खामोश रहिए......! बनारस मे गंगा महोत्सव मनाया जा रहा है। हर साल मनाया जाता है। बिलकुल वैसे ही जैसे सैफई मे जन्मोत्सव मनाया जाता है। एकदम बिंदास; सरकार की खुशियों से सराबोर। खूब नाच गाना होता है। खूब धन धान्य लुटाया जाता है। दिल्ली बम्बई से वीआईपी कलाकार बुलाये जाते हैं। खूब खूब खूब झाप झूमर चलता है तीन दिन। अलग अलग तरह के सरकारी, अ-सरकारी ये मेले ठेले करने के लिए हम लोग अलग अलग घाट चुन लेते हैं। जैसे कि गंगा जी की आरती करने के लिए दशाश्वमेध घाट है। दुनिया भर को सुबहे बनारस दिखानी हो तो अस्सी घाट है और बेशर्मों की तरह गंगा महोत्सव मनाना हो तो रविदास घाट है। आज गंगा महोत्सव का तीसरा दिन है। खूब गीत संगीत होगा और करोड़ों रूपये गंगा की टूटती रवानी मे स्वाहा होंगे। पिछले तीन दिनों मे कई करोड़ हो भी चुके हैं। आज फिर ऊपर घाट पर होंगे नाचते थिरकते गंगापुत्र और गंगापुत्रियाँ और नीचे नदी के पेटे मे कुथ कुथकर कराहते हुए धीरे धीरे सरक रही होगी गंगा। हम उस देश के वासी हैं, जहां माँ बाप की बुढ़ौती के लिए वृद्धाश्रम होते हैं...और तिल तिल मरती गंगा के लिए आरती और महोत्सव। बिलकुल ऐसे कि जैसे कोई माँ बीमार हो,उसे इलाज की, सेवा की जरूरत हो और उसके बच्चे उसके सिर पर बैठकर आरती गा रहे हों, नाच रहे हों, ठुमक रहे हों और धुआं धुआंण से कोई तिलिस्म रच रहे हों। जादू टोने, झाड़ फूँक और ओझा सोखा के टोटके चल रहे हों। जिस तरह बिसूरती हुई गंगा के असह्य दर्द को अनदेखा करके ऊपर घाट पर ये नाच मजलिसें सजा ली जाती हैं, उसी तरह इस आनंदोत्सव का शोर पीती हुई मरणासन्न गंगा चुपचाप अगले घाट की ओर बढ़ जाती है...उसके साथ साथ बहते जाते हैं हजारों हज़ार नाले, सीवर, कचरे, सड़ांध, मल-मूत्र, मरी हुई मछलियां, फेंके हुए आदमियों के शव और उन्हे नोचते, खाते कुत्ते भी। गंगा शुद्ध हो रही है, गंगा साफ हो रही है, गंगा के ये चित्र गवाही करते हैं। गंगा महोत्सव इस साल भी पूरी रवानी पर है।--
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