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ये पूर्वी यूपी और बिहार के सुदूर देहातों मे गायी जाने वाली लोकधुनों मे से एक धुन है, एक शुद्ध गंवई गीत का मुखड़ा है। जब फगुनहटा चढ़ता है, तो पुरुष जहां एक तरफ भौजाइयों और सालियों के साथ काल्पनिक और सांगीतिक रासलीलाए रचाने लगते हैं तो दूसरी तरफ महिलाएं भी इस तरह के देवरों, जीजाओं वाले गीतों से मन के मौसम की गांठें खोलती हैं। और ये कोई आज से नही, युगों से चल रहा है। ऐसे मे पूरे साल ज़ोर ज़ोर से बोले जाने वाले कुछ शब्द जैसे कि सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता, पवितनता आदि के शाश्वत पैमाने कुछ दिनों या महीनों के लिए गाँव से बाहर सिवान के खेतों मे पानी भरने चले जाते हैं। ...और ये देवर भौजाई वाले जहर बुझे तीरों से घायल वो साजन, मनभावन, सइयाँ, बलमुआ टाइप के लोग दुआरे पर तने हुए पुआल के टीलों पर कलइयाँ मारने लगते हैं। आइये कुछ स्त्री विमर्श करेंगे.....? smile emoticon smile emoticon smile emoticon
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