Sunday, 6 December 2015

आनंद और मौज मे अंतर

आनंद और मौज मे अंतर तो है ही। आनंद आ गया तो समझो आदमी सबकुछ पा गया। आदमी कोई भी हो, कहीं भी हो, जिंदगी का मजा तो आनंद पा जाने के बाद ही है। उसके बाद कुछ बचता भी क्या है। जीने का उद्देश्य ही यही है। आनंद अगर मिल गया तो फिर जाता नही, कहीं खोता नही। परमानेंट इन्स्टाल हो जाता है। सोफ्टवेयर जब भी गड़बड़ाता है, ये आनंद बहुत काम आता है। जब चाहो खो जाओ, जब चाहो सो जाओ, जब चाहे मिल जाओ, जब चाहे खिल जाओ। बड़ी करामाती चीज़ है आनंद। बहुत कारसाज़ कीमियागर भी है। सारे जतन उसी के लिए हैं तो सारे पतन भी उसी के लिए हैं, जतन-पतन दोनों उसी एक आनंद की खोज मे हैं। अब अलग बात है अगर जतन से पाया हो तो आनंद स्थायी जगह घेर लेता है लेकिन अगर पतन की राह चले हों तो आनंद के भ्रम मे मौज के गले जा लगते हैं। गलती करते हैं हम, जब आनंद की तुलना मौज से करते हैं। मौज का क्या है कि कभी आती है, कभी नही आती है, कभी आ गयी तो देर तक भी ठहर जाती है और कभी ठहर गयी तो फिर देर तक नही जाती है। आनंद का ऐसा नही है। जब वो आ जाता है तो खूंटा गाड़ के बैठ जाता है। वह स्थायी उपलब्धि है। मौज अस्थायी तरंग है। मौज पर तो इल्जाम भी हैं। मौज अगर लंबी ठहर गयी तो मौत को भुला देती है। अब कम से कम मौज मे आकर मौत को भूल जाने के तो खतरे भी हैं लेकिन आनंद मे आ गए तो कुछ याद रखने की जरूरत ही कहाँ रह जाती है। smile emoticon(.......यूं ही.....)

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