गाँव जाइए तो पता चलता है कि गीता कुरान और ईश्वर अल्लाह की कसमें खाकर 68-69 साल से राजधानियाँ हम गाँव वालों से केवल झूठ बोल रही हैं। देर रात तक जागने और गए दिन तक सोने वाली ये राजधानियाँ असल मे ऐयाश हो गयी हैं। दिन की शुरुआत 4,5 बजे भोर मे अगर कहीं होती है तो आज भी हमारे गांवों मे होती है। चिरई-चुरमुन, गइया-बछवा, हउदी-चरनी, ताखा-ओसारी, चूल्ह-चउकी, कूंचा-दलान, डहर-सिवान, खेत-खरिहान, लइका-सयान, बुढ़वा-जवान, मरद-मेहरारू....ठीक इसी समय यहाँ सब के सब एक साथ झटक देते हैं वह अंधेरा, जिसे सूरज की ललाई तोड़ती है सुबह-सुबह। राजधानियाँ झूठ बोलती हैं कि ये अंधेरे हमने तोड़े हैं, ये जागरण हमने जोते हैं और ये उजाले हमने बोये हैं। नही साहब, गाँव अंधेरे मे सीना जानता है, गाँव ज़िंदगी जीना जानता है। आज भी भोर मे हमारे गांवों से निकलती है औरतों और मर्दों की पांत गाँव के पूरब और पच्छिम की ओर और खोज लेती है खांवा और खोह, डाँड़ और मेड़ की आड़, बाग-बगइचा, मूँज, पतलो, झाड़ी-झंखाड़, बंसवार और पेड़ की आड़। राजधानियाँ झूठ बोलती हैं कि हमने शौचालय बनवा दिये हैं गाँव-गाँव। राजधानियाँ झूठ बोलती हैं कि बनवा दिये हैं हमने हर गाँव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाले संपर्क मार्ग। गाँव आज भी कच्चे चकरोडों पर चलता है हर और हेंगी के साथ, सइला और जुआठ के साथ, पूंछ, पगहा और पैना के साथ। हरे रे हट्ट हट्ट ... अरे जा बेट्टा दहिना रे....! गाँव जोतता है अपने खेत, चीरता है अपनी मिट्टी और उगाता है अपना अनाज। गाँव नहाता है ओस मे भोरे भोर और लथरा जाता है खेतङी माटी मे सुबह सबेरे आज भी रोज। उधर सिवान मे बजते हैं फरसे और कुदालें, थिरकती हैं खुरपियाँ और गोड़ती हैं लहसुन पियाज़ के खेत इधर आँगन मे नहाती है साढ़े चार गज की साड़ी मे ढँकी, छुपी गृहस्थन। जल उठती हैं अगरबत्तियाँ, मुसकुराती है चौरे के अंदर से तुलसी, अलमारी के कपाटों मे बिहंसते हैं ठाकुर जी और पोतनहर की लिपाई से चहकती है चूल्ह। अदहन खदबदाता है, खेत से आई रहर की दाल चूरती है और फफनती है तसली के मेखड़े से ऊपर, गमक उठता है अंगना और महक उठती है रसोई। गंदले गदेलो के सिर पर अब छोटी छोटी गठरियाँ हैं। घरों ने खेतों को खरमेटाव भेजे हैं। अंधेरा तोड़ते, ललाई फोड़ते कपार पर आ रहा है सूरज और खेतों की मेडों पर नून मरचा लहसुन की चटनी मे रोटियाँ छुआते हाथ धूल झाड़ते हैं। खेतों की मेडों पर उठते हैं गप्पसड़क्के और माहौल बनाता है फागुन। सामने गेंहू की लोट रही फसल आँखें मीजती है। रात की आँधी और बारिश की खीझ पूरी फसल पर है। लेकिन वो गाँव ही है कि मौसम की मार और कल की रोटी पर हुए इस अत्याचार के बाद की कहानी फिर सँजो रहा है। अतीत को झटककर मेरा गाँव अपने खेतों मे भविष्य के बीज बो रहा है। राजधानियाँ झूठ बोलती हैं कि सब राजी खुशी है...गाँव मे आइये मेहनत यहाँ अपनी तंगहाली के खिलाफ जी जान से जुटी है। राजधानियाँ झूठ बोलती हैं कि राजा के राज मे सब अमन चैन है और रिआया दूध भात खाती है। इन बेशर्मों को शर्म भी नही आती है।
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