मै ग्यारहवीं मे पढ़ता था। यहीं मुगलसराय,नगर पालिका इंटर कॉलेज मे। तब मुगलसराय बनारस मे होता था। इसलिए हमारे स्कूल का पूरा नाम हमलोग नगर पालिका इंटर कॉलेज मुगलसराय,वाराणसी लिखते थे। अबके बच्चों को चंदौली लिखना पड़ता होगा। हमेँ हिन्दी पढ़ाते थे अंबिका सिंह। वहीं रविनगर मे रहते थे। जिसको भक भक गोरा कहते हैं,बिलकुल वैसी गुलाबी रंगत उनकी रिटायरमेंट के ठीक पहले के दिनों मे भी थी। और एकदम वैसी ही प्रगाढ़,प्रांजल और प्रगल्भ हिन्दी उनकी जिह्वा से भी झरती रहती थी-गुलाबी-गुलाबी सी... :) हिन्दी के जिन विद्वानो के चलते मेरा हिन्दी मे रुझान बढ़ा और जिनसे मुझे हिन्दी सीखने का मौका मिला, उनमे निष्कामेश्वर पाठक के बाद मै आदर पूर्वक अंबिका सिंह का ही नाम स्मरण करता हूँ। उन्ही दिनों एक घटना हो गयी थी----
यूपी बोर्ड के स्कूलों मे आमतौर पर नवीं और ग्यारहवीं की छ्माही परीक्षाओं की कोई वैल्यू ही नही होती थी। कभी कोई फ़ेल ही नही होता था। इन कक्षाओं की वार्षिक परीक्षाओं मे तो थोड़ा बहुत ध्यान से परीक्षा देते भी थे...लेकिन फ़ेल इनमे भी कोई नही होता था। आज भी करीब-करीब ऐसा ही है। दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के लिए रजिस्ट्रेशन हो चुका होता है और बच्चे बस इन्ही परीक्षाओं को परीक्षा तब भी समझते थे, अब भी समझते हैं। लेकिन मेरी बीमारी ये थी कि मै परीक्षा चाहे कोई भी हो, खूब जम के तब भी देता था, अब भी देता हूँ। कई बार मेरी इस झक के चलते स्कूल को परेशानी भी उठानी पड़ जाती थी। झक ही कहेंगे अगर सौ मे से सत्तानबे बच्चे आधे घंटे मे परीक्षा हाल छोड़ देंगे और खाली दो-तीन बच्चे दो-तीन अध्यापकों को तीन घंटे तक फंसाए रखेंगे, प्रिन्सिपल को ऑफिस मे बैठाये रखेंगे और बाबू लोगों का कार्यालय शाम पाँच बजे तक खुलवाए रक्खेंगे... उस दिन तो और गज़ब हुआ था। मेरी ही तरह के झक्की एक दो और पागल भी मेरे साथी थे। उस दिन शाम की पाली मे हिन्दी का सेकेंड पेपर था। काव्यांजली...खंडकाव्य सूतपुत्र...आदि की व्याख्याएँ,रस,अलंकार,चरित्र चित्रण आदि लिखने होते थे...और आधा घंटा बीतते-बीतते पूरा क्लास खाली हो गया। बचे केवल हम दो---- मै और विजय गुप्ता। पता नही कहाँ होगा आजकल वो...। शायद यहाँ एफ़बी पर भी कहीं हो, मिल जाये तो मजा आए। खैर,जब सारे बच्चे चले गए तो करीब आधे घंटे बाद तीनों कक्ष निरीक्षकों ने टहलना शुरू कर दिया। एक एक करके वे आते और हम दोनों को घूर के चले जाते। एक घंटा बीता तबतक तो ऑफिस तक मे हलचल होने लगी। कौन लड़के हैं भाई जो पूरा पुराण ही लिखने बैठ गए हैं। प्रिंसिपल साहब ने कहलवा ही भेजा ---अरे, छमाही इम्तिहान मे इतना क्या लिखना। लेकिन इधर हम लोग दोनों कान मे तेल डाले चुपचाप केवल पेपर हल करने मे लगे थे। सोच के बैठे थे कि आज पाँच बजे से पहले निकलेंगे नही। टीचर्स भी समझ गए कि लड़के एकदूसरे की होड़ मे लिख रहे हैं। स्कूल वाले भी जम के बैठ गए...लिखो बेटा...! सच मे उस दिन हम दोनों ने पाँच बजे ही सिर उठाया और देखा तो तीनों कक्षनिरीक्षक ठीक ठीक पाँच बजते ही कॉपी छीनने को तैयार खड़े थे। दो लड़कों ने नाहक तीन घंटा पका दिया था, जबकि इस एक्जाम की कोई वैल्यू भी नही है। कहीं नंबर ही नही जुड़ता इन इम्तिहानों का। खैर, उस दिन हमलोग कॉपी जमा करके मुसकुराते हुए घर लौट आए।
हिन्दी सेकेंड पेपर के रिजल्ट का इतजार बहुत था हमे। ऐसी परीक्षाओं के नंबर बीच क्लास मे ही विषय के अध्यापकों द्वारा सुनाये जाते थे। हमको और विजय गुप्ता को तो उस दिन इतना इतजार था कि जैसे हमारा जन्म ही हिन्दी सेकेंड पेपर का रिजल्ट सुनने के लिए हुआ हो। बेसब्र प्रतीक्षा की घड़ियाँ बीतीं और अंबिका सर रिजल्ट लेकर क्लास मे दाखिल हुए। इम्तिहान देने के लिए भले ही खाली हम दो लड़के थे लेकिन रिजल्ट सुनने के लिए उस दिन पूरा क्लास भरा हुआ था। दो लाइन या चार लाइन सबने लिखा भी था ही। हिन्दी के तीन पेपर होते थे तब तो सौ का पूर्णांक तीन भाग मे बाँट लेते थे। फर्स्ट पेपर और सेकेंड पेपर 33 के और थर्ड पेपर 34 का होता था। सर आए और फाइल खोल के बैठ गए और क्लास मे सन्नाटा छा गया.....राजेश-17, विपिन -20, इफतिखार-21, विनीता-15, शंगुफ्ता-13, चन्द्रशेखर -16........विजय गुप्ता-30........,रमेश -22, कालीचरन -14,स्नेहलता- 21.....गुरु जी नंबर सुना रहे थे। विजय हंस रहा था, उसके सबसे ज्यादा नंबर थे लेकिन सशंकित नज़र से वह मुझे ही देख रहा था। मेरा नाम अभीतक नहीं बोला गया था इसलिए मेरी धड़कन भी बढ़ी हुई थी। मुझे पक्का यकीन था कि मेरा 32 नंबर है, उसी को सबसे अंत मे बोलेंगे। ये यकीन इतना गहरा था कि एक बार तो पूर्णांक ही पा लेने की उम्मीद हो गयी। मुझे हिन्दी का बेस्ट स्टूडेंट मानते थे लोग सो केवल हमी नही, सब ऐसा ही सोच रहे थे। विजय का नंबर पता चल ही गया था। उसके और पूर्णांक के बीच जो दो अंक बचे थे, वो मेरे लिए ही तो थे...कि तभी बम्म फूट गया। अंबिका गुरु जी की आवाज़ सुनाई पड़ी...प्रेम प्रकाश -29...! ...........................घनघोर सन्नाटा...!! क्लास मे आवाज़ केवल गुरुजी के हाथों बटोरे जा रहे कागजों की ही आ रही थी बस...बाकी साँसों की। मैंने विजय की ओर दुश्मन की तरह देखा। उसका मुंह खुद ही खुला हुआ था। यकीन उसको भी नही आ रहा था, किसी को नही आ रहा था। खुद सर को भी इसका अनुमान नही था कि हिन्दी मे प्रेम क्लास टॉप नही करेगा। उनके गोरे चेहरे पर एक दिव्य सी मुस्कान हमेशा रहती थी जो उस समय गायब थी। अचानक बोले--किसी को अपने नंबरों से कोई शिकायत हो तो हमसे ऑबजेक्शन कर सकता है। उनके मुंह से इधर 'कर सकता है' निकला और उधर सनाका खाये प्रेम प्रकाश खड़े हुए---मुझे है सर ऑबजेक्शन। मेरा नंबर ठीक नही आया है। एक दो नंबर केवल अच्छी बुरी राइटिंग पर कट सकता है बस। जवाब एक भी गलत नही लिखा है मैंने। मुझे मेरी कॉपी दिखा दीजिये। मेरे बोलते ही अपनी-अपनी कॉपियों के लिए करीब करीब सब लड़के बोलने लगे। मेरा भी...मेरा भी...मेरा भी....! लेकिन गुरु जी की ओर देखा तो वे अब मुस्कुरा रहे थे। सबकी बात नकारते हुए उन्होने मेरी ओर चश्मा ठीक करते हुए देखा और बोले--तुम विजय को लेकर कल मेरे घर ही आ जाना। वही देख लेना......! उस दिन बेहद बुझा हुआ चेहरा लिए हम घर लौटे। रात कैसे तिलमिलाते हुए बीती, वो आप केवल अंदाजा लगा सकते हैं।
अगली सुबह दस बजते बजते हम गुरु जी के घर जा पहुंचे। उन्होने बड़ी आत्मीयता से मुझे बैठाया और पानी मंगवाकर बोले—विजय का भी इंतज़ार कर लें। इस बीच मै पानी पी चुका तो उन्होने मुझसे पूछा—तुमको ऐसा क्यो लगता है कि तुम्हारे नंबर कम आए...? अगर विजय के नंबर 28 होते, क्या तब भी तुमको ऐसा ही लगता...? सवाल सुनकर मै चक्कर खा गया। इस सवाल को सुनते ही मुझे लगा कि अचानक मेरी प्रोब्लेम मेरी समझ मे आ गयी है। मेरी समस्या ये नही थी कि मुझे कम नंबर मिले थे। मेरी समस्या ये थी कि मुझे विजय से कम नंबर मिले थे। मेरी समस्या ये थी कि मुझे सबसे ज्यादा नंबर नही मिले थे। मेरा परफ़ोर्मेंस हमेशा विजय से अच्छा रहा था। हिन्दी मे तो क्लास भर से ज्यादा अच्छा रहता था। समस्या जब समझ मे आ गयी तो इस सच उघाड़ू सवाल के जवाब मे मैंने सच बोल दिया---नही सर, तब मुझे ऐसा नही लगता। लेकिन अभी इसलिए लग रहा है क्योंकि मुझे मालूम है कि विजय मुझसे अच्छा नही लिख सकता। आप ही कहते हैं। ये कहते हुए मै ये सोच रहा था कि पक्का सर से ही गड़बड़ी हुई है। या तो मेरा कुछ जाँचने से छूट गया है...या फिर विजय को यूं ही कहीं एक दो नंबर ज्यादा दे दिये होंगे। आज फँसने वाले हैं, इसलिए सवाल पूछ रहे हैं। मै मन ही मन सोच रहा था। इतने मे विजय भी आ पहुंचा। गुरु जी ने अलमारी खोली। कॉपियों का बंडल निकाला और हम दोनों की कॉपी एक दूसरे को पकड़ा दी। बोले- तुम लोग पहले एकदूसरे की कॉपी देख लो, फिर अपनी अपनी देखो। फिर दोनों की साथ रख के तीनों देखेंगे। तीन राउंड की जांच थी वो। पहले से लेकर आखिरी प्रश्न तक एक एक लाइन देख रहे थे हम लोग। कविताओं के संदर्भ, प्रसंग, भाव,कला, रस, छंद, अलंकार, व्याख्याएँ सब करीब करीब एक ही जैसे। विजय की इतनी मेहनत देख के हम ठकुआए हुए थे। लिखा उसने सब मेरे साथ ही बैठकर था, इसलिए नकल किया होगा जैसा और कुछ कहने की गुंजाइश भी नही थी। उसकी पूरी कॉपी देख के मैंने अपनी कॉपी झटकी। अंत तक देख जाने के बाद ज्यो ही मै कर्ण के चरित्र चित्रण तक पहुंचा, अचानक मुझे अपनी गलती दिख गयी। इसी जवाब पर उसको 4 और मुझे 3 अंक मिले थे। बाकी हर प्रश्न मे एक समान नंबर थे। थोड़ा सा कुछ समझ मे आते ही मैंने फिर विजय की कॉपी छीन ली। अचानक मैंने उधर देखा तो गुरुदेव मुस्कुराने लगे थे। दोनों कॉपियाँ मुझसे मांगकर उन्होने सामने टेबल पर बिछा दीं। बोले नीचे देखो। दोनों को मिलाओ। कर्ण के चरित्र चित्रण वाला दोनों का पन्ना सामने खुला पड़ा था। मैंने जो लिखा था वो तीन पेज मे कर्ण की कहानी के तौर पर लिखा था। विजय ने वही कहानी ढाई पेज मे शीर्षक और उप शीर्षक लगाकर लिखी थी। अब जबकि संपादक हूँ तो समझ पाता हूँ कि क्यो देखने मे ही उसके पेज का ले आउट खूबसूरत लग रहा था। अपनी गलती समझ मे आते ही मेरे हाथ अचानक मेरे बालों को जैसे नोचने लगे। बड़ी व्यग्रता मे खड़े होकर मैंने अपनी गलती मान ली और गुरु जी के साथ साथ विजय से भी माफी मांग ली। गुरु जी ने तबतक एकाएक एक तीर छोड़ा। बोले कि बेटा, मै तुम्हारी पढ़ाई लिखाई और आत्मविश्वास की प्रशंसा करता हूँ। तुम बहुत अच्छे विद्यार्थी हो इसलिए जब यहाँ तक आ ही गए हो और अपनी गलती भी समझ गए हो तो मै तुम्हारा 1 नंबर बढ़ा देता हूँ।
मैंने हाथ बढ़ाकर विजय को गले से लगा लिया और गुरु जी के पाँव पकड़ लिए। मैंने दिल की बात उनसे कह दी। मैंने कहा नही सर, जबतक मुझे लगता रहा कि हर हालत मे मैंने विजय से अच्छा लिखा है, तबतक मै उसके लिए आग्रही था, लेकिन जब गलती समझ मे आ गयी है, तब अपनी गलती के लिए मुझे नंबर थोड़ी चाहिए। अब तो मुझे आपकी डांट चाहिए, थप्पड़ चाहिए। सलाने इम्तिहान मे अब हम कोई गलती थोड़ी न करेंगे। गुरु जी हंस पड़े और हम दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले—अब दोनों हाथ मिलाओ और चाय पीकर तब घर जाओ।
No comments:
Post a Comment