Saturday, 19 March 2016

मन फगुआया, तन फगुआया


तन तरुण सा हुआ, लाल लोचन हुए 
प्रीतिमय मन मेरा बांवरा हो गया।
उम्र घायल करे दुष्ट पछुआं पवन,
बीतरागी का मन भी हरा हो गया।
देह के राग पर प्रेम सतरें लिखे,
काम की चोट से हो रहा आचमन,
बाग मे फूल को ऐसे चूमे भ्रमर,
जैसे मुखड़ा लिखा, अंतरा हो गया----1
मन छुआ तो लगा तार कोई छिड़ा,
तन छुआ जलतरंगें बजीं रातभर।
होंठ चूमे तो उमड़े युगल रसकलश,
छलछलाती रही वारुणी रातभर।
हाथ से हाथ भर बात जब रह गयी,
जिस्म की जुंबिशें धड़कनों से मिलीं।
रेल पुल पर से होकर गुजरती रही,
पटरियाँ थरथराती रही रातभर----2

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