आज हम बसंत पर लिखेंगे बस। सोच लिया है। एकदम पक्का। सीधी लाइन पकड़ेंगे। रास्ते से टस से मस नही होंगे। इधर कलम उठाई नही कि ये मुई पॉलिटिक्स जब देखो मुंह बा के सामने खड़ी हो जाती है। ज्योंही बसंत की कल्पना शुरू करता हूँ, ये असली मुद्दे से भटका देती है और बिना टिकट के लिए दिये जेएनयू मे ले जाकर पटक देती है। लेकिन हम भी धूल झाड के खड़े हो जाते हैं हर बार और इस बार तो कमर भी कस ली है। नही लिखेंगे स्मृति ईरानी पर, कुछ नही बोलेंगे मायावती पर। मरकहवा बरध की तरह मोदी हों, चाहे मकनाता हुआ बछरू अखिलेश हो, इन लोगों का तो नाम भी नही लेंगे, नाम लेना तो दूर यार, सोचेंगे भी नही इनके बारे मे। आज तो हम बस बसंत लिखेंगे, बसंत गाएँगे, बसंत ही ओढ़ेंगे और बसंत ही बिछाएंगे। कहाँ तो ये छिछोरी पॉलिटिक्स और कहाँ ये नवहा छैल छबीला बसंत। नशा बांटता हुआ चलता है। लंबे लंबे डग भरता, नन्द के नाहर-सा कंधे उचकाता बेफिक्री के आलम मे उछलता, उछालता, गर्दा मचाता आता है और बाग वन कूप तड़ाग सबमे स्पाइडरमैन की तरह सरक के उतर जाता है। पॉलिटिक्स उसकी राह रोकने के हज़ार से कम जतन नही करती लेकिन अपना बसंत ठहरा लंगोट का एकदम पक्का। उड़ती हुई नज़र भी नही डालता इस नगरवधू पर। हर चतुर पोलिटीशियन की बाँहों मे खेलती पॉलिटिक्स के हरजाईपन पर बेहद खफा है बसंत। उसके हिस्से का आकर्षण लूटती है पॉलिटिक्स तो बसंत की त्योरीययाँ चढ़ जाती हैं। इसलिए उसके नयन बाणों से खुद को बचाता बसंत कल लाखनऊ के राजभवन की छत पर जा उतरा। अब राजभवन मे तो कोई पॉलिटिक्स होती नही इसलिए उसने इसे माकूल जगह समझा और वहीं छत पर अंगड़ाई ले बैठा। हसीनों के दिल चाक हुए सो हुए, मकान मालिक को भी शरम आ गयी। लजाकर जरा बूढ़ी सी अदा मे मुस्कुराए और बसंत को एक कनखी मारी। बसंतवा एकदम से अचकचा गया। उड़ान लेने की सोच ही रहा था कि तबतक नज़र पड़ गयी- राजभवन के अहाते मे हरे, पीले फलों और सब्जियों के स्टॉल उतरने लगे। परेशान न होइए हम अभी भी तय किए बैठे हैं कि इस पोलिक्स पर कुछ भी बोलने से बचेंगे। इसीलिए निगाह आज राजभवन से भटककर कहीं और जाने नही देंगे हम। वहाँ राजभवन मे पॉलिटिक्स नही होती, इस बात की गारंटी तो संविधान भी देता है और हमे ढेरों सारी गारंटियाँ देने वाले अपने इस संविधान मे गहरी से गहरी आस्था रखने की आदत है। तो भाई बसंत राजभवन की छत से लॉंन मे उतर आया। उतरते ही उसे पॉलिटिक्स की गंध मिली। चुनावों की दिशा मे बढ़ते प्रदेश की धरती पर बसंत की पोलिटिकल अभ्यर्थना का कार्यक्रम समझ मे आया। बसंत थोड़ा चकराया कि तबतक देखा तो मकनाते हुए बछरू का वीआईपी रेला अंदर प्रांगण मे आया। बसंत अब निरीक्षण भाव के मोड पर पहुंचा और सब्जियों की हरी पट्टियों मे छिपकर सांवला हो गया। ये बसंत को सेलिब्रेट करने का अ सरकारी कार्यक्रम है। लेकिन फिर भी उदघाटन तो होगा। नवाबों की लखनवी तहजीब साक्षात प्रकट हुई। वो बोले पहले आप। वो बोले पहले आप। तो पहले आप उठे और माइक पकड़ा। बोले--मुख्यमंत्री को विधानसभा की रोज की किचकिच झेलनी पड़ती है सो उनके मन की हरियरी के लिए बसंत का स्वागत करने बुलाया है। फिर वो भी बोले- महामहिम के लखनऊ आने से यूपी महाराष्ट्र करीब आए हैं। बीक टू बीक इस प्रेमालाप मे पॉलिटिक्स की गंध फूटते देख पत्तों के नीचे से निकलकर भागा बसंत और हजरतगंज के चौराहे पर खड़े होकर गाने लगा----
उफ दगा दगा धोखा धोखा छल की फोकटबाजारी है।
अबकी चुनाव जनता का है और पक्की हार तुम्हारी है॥
हम अभी भी तय किए बैठे हैं कि लिखेंगे तो बसंत पर ही....वरना नही लिखेंगे।
उफ दगा दगा धोखा धोखा छल की फोकटबाजारी है।
अबकी चुनाव जनता का है और पक्की हार तुम्हारी है॥
हम अभी भी तय किए बैठे हैं कि लिखेंगे तो बसंत पर ही....वरना नही लिखेंगे।
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