पूरब के ईशान से उतरती है तो सूरज की पहली किरण प्रह्लादघाट मे नही, वाराणसी के आदि केशवघाट पर पड़ती है...और इसी पहली किरण के साथ शहर मे प्रवेश करती है अपने-अपने सिरों पर अपने-अपने रोजगार लादे ग्रामीण आबादी की भीड़। इनके सिरों पर आलू, बैगन, पालक, मूली, टमाटर, सोया, धनिया, मिरचे के अलावा मछलियाँ भी लदी होती हैं। वरुणा पार सरायमोहाने से हर रोज़ जनसंख्या का एक बड़ा हुजूम चलता है सुबह-सुबह और जीटी रोड पहुँचने तक कोई और साधन न होने के कारण पैदल ही चलता है। एक जमाने मे आदिकेशव घाट से मैदागिन तक के लिए तांगे चला करते थे और लाल खाँ रौजे से नीचे उतरकर काशी यार्ड से होते हुए रेल लाइन पार करके शहर मे चले जाते थे। 1950 के आसपास का ये चित्र अपने शब्दों से खींचा कोटवा गाँव निवासी 85 वर्षीय एक बुजुर्गवार ने। बनारस मे प्रवेश करते हुए राजघाट रेलवे पुल पार करते ही काशी स्टेशन से ठीक पहले की यह क्रॉसिंग मानव रहित तब भी थी, जब यहाँ से तांगे गुजरा करते थे और अब भी है जब पुरानी तमाम परिपाटियाँ और जीवन प्रसंग एकदम से बदल गए। अब हालांकि यह रेलवे यार्ड कोयले की धुन्ध से हरवक्त पटा रहता है और तांगे भी अब नही चलते हैं लेकिन पीढ़ियों पुरानी इस राह पर लोगों का आना जाना अब भी नही रुका है। मानव रहित इस अघोषित रेलवे क्रॉसिंग से हर रोज़ हजारों लोग गुजरते हैं और स्टेशन परिसर से होते हुए अगल-बगल बने कई रास्तों से बाहर निकल जाते हैं।
इधर दो दिन से इस तरफ से आना जाना मुश्किल हो रहा है। यहीं बगल के महिषासुर घाट पर प्रधानमंत्री मोदी और शिंजों अबे के लिए जलमंच बनाया जा रहा है। अब आज उसे तैरा के दशाश्वमेध घाट ले जाया जाएगा। इसी मंच पर बैठकर नदी की ओर से मेहमान प्रधानमंत्री को आरती दिखाई जानी है। वीवीआईपी सुरक्षा के कठोर मानकों के चलते ये इलाका भी संगीनों के जबर्दस्त साये मे है। कल आरपीएसएफ़ के जवान लोगों को इस रास्ते पर आने जाने से कानूनी भाषा मे मना कर रहे थे। रेलवे परिसर मे बिना टिकट कैसे..? जिंदगी भर मे जिनका इस रास्ते पर ऐसे किसी सवाल से वास्ता ही नही पड़ा, वे क्या जाने कि इधर से आने जाने के लिए अब टिकट लेना पड़ेगा। एक होशियार लड़के ने कह ही दिया टिकट ले के आयें तो जाने देंगे क्या...? इसके बाद इन लोगों की कानूनी बोली बदल गयी। बोले- इधर से नही जा सकते दो दिन। वे लोग बस ये नही बोले कि पीएम आ रहे हैं आरती देखने सो बाकी लोगों का आना-जाना, रहना-जीना, हँसना-बोलना सब मुल्तवी कर दिया गया है। हमने ये सीन देखकर पहले ही अपना रास्ता बदल दिया और बगल की सीढ़ियों से नीचे घाट पर उतर आए। घाट के नज़ारे जन कलरव से थोड़ा अलग होते हैं। साइबेरियन पक्षियों की बारात लगी हो जैसे। हमने देखा हर नाव को घेरे उड़ रही इन चिड़ियों के शोर और स्वच्छंद अठखेलियों पर तो प्रशासन का ध्यान ही नही है। वे तो उड़ भी रहे हैं, खेल भी रहे हैं, चिल्ला भी रहे हैं, खा भी रहे हैं, नहा भी रहे हैं। आज जिस शहर मे केवल जापानियों को आदर व जगह नसीब है, उस शहर के घाटों पर इन विदेशी पंछियों की उड़ानों को तो रोका ही नही गया। अब इतनी असुरक्षा तो फिर रह ही गयी कि कोई पंछी शाम को उड़ता हुआ वीवीआईपी मंच के ऊपर से भी गुजर सकता है। तब क्या होगा...!
खैर, मुझे यकीन है कि प्रशासन मुस्तैद है और शाम होते होते चिड़ियों को भी उड़ने की मनाही जारी कर दी जाएगी। वो तो कहिए बीमार गंगा के सिर पर आज दशाश्वमेध पर महाआरती का आयोजन है, वरना उधर से तो आज गंगा को भी गुजरने नही दिया जाता।
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