स्वामी विवेकानन्द और महामना मदन मोहन मालवीय ने जब हिन्दुत्व का उदघोष किया था तो उसमें धमक बहुत थी लेकिन शोर बिल्कुल नहीं था। शायद इसीलिए शिकागो की आवाज आज तक गूंजती सुनी जाती है। शायद इसीलिये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की धमक और चेतना आज तक अपने उसी अंदाज में मौजूद है। हिन्दुत्व की इस आवाज को कभी साम्प्रदायिक विशेषण नहीं दिया जा सका क्योंकि यह आवाज किसी और सम्प्रदाय के सामने नहीं खडी थ्री। हिन्दुत्व पर आज लग रहे इल्जाम शायद इसलिये है कि उसमें वह धमक नहीं है, बल्कि शोर ज्यादा है। काशी गोशाला के वर्तमान संकट पर कल जो पोस्ट लिखी थी वह आगे नहीं बढी। एक बिल्कुल तटस्थ और निरपेक्ष सी चर्चा हो कर रह गयी। यह बिल्कुल इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार देश का हिन्दुत्व कानों में रूई डालकर पडे सुप्त सरकारी तंत्र के सामने समर्पण की मुद्रा में है। आज हम बावनबीघा गोशाला की जमीन पर जबरदस्तीं हो रहे निर्माण के कुछ चित्र पोस्ट कर रहे हैं और आप सबके सामने यह सवाल रख रहे हैं कि ये चित्र देखकर उन सबके खून क्यों नहीं खौल रहे जो सामाजिक समरसता की बातें सुनकर अक्सर खौल-खौल उठते हैं।
ये तो सारी दुनिया जानती है कि महामना मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, पर ये बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि महामना के सपनों का एक और संकल्प था, जो तबके भारत मे क्रान्ति का वाहक बना और आज घुट घुट के सांसें ले रहा है। 136 साल पहले महामना ने बनारस मे काशी गोशाला की स्थापना भी की थी, जो आठ गोशालाओं का एक पूरा संकुल था। वाराणसी शहर के चारों तरफ स्थित इन आठों जगहों पर अलग-अलग तरह से गोवंश का पालन, पोषण और संरक्षण होता रहा है। कहीं दुधारू गायों को एक साथ तो कहीं गर्भाधान के लिए तैयार हो रही गायों को एक साथ, कहीं बीमार गायों को एक साथ तो कहीं उम्र पूरी कर चुकी गायों को एक साथ रखकर पूरे चिकित्सकीय देखरेख मे संगठित गोसेवा की परंपरा महामना ने काशी मे शुरू की थी। इन आठों स्थानों पर गोशाला और गोचर समेत जरूरी खेती बारी के लिए ज़मीनें भी उन्होने मांग मांगकर जुटाई थीं। इनमे उस समय के तत्कालीन काशी नरेश और शेष समाज,खासकर ग्रामीण समाज की दान की गयी ज़मीनें शामिल हैं। बीएचयू के अस्तित्व मे आने के बाद आज से लगभग 90-100 साल पहले की उस क्रांतिकारी सोच को सलाम करने को जी चाहता है, जब महामना ने विश्वविद्यालय परिसर के अंदर मिल्क बूथों की कल्पना की थी और जगह जगह, मोड़ों और नुक्कड़ों पर सबके लिए गाय का दूध उपलब्ध करवाया था। वृहत्तर समाज के सहयोग से खड़ी हुई इस गोशाला के अलग अलग प्रकल्पों की स्थापना और संचालन मे हिन्दू ही नही, मुस्लिम समाज ने भी बढ़ चढ़कर अपना सहयोग और अंशदान दिया था।
ये तो सारी दुनिया जानती है कि महामना मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, पर ये बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि महामना के सपनों का एक और संकल्प था, जो तबके भारत मे क्रान्ति का वाहक बना और आज घुट घुट के सांसें ले रहा है। 136 साल पहले महामना ने बनारस मे काशी गोशाला की स्थापना भी की थी, जो आठ गोशालाओं का एक पूरा संकुल था। वाराणसी शहर के चारों तरफ स्थित इन आठों जगहों पर अलग-अलग तरह से गोवंश का पालन, पोषण और संरक्षण होता रहा है। कहीं दुधारू गायों को एक साथ तो कहीं गर्भाधान के लिए तैयार हो रही गायों को एक साथ, कहीं बीमार गायों को एक साथ तो कहीं उम्र पूरी कर चुकी गायों को एक साथ रखकर पूरे चिकित्सकीय देखरेख मे संगठित गोसेवा की परंपरा महामना ने काशी मे शुरू की थी। इन आठों स्थानों पर गोशाला और गोचर समेत जरूरी खेती बारी के लिए ज़मीनें भी उन्होने मांग मांगकर जुटाई थीं। इनमे उस समय के तत्कालीन काशी नरेश और शेष समाज,खासकर ग्रामीण समाज की दान की गयी ज़मीनें शामिल हैं। बीएचयू के अस्तित्व मे आने के बाद आज से लगभग 90-100 साल पहले की उस क्रांतिकारी सोच को सलाम करने को जी चाहता है, जब महामना ने विश्वविद्यालय परिसर के अंदर मिल्क बूथों की कल्पना की थी और जगह जगह, मोड़ों और नुक्कड़ों पर सबके लिए गाय का दूध उपलब्ध करवाया था। वृहत्तर समाज के सहयोग से खड़ी हुई इस गोशाला के अलग अलग प्रकल्पों की स्थापना और संचालन मे हिन्दू ही नही, मुस्लिम समाज ने भी बढ़ चढ़कर अपना सहयोग और अंशदान दिया था।
आज इस गोशाला मे लगभग 1200 गोवंश का संरक्षण हो रहा है। सारा गोवंश केवल देसी नस्लों का है, इनमे विदेशी गोवंश एक भी नही है। इस ऐतिहासिक गोशाला की एक शाखा मुंशी प्रेमचंद के गाँव लमही के पास स्थित है। इसे बावनबीघा के नाम से जानते हैं। यहाँ आज भी देसी नस्ल की लाल सिंधी गायों का रखरखाव होता है। इस शाखा के पास लगभग 110 बीघा जमीन है,जिसमे गोवंश के लिए चारा आदि की खेती होती है। कुछ हिस्से पर अगल-बगल के गांवों के वाशिंदे भी खेती करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस गोशाला की 28 बीघा जमीन का अधिग्रहण जबर्दस्ती कर लिया है और वहाँ सीवेज प्लांट का निर्माण करा रही है। लगभग 14 बीघे जमीन सड़क आदि और अन्य नाजायज कब्जों मे चली गयी है। इस मामले को लेकर गोशाला और प्रदेश सरकार आमने सामने खड़े हैं। गोशाला पर मुकदमों का अंबार लगा है। और महामना की विरासत, उनकी जुटाई हुई ज़मीनें अब विनाशधर्मी विकास के काम आ रही हैं। ये पूरा मामला केंद्र सरकार के सामने भी रखा गया है लेकिन गाय, गंगा और गीता के स्वघोषित पहरुए कान मे रुई लगाकर बैठ गए हैं। कल हमारी मुलाक़ात भाजपा के कर्नाटक से राज्यसभा सांसद वसवराज पाटिल से हुई। मैंने उनसे पूछा कि यह दृश्य आपसे कैसे देखा जा रहा है। उन्होने कहा कि सरकार ही आप लोगों ने चुनी है। इसमे कुछ नही हो सकता। सबै भूमि सरकार की। मैंने पूछा- क्या बीजेपी की सरकार आएगी तो ये जमीन गोशाला को वापस मिल जाएगी...? वे बोले- ना...! मैंने पूछा केंद्र सरकार तो गाय की ठेकेदार सरकार है, आपलोगों के हस्तक्षेप से भी नही....? बोले- नही भाई, अपने भुजबल से बचाये अपनी जमीन।
मेरी समझ कहती है कि देश की एक ऐतिहासिक विरासत खतरे मे है और देश की हो या प्रदेश की, सरकारों की असलियत सबके सामने है। विकास की नीतियाँ फाइव स्टार होटलों के लक्जरी कमरों मे मिल बैठकर बनाई जाती हैं, करोड़ों रूपये के नाश्ते खाने और कागज बर्बाद किए जाते हैं और सीवरेज प्लांट जैसे निर्माणों के पीछे कोई सार्थक और दूरंदेश पॉलिसी नहीं दिखाई पड़ती। आबादी के बीच बनाया जा रहा यह सीवेज प्लांट जो गाय की कीमत पर बन रहा है, आगे उसकी और बड़ी कीमतें भी चुकानी पड़ेंगी। एक बात और कल गोपाष्टमी का पर्व था, कितने हिंदुओं को पता है....
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