Saturday, 19 March 2016

मेरा गाँव 1

मेरा गाँव नही जानता जेएनयू और कन्हैया। लेकिन मेरा गाँव बसंत और फागुन जानता है। मेरा गाँव रंग और भंग की भाषा बोलता है। भंग की तरंग सिलबट्टों पर घोट रहा है मेरा गाँव। मैना मिसिर की टुटही मड़ई उठा ली गयी है होलिका दहन के लिए और मैना मिसिर लाठी लिए पछिया रहे हैं फगुआए हुए छोकरों को। लड़के उनको चिढ़ा चिढ़ा के भाग रहे हैं। इधर टीवी गाँव मे न्यूज़ बाँट रहा है- कन्हैया ने कहा है कश्मीर मे सैनिक......और उधर धनुआ बो गोबर मे माटी सान के बाल्टी मे पानी भर रही है। पांडे बाबा एहरे से जइहें कथाबाँचे। बसंत का छेड़ा हुआ गाँव मतवाला हो रहा है। आँखेँ आम के बौर पर और निगाहें अंदर उमड़ते शोर पर हैं। फागुन का खूंटा गड़ गया है गाँव की सरहद पर। ढोलक के स्वर रातों का अंधेरा चीरने लगे हैं। भाभियों ने देवरों से रंग मंगाकर रख लिए हैं। बाल्टियों मे उमंगें घोली जा रही हैं। मृदंगों की डोरियाँ कसी जा रही हैं। ....मोरे सइयाँ नदान, मोरे सइयाँ नदान, मै तरुणी हरि छोटे...! बाल मंडली गलियों मे उतर आई है और फगुआ गा रही है। अंगना मे कुइयाँ खनइबों हो, रेशम लागे डोर, रेशम लागे डोर, झमक के पनिया भरबों भरबों भरबों हो, देखिहें राजा मोर, देखिहें राजा मोर, मै तरुणी हरि छोटे। गाने के बोल सुनकर मन डोल रहे हैं। नव तरुणियों की आँखों मे उल्लास की गमक है। टखनों तक धोती लहराते, एक खूंट हाथों मे पकड़े मास्टर साहब मुस्की मारते चले आ रहे हैं। उन्हे धनुआ बो की तैयारी का पता नही है। छपपाक...! गोबर माटी का पूर्व नियोजित आक्रमण। मास्टर साहब बिलबिला उठते हैं। सामने से बड़की भउजी आ रही हैं। अमवा बोलै कोयलिया, बनवा बोलै मोर, बनवा बोलै मोर, छप्पर पे बोलै पपीहरा पपीहरा पपीहरा, कुहूंकै जियरा मोर कुहूंकै जियरा मोर, मै तरुणी हरि छोटे। मास्टर साहब का पछोटा हाथ मे है। भागते भागते भी भउजी की बाल्टी का रंग बरसकर धो देता है उनको। इधर किशोरियों की टोली अपने ही खुमार मे है। नउआ आवे बरिया हो, बभना फिरि जाय, बभना फिरि जाय, भइया ना धरें सुदिनवा सुदिनवा सुदिनवा, मोसे रहलों न जाय, मोसे रहलों न जाय, मै तरुणी हरि छोटे। होली भले अभी एक पखवाड़े बाद है, लेकिन होली की तरंग गाँव मे उतर आई है। लोग एकदूसरे को देखकर झुट्ठे मुस्किया रहे हैं। हर आदमी दूसरे को ऐसे देखता है जैसे उसने भांग छान रखी हो। दूर कहीं बिरेन्दरा गोंड गोडउत नाच रहा है। ढोलक, झाल का मिला जुला स्वर जैसे जलतरंग सुन रहे हों.....अब ना रहब ए सइयाँ....माटी के घर मे....पक्का पिटवा दा बलमुआ.....पटना सहर मे..... smile emoticon

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