नहीं जानते। अगर ऐसा न होता तो भारत की मेधा-सम्पदा का बाहर के देशों में पलायन नहीं होता। यह इतिहास सिद्ध तथ्य है कि इस जमीन पर पैदा होने वाली प्रतिभाएं, सुविधाओं, संसाधनों और अवसरों के अभाव में दुनिया के दूसरे देशों में अपने पंख फैला रही हैं। हमारे शोध, हमारे लोग, हमारी प्रतिभाएं जब हमारी व्यवस्था में सम्मान नहीं पातीं तब वे दूसरी व्यवस्थाओं के सहारे खुद को साबित करती हैं और हमारी खोजें दूसरे देशों से होकर जब हम तक पहुंचती हैं तब हम उन्हें सिर माथे लगाकर खुद को गौरवान्वित समझते हैं। निश्चित मानिये अगर ऐसा न होता तो आज भ्रष्टाचार का दीमक इस देश को खोखला न कर रहा होता, अगर ऐसा न होता तो यह देश विकास के सूचकांकों पर दुनिया के नक्शे में शीर्ष पर होता। अगर हम अपनी प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें यथेष्ट अवसर देने में पीछे न रहते तो देश उन्नति के शिखर पर होता। डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल के साथ भी यही हुआ। डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल–एक महान चिकित्सा व कृषि वैज्ञानिक; जिनके अविष्कारों के लाभ से देश वंचित रह गया।
हम ५ जनवरी को डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल की चौखट पर माथा टेकने ही गये थे। यह सही मायने में एक तीर्थयात्रा थी। तीर्थयात्रा इसलिए कि डॉ़ कौशल के व्यक्तित्व और उनके कारनामे इतने बड़े थे कि अगर उन्हें अपने देश ने ठुकराया न होता तो हरित और श्वेत क्रान्तियां दोनों एक साथ हो गयी होती। डॉ़ कौशल अविवाहित थे और आजन्म ब्रह्मचारी भी। उनका पूरा जीवन देखें तो एक विलक्षण प्रतिभा, एक विशाल संतत्व और एक निस्पृह इंसान का विशाल व्यक्तित्व दिखायी देता है। साथ-साथ एक पीड़ा भी गुजर जाती है कि हिमालय जैसे इस व्यक्तित्व को इस देश की व्यवस्था पचा कैसे गयी! अमरोहा के इस सपूत का यूं ही गुमनाम अमरोहा की माटी में नष्ट हो जाना किसी कस्बाई संस्कृति का परिणाम तो नहीं हो सकता पर यह अमरोहा के धुंध भरे आसमान पर एक लांछन जरूर है। अमरोहा के लोगों, तुमने आवाज क्यों नहीं दी? देश तुम्हारे साथ खड़ा हुआ होता। एक साधक की साधना से अनजान रह गया देश। एक निवृत्त संयासी की मौन आराधना का प्रतिफल पाने से वंचित रह गये हम सब और वे अपनी चुनौती हमें सौंप कर महाप्रयाण पर निकल गये। १९ दिसम्बर, २०११ का वह दिन जब डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल नहीं रहे, हमारे तर्इं एक काला दिन था, जब देश के सपूत को अपने कर्तृत्व का मान पाये बिना ही हमसे विदा लेनी पड़ी। वे चाहते भी क्या थे! इतना ही तो चाहते थे कि उनकी खोजों का लाभ उठाकर भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था मजबूत बने। महान कृषि वैज्ञानिक डॉ़ एमएस स्वामीनाथन् द्वारा सराहे गये उनके शोध अमेरिकी हितों के लिए काम करने वाले सरकारी तंत्र को कभी रास नहीं आये। उन खोजों की जानकारी भी आम लोगों तक पहुंचने नहीं दी गयी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में आज जिन अंग्रेजी दवाओं और वंâपनियों का बोलबाला है, उनके बरक्स डॉ़ कौशल द्वारा आविष्कृत दवाओं को अगर जगह मिली होती तो भारत का आम आदमी आज की स्वास्थ्य व्यवस्था की अराजकता का शिकार होने से बच जाता। डॉ़ साहब ने आयुर्वेद एवं होम्योपैथी के समन्वय से जैव भौतिकी पर आधारित कुछ ऐसी औषधियां तैयार की थीं जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी व्यवस्था और व्यवस्थाजन्य भ्रष्टाचार को चुनौती देने की हालत में थीं। मंद बुद्धि के बच्चों की आईक्यू बढ़ाने, हृदय रोगियों में ब्लॉकेज की प्रारंभिक अवस्था में ऑपरेशन की आवश्यकता को समाप्त करने, किडनी के रोगियों में डायलेसिस की आवश्यता को कम करने, पीलिया, एसीडिटी एवं विषाणुजनित डेंगू आदि रोगों में कम हो जाने वाली प्लेटलेट्स की संख्या को बढ़ाने वाली दवाओं के अलावा एड्स, हेपेटाइटिस बी, टीबी और वैंâसर जैसी भयानक बीमारियों को नियंत्रित करने वाली औषधियों को विकसित करने वाले डॉ़ कौशल जीवन भर अपने इन शोधों के सर्वजन हिताय उपयोग के लिए संघर्ष करते रहे लेकिन सरकारी मशीनरी ने उनसे भ्रष्टाचार का लेन-देन करना चाहा। इसके लिए वे तैयार नहीं हुए तो उनकी पूरी तपस्या को ही सरकारी तंत्र ने अंगूठा दिखा दिया।
६ जुलाई १९३१ को अमरोहा में पैदा हुए डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अमरोहा में ही हुई। डाक्टरी की पढ़ाई उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से पूरी की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पैरासाइकोलॉजी के तत्कालीन विशेषज्ञ डॉ़ बीएल आत्रे के सान्निध्य में आने के बाद चिकित्सा के अलावा उनका रुझान दर्शन और मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुआ। वे लंदन स्थित रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ एण्ड हाईजीव के आजीवन सदस्य थे। माता श्रीमती भगवान देवी और पिता स्व़ रंजीत सिंह की ५ संतानों में वे एक मात्र पुत्र थे। कहते हैं होनहार बिरवान के होत चीकने पात। डाक्टर साहब के जीवन की दिशा ने किशोरावस्था में ही उन्हें शोधों की ओर मोड़ दिया। २१ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने शोध का पहला प्रयोग धनिया की फसल २९ दिन में प्राप्त कर किया था। आकर्षणों ने उन्हें कभी विचलित नहीं किया। बालब्रह्मचारी डॉ़ कौशल ने विवाह नहीं किया और कृषि तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांति करने के उनके सपने को उनके शोध धार देने लगे। उन्होंने तत्कालीन सरकारों, उनके जिम्मेदार अधिकारियों, वैज्ञानिकों आदि से सतत सम्पर्क रखा और अपने पास की जानकारी उन्हें देते रहे। वैज्ञानिकों ने उनके शोधों पर अपनी विशेषज्ञता की मुहर भी लगायी। किन्तु किस प्रकार जनहित के उनके शोध कागजों में ही रह गये, इसका विवरण उन समाचार पत्रों की कटिंग्स में स्पष्ट है, जो तब बेहद मुखरता से उनका उद्घाटन करने में लगे थे। उन अखबारों की कटिंग इस पोस्ट के साथ अपलोड हैं। अमरोहा में हमारी मुलाकात उनके भांजे और उनके विश्वसनीय मानस उत्तराधिकारी डॉ़ रविशंकर से हुई। उन्होंने हमें वे तमाम दस्तावेज उपलब्ध कराये जो चीख-चीख कर कहते हैं कि जनता के लिए, जनता के द्वारा चलायी जा रही जनता की व्यवस्था किस प्रकार जनता के सार्वजनिक हितों का खून करती है और अपना गंदा चेहरा छुपाकर पर्दे पर बेहहाई की हंसी भी हंसती है। डॉ़ रविशंकर खुद भी एक चिकित्सक हैं। उन्होंने १९७१ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमबीबीएस की डिग्री ली। अपने मामा डॉ० सुरेशचन्द्र कौशल से चिकित्सा विज्ञान की बारीकियां सीखने वाले डॉ़ रविशंकर उनके विश्वस्त सहयोगी और विश्वासपात्र उत्तराधिकारी हैं। बताते चलें कि आनासक्त कर्मयोगी डॉ़ कौशल ने मृत्यु से पहले अपनी जीवन की पूरी कमाई (लगभग ४२ लाख रुपये) अनुपयोगी गायों की सेवा के लिए दान कर दी। यह पैसा उन्होंने अपने निरंतर और निस्पृह श्रम से अर्पित किया था। लंदन से लौटने के बाद वे सप्ताह में एक दिन अपनी डिस्पेंसरी पर बैठते थे और इसी कमाई से अपना जीवन निर्वाह करते थे। अपना मकान भी उन्होंने एक धार्मिक/अध्यात्मिक संस्था को दान कर दिया।
हमें याद आ रहा है। भारत की संत परंपरा के दो मनीषी जिनका संबंध काशी से था-संत रैदास और संत कबीर। एक मोची ... और एक जुल्हा ...। दोनों ने अपने समय में अपने संतत्व से समाज को दिशा दी और जीवन की निजी जरूरतों के लिए निजी श्रम का ही संधान किया। यह भारत में ही हो सकता है जहां का संत अपने समाज को देता ही है, लेता कुछ नहीं। डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल को कबीर और रैदास की परंपरा संत का प्रतिनिधि माने तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
डॉ़ रविशंकर के फोन से डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल के महाप्रयाण की खबर पाकर हम सन्न रह गये। लगा कि अपनी माटी के महामनीषी सपूत के साथ हुए राष्ट्रीय अपराध की आंच में हम सब झुलस गये हैं। लगा कि इस पाप के भागी हम भी हैं। लगा कि उस चौखट पर माथा टेकना जरूरी है। लगा कि इस तीर्थ पर अवश्य जाना चाहिए। हम पहुंचे तो डॉ़ रविशंकर और उनके परिवार ने हमें सिर पर बैठा लिया। उनके स्नेह के अतिरेक और हमारी श्रद्धा की शब्दशून्यता ने हमारे बीच एक रिश्ता गढ़ दिया। हम अभिभूत भाव से उनकी और उनके परिवार जनों की सेवाभाविता का दर्शन कर रहे थे और वे हमें डॉ़ कौशल की शौर्य (शोध) गाथा से समृद्ध कर रहे थे। डॉ़ कौशल का जीवन दर्शन कुएं में पानी की नहीं, कुएं में प्यास की कहानी है। यह ८० वर्षीय बुजुर्ग चिकित्साशास्त्री का जाना नहीं अपने देश और अपनी मिट्टी की तासीर का दरक जाना है क्योंकि बहुत संभव है - आप भी वह दस्तक सुन पा रहे हों, जो हमारे कानों में पड़ रही है। डॉ० कौशल का जीवन कार्य उनके जीते जी नहीं बोल सका, पर मृत्यु के देवता की आराधना करने वाला यह देश मरणोपरांत शायद उनके काम को सुने। काम सुनने की नहीं, देखने व समझने की चीज है पर काम जब व्यक्तिगत आग्रही और महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ियां फलांग जाता है, तब वह सम्पूर्ण आवाज बन जाता है। तीर्थयात्रा से लौटते हुए हमने महसूस किया कि अमरोहा के आसमान की धुंध फट रही है। मस्जिदों की गुम्बदों से आती अजान की आवाज अपनी तासीर बदल रही है। अमरोहा का कस्बा कभी कोई गांव रहा होगा। गांव से शहर होते जाने की अपनी ही पीड़ा होती है। गंवई, कस्बाई और शहरी सभ्यता का अंतर मनुष्य के मनोभावों का अंतर हो जाता है। आश्चर्य है-असंगतता की इस पराकाष्ठा। इस शोध विज्ञानी का नाम अमरोहा का कस्बा भी पूरी तरह नहीं जानता। डॉ़ रविशंकर इस अनाम शोध पुरुष का उत्तराधिकार पूरी गुरुरता से वहन कर रहे हैं। उनका नाम बताने पर हमें रास्ता बताने वालों की कमी नहीं थी।
लौटते समय डॉ़ रविशंकर ने हमें वह दवा भी दी जिसका शोधन, प्रयोग और प्रमाण न डॉ़ कौशल ने अपनी जीवन काल में ही कर लिया था। शत प्रतिशत परिणाम देने वाली इस दवा का उपयोग दुधारू पशुओं के लिए किया जाता है। दुधारू पशु के दूध की मात्रा, वसा, अवधि और स्वास्थ्यवर्धक यह दवा होम्यिोपैथी और आयुर्वेदिक तत्वों से मिलकार बनी है जिसका कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होता।
डॉ़ रविशंकर के फोन से डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल के महाप्रयाण की खबर पाकर हम सन्न रह गये। लगा कि अपनी माटी के महामनीषी सपूत के साथ हुए राष्ट्रीय अपराध की आंच में हम सब झुलस गये हैं। लगा कि इस पाप के भागी हम भी हैं। लगा कि उस चौखट पर माथा टेकना जरूरी है। लगा कि इस तीर्थ पर अवश्य जाना चाहिए। हम पहुंचे तो डॉ़ रविशंकर और उनके परिवार ने हमें सिर पर बैठा लिया। उनके स्नेह के अतिरेक और हमारी श्रद्धा की शब्दशून्यता ने हमारे बीच एक रिश्ता गढ़ दिया। हम अभिभूत भाव से उनकी और उनके परिवार जनों की सेवाभाविता का दर्शन कर रहे थे और वे हमें डॉ़ कौशल की शौर्य (शोध) गाथा से समृद्ध कर रहे थे। डॉ़ कौशल का जीवन दर्शन कुएं में पानी की नहीं, कुएं में प्यास की कहानी है। यह ८० वर्षीय बुजुर्ग चिकित्साशास्त्री का जाना नहीं अपने देश और अपनी मिट्टी की तासीर का दरक जाना है क्योंकि बहुत संभव है - आप भी वह दस्तक सुन पा रहे हों, जो हमारे कानों में पड़ रही है। डॉ० कौशल का जीवन कार्य उनके जीते जी नहीं बोल सका, पर मृत्यु के देवता की आराधना करने वाला यह देश मरणोपरांत शायद उनके काम को सुने। काम सुनने की नहीं, देखने व समझने की चीज है पर काम जब व्यक्तिगत आग्रही और महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ियां फलांग जाता है, तब वह सम्पूर्ण आवाज बन जाता है। तीर्थयात्रा से लौटते हुए हमने महसूस किया कि अमरोहा के आसमान की धुंध फट रही है। मस्जिदों की गुम्बदों से आती अजान की आवाज अपनी तासीर बदल रही है। अमरोहा का कस्बा कभी कोई गांव रहा होगा। गांव से शहर होते जाने की अपनी ही पीड़ा होती है। गंवई, कस्बाई और शहरी सभ्यता का अंतर मनुष्य के मनोभावों का अंतर हो जाता है। आश्चर्य है-असंगतता की इस पराकाष्ठा। इस शोध विज्ञानी का नाम अमरोहा का कस्बा भी पूरी तरह नहीं जानता। डॉ़ रविशंकर इस अनाम शोध पुरुष का उत्तराधिकार पूरी गुरुरता से वहन कर रहे हैं। उनका नाम बताने पर हमें रास्ता बताने वालों की कमी नहीं थी।
लौटते समय डॉ़ रविशंकर ने हमें वह दवा भी दी जिसका शोधन, प्रयोग और प्रमाण न डॉ़ कौशल ने अपनी जीवन काल में ही कर लिया था। शत प्रतिशत परिणाम देने वाली इस दवा का उपयोग दुधारू पशुओं के लिए किया जाता है। दुधारू पशु के दूध की मात्रा, वसा, अवधि और स्वास्थ्यवर्धक यह दवा होम्यिोपैथी और आयुर्वेदिक तत्वों से मिलकार बनी है जिसका कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होता।
पूरे परिवार की आतिथ्य भावना, मिलन सारिता और उच्च मानव मूल्यों के निर्वहन की परंपरा ने हमें भीतर तक छुआ। और हम अधिक समृद्ध होकर लौटे।
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विशेष-----करघे पर वस्त्रों का ताना-बाना बुनते एक तरफ कबीर हैं तो कठवत व अन्य उपकरणों से पनही को आकार देते दूसरी तरफ संत रविदास हैं। एक के मुख से गुरु समान कबीर बड़ भ्राता ... के शब्द फूटते हैं तो दूसरा संतन में रैदास ... कह कह कर नहीं अघाते। चाक पर मिट्टी के बर्तन को रूप रंग देते गोरा कुम्हार, धुनकी से रूई की लटे सुलझाते दादू, हाथ में सुई धागा और वस्त्रों की सिलाई करते दरिया साहब, तन्मयता से केश करतन करते सेन और तराजू संतुलित करने में तल्लीन पलटू दास। यह वह पूरी संत परम्परा है, जो श्रम साधना के जरिये परम ब्रह्म से मिलन का मार्ग दिखाती है, पेशे के जरिये सृष्टि और निराकार के संबंधों का खाका खीचती है। सार यह कि किस तरह श्रम साधक संतों ने कर्म काण्ड व स्थापित कुप्रथाओं के खिलाफ किस प्रकार सदियों पहले क्रांति का शंखनाद किया। तमात विरोधों और अवरोधों के बाद भी यह संत दर्शन पूरे विश्व में पुष्पित और पल्लवित हुआ। ऐसी अनूठी श्रम साधक संत आंदोलन परंपरा दुनिया में कहीं और सुनने और देखने को नहीं मिलती। इन संतों ने पेशे में रत रहते हुए मन की पवित्रता पर जोर दिया और मिथक तोड़े। अपनी रचनाओं में अपनी जाति और पेशे से जुड़े विभिन्न उपकरणों के प्रयोग किये। कबीर ने अपने दर्शन में करघे का तो रविदास ने जूता गाठने के यंत्रों का आधार बनाया। पलटू की एक पंक्ति ‘पलटू जात क बनिया, तौले सारी दुनिया’ पूरी बात स्पष्ट कर देती है। कबीर ने वस्त्र बुनते दर्शन से नंगी संस्कृति को सभ्यता का चोला दिया, शरीर को करघा और जुलाहे को सृष्टि से जोड़ा। रैदास ने मानसिक प्रकृति को निखारा, दादू ने धुनकी की टंकार से रूई का कचरा बाहर निकाल कर जात-पात और तमाम वादों को मन से निकाल कर निर्मलता का संदेश दिया। यह दर्शाता है कि जिस पेशे में आपको अस्तित्व, सम्मान, सभ्यता और व्यक्तित्व दिया, उस पर गर्व करो। डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल जो अपने चिकित्सकीय पेशे में रहते हुए कृषि, पशु, प्रकृति और रूग्ण लोगों के कल्याणार्थ आजीवन शोध में लगे रहे, उनको हम इसी श्रम साधक संत परंपरा की श्रेणी में रखने को विवश हैं, उनका जीवन दर्शन इस परंपरा का नया संवाहक दर्शन है।
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विशेष-----करघे पर वस्त्रों का ताना-बाना बुनते एक तरफ कबीर हैं तो कठवत व अन्य उपकरणों से पनही को आकार देते दूसरी तरफ संत रविदास हैं। एक के मुख से गुरु समान कबीर बड़ भ्राता ... के शब्द फूटते हैं तो दूसरा संतन में रैदास ... कह कह कर नहीं अघाते। चाक पर मिट्टी के बर्तन को रूप रंग देते गोरा कुम्हार, धुनकी से रूई की लटे सुलझाते दादू, हाथ में सुई धागा और वस्त्रों की सिलाई करते दरिया साहब, तन्मयता से केश करतन करते सेन और तराजू संतुलित करने में तल्लीन पलटू दास। यह वह पूरी संत परम्परा है, जो श्रम साधना के जरिये परम ब्रह्म से मिलन का मार्ग दिखाती है, पेशे के जरिये सृष्टि और निराकार के संबंधों का खाका खीचती है। सार यह कि किस तरह श्रम साधक संतों ने कर्म काण्ड व स्थापित कुप्रथाओं के खिलाफ किस प्रकार सदियों पहले क्रांति का शंखनाद किया। तमात विरोधों और अवरोधों के बाद भी यह संत दर्शन पूरे विश्व में पुष्पित और पल्लवित हुआ। ऐसी अनूठी श्रम साधक संत आंदोलन परंपरा दुनिया में कहीं और सुनने और देखने को नहीं मिलती। इन संतों ने पेशे में रत रहते हुए मन की पवित्रता पर जोर दिया और मिथक तोड़े। अपनी रचनाओं में अपनी जाति और पेशे से जुड़े विभिन्न उपकरणों के प्रयोग किये। कबीर ने अपने दर्शन में करघे का तो रविदास ने जूता गाठने के यंत्रों का आधार बनाया। पलटू की एक पंक्ति ‘पलटू जात क बनिया, तौले सारी दुनिया’ पूरी बात स्पष्ट कर देती है। कबीर ने वस्त्र बुनते दर्शन से नंगी संस्कृति को सभ्यता का चोला दिया, शरीर को करघा और जुलाहे को सृष्टि से जोड़ा। रैदास ने मानसिक प्रकृति को निखारा, दादू ने धुनकी की टंकार से रूई का कचरा बाहर निकाल कर जात-पात और तमाम वादों को मन से निकाल कर निर्मलता का संदेश दिया। यह दर्शाता है कि जिस पेशे में आपको अस्तित्व, सम्मान, सभ्यता और व्यक्तित्व दिया, उस पर गर्व करो। डॉ़ सुरेशचन्द्र कौशल जो अपने चिकित्सकीय पेशे में रहते हुए कृषि, पशु, प्रकृति और रूग्ण लोगों के कल्याणार्थ आजीवन शोध में लगे रहे, उनको हम इसी श्रम साधक संत परंपरा की श्रेणी में रखने को विवश हैं, उनका जीवन दर्शन इस परंपरा का नया संवाहक दर्शन है।
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