इस देश की आम जनता का मूल स्वभाव आम तौर पर बहुत मानवीय है और यही असल बात है। निजी स्तर पर लोक आचरण मे कोई कुछ भी सोचता, करता हो, लेकिन समग्रता मे हमारा राष्ट्रीय मानस पूरी तरह धर्म निरपेक्ष और सहिष्णु है। क्योंकि यह निरपेक्षता और सहिष्णुता कोई आयातित वस्तुएं नही, स्वजनित चारित्रिक गुण हैं। इसका पहला सबक जिंदगी के बहुत पहले ही क्षण मे हर माँ अपने दूध मे ही घोलकर पिला देती है अपने बच्चे को। उसमे ममता, धीरता, प्रशंसा, वात्सल्य, साहस और न्योछावर होने के गुण तो रक्त से ही मिल जाते हैं। बड़ा होते होते वो अपने आसपास अधिकतर प्रेम ही पाता है, प्रेम ही देता है और प्रेम ही महसूस करता है। दुनियादारी के ये आवरण तो उसे होश संभालने के बाद से घेरने लगते हैं। अपने समाज का लोक आचरण भी देखता है और बड़ा होते होते वह किताबों के संपर्क मे भी आता है, दुनिया मे नए नए आए बच्चे को अपनी जानी पहचानी दुनिया मे जीने का बेहतर ढंग सिखाने वाले शिक्षकों के संपर्क मे आता है और उसके व्यक्तित्व मे तर्क समाने लगते हैं, अपने मूल स्वभाव से विपरीत दुनिया मे मिलने वाली फिर हर नयी जानकारी उसे चौंकाती है। उसका मन बनाती है और धीरे-धीरे दुनिया उसे दुनियदारी के रंग-ढंग सिखा देती है। फिर इन जानकारियों से टकराता है उसका मूल स्वभाव और गॉड गिफ्टेड उसका अपना विवेक। ये तीनों मिलकर आदमी के वैचारिक और तदनुसार व्यावहारिक जीवन की दिशा गढ़ देते हैं। फिर वो भाजपाई हो जाता है, कोंग्रेसी हो जाता है, सपाई, अपाई, बसपाई या समाजवादी, राष्ट्रवादी कुछ भो हो जाता है। फिर वो कट्टर भी हो जाता है, अतिवादी और आतंकवादी भी हो जाता है, साधु, फकीर, सन्यासी भी हो जाता है। ...और फिर ये सब मिलकर एक दिन फेसबुक पर आ जाते हैं... smile emoticon बाकी की दुनिया अपने उसी मूल स्वभाव मे जिंदगी की जंग चालू रखती है।बिलकुल धर्म निरपेक्ष....! और बिलकुल सहिष्णु...!! अपवाद कहाँ नही होते.....!!!
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