Sunday, 6 December 2015

खुशियों का दिन आया है।

खुशियों का दिन आया है। उज्ज्वल पाण्डेय टॉप टेन मे आए हैं। बीए मास कम्यूनिकेशन की ऑनर्स डिग्री कुलाधिपति के हाथ से लेकर घर लौटे तो परिवार मे सभी के चेहरे खुशी से चमक उठे। ये तो पता था, मैंने आप सभी से साझा भी किया था कि इस बार उनके सत्तर प्रतिशत से ज्यादा अंक आए थे, पर ये नही मालूम था कि इन्होने वो पोजीशन भी हासिल की है, जिसने आज के दिन इनको विशेष बना दिया। साथ के छात्र छात्राएं हों, शिक्षक हों या खास तौर पर काशी विद्यापीठ की चीफ प्रॉक्टर श्रीमती कल्पलता पाण्डेय हों, आज तो ये सबकी आँखों के नूर बने हुए थे। काले गाउन वाले दीक्षांतों से अलग काशी विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह आज भी परंपरागत खादी के पीले रंग वाले गाउन और सफ़ेद गांधी टोपी मे होते हैं। ये फोटोग्राफ़्स देखिये बच्चों के चेहरे अपनी तीन सालों की मेहनत का ईनाम पाकर गुलाब गुलाब हुए जा रहे हैं। ...और अपनी तो क्या कहें, महसूस कीजिये कि इन चेहरों का सारा दर्प कैसे रफ्ता-रफ्ता माँ बाप के दिलों मे उतर आया है।
आप जानते हैं उज्ज्वल को डांटने की मेरी ख़्वाहिश ख़्वाहिश ही रह गयी। अपने काम की लगन के पीछे ये अपनी ढेर सारी बदमाशियां अपनी जेब मे लिए फिल्में बनाते रहे, फिल्म फ़ेस्टिवल्स करते रहे, बांसुरी बजाते रहे, अखबारों मे छपते रहे और मीडिया के राजकुमार बने रहे। हालात यहाँ तक पहुंचे कि कई बार, कई जगह ऐसे भी मौके आए जब हम कई समारोहों और कई मंचों पर इनके चलते पहचाने गए। खुश होते रहे, ऊर्जा भरते रहे, नसीहतें देते रहे और उनकी चुनी राह पर उन्हे स्वतंत्र जाने दिया। हस्तक्षेप मेरा केवल इतना ही कि जो मन आए करो, बस कुछ गलत न हो। .....लेकिन इसके आगे कुछ नही, न मेरा कोई और आग्रह, न इनकी कोई और जुर्रत...! हाँ एक बात जो दर्ज करने लायक है, वो ये कि उज्ज्वल पाण्डेय अपने कोर्स की किताबें नही पढ़ेंगे, चाहे कुछ भी कहते रहो। पूरा साल बिना पढे बिताकर हर पेपर की पिछली रात ये मेरे पास आए और बोले- पापा कल संविधान का पेपर है... पापा, कल मीडिया के सामाजिक सरोकार पर पेपर है...पापा, कल ये है....पापा, कल वो है। सच बताता हूँ गुस्से से तिलमिला जाता था मन, लेकिन अब तो मोर्चा सामने है। कुछ डांटने कहने का वक्त कहाँ है।
जैसे तैसे अखबारों की कटिंग्स, मेरी अपनी फाइल्स, लेक्चर, अंतिम समय मे जुटाई गयी गाइड्स और दोस्तों से ली गयी मदद को रात रातभर जागकर जेहन मे उतारा और अगले दिन का पेपर दे आए। हम हमेशा यही धमकाते रहे कि यार पढ़ ले कुछ। मुझे नंबरों की बहुत दरकार तो नही है, लेकिन जानता हूँ तेरा जेहन अच्छा है। कुछ पढ़ लेगा तो गोल्ड मेडलिस्ट भी बन सकता है। पढ़ के फेल भी हो जा तो मंजूर लेकिन बिना पढे परीक्षा का सामना कैसे होगा। ठीक है, रिजल्ट के बाद बात करूंगा तुमसे। ..... और दोस्तों, आप देख ही रहे हैं, रिजल्ट के बाद बात करने की नौबत कभी नही आई, आज भी नही आई। फाइनल डिग्री मिलते मिलते ये टॉप टेन मे जगह बना ले गए। हमे लगता है कि परीक्षा के पहले वाली रात के अलावा अगर इन्होने दस दिन भी पढ़ाई की होती तो आज ये टॉप भी करते। टॉप टेन मे आए जिन बच्चों के नाम मुझे अभी याद आ रहे हैं, उनमे हर्ष गुप्ता ने गोल्ड मेडल पाया है। अंकिता जायसवाल ने दूसरी जगह पायी है। नीरज जोशी और उत्कर्ष सिंह संयुक्त रूप से तीसरी जगह पर हैं और तूलिका कुशवाहा चौथे स्थान पर रही। सुमित सिंह पाँचवीं, आयुष सिन्हा छठवीं, सुहेल अहमद सातवीं, अक्षरा अग्रवाल आठवीं और उज्ज्वल पाण्डेय अंतिम नौवीं पोजीशन पर रहे। इन सभी ने सत्तर प्रतिशत से अधिक अंक पाये हैं और इनकी पोजीशन्स के बीच कुल तीस अंकों का मामला है बस। इन्हे आशीर्वाद दीजिये। इन्होने अपने फन मे मास्टरी दिखाई है। तुम सबको मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ बच्चों।

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