मात्र तीस से पैंतीस साल पहले का समय याद कीजिये। घरों मे टीवी नही था। मोबाइल का अता पता ही नही था। कंप्यूटर नाम की एक मशीन है जो अमेरिका आदि मे है, ऐसी खबरें तब के ब्लैक एण्ड व्हाइट अखबारों मे छपा करती थीं। इन्टरनेट और फेसबुक जैसी चीजें हमारी आवश्यकता की थी ही नही, इसलिए कल्पना मे भी नही थीं। हम बंधनों मे रहते थे। परंपरागत ग्रामीण अनुशासनों की जद मे, तमाम पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों के दायरे मे रहकर भी कितना खुला आसमान मिलता था, ये अब जाकर तब महसूस होता है जब जिंदगी के रास्ते आजादियाँ तो हज़ार मिलीं, पर जकड़न भी बहुत मिली। गौर से देखिये तो दुनिया मुट्ठी मे है लेकिन मन सभी का घुटन मे है। जीवन की चाल तो तेज हो गयी लेकिन गति से लय खत्म हो गयी। नवजात से लेकर वयोवृद्ध जन तक, छोटी लड़कियों से लेकर बड़ी बूढियों तक हरेक के हिस्से मे एक व्यग्रता है, एक अनिश्चितता है, एक बेचैनी है, एक असुरक्षाबोध है और पग पग पर खतरे हैं। औद्योगिक विकास की इस महायात्रा मे हम कहीं बेसलाइन से हटे जरूर हैं। कुछ पुराना सा महसूस होता है, जिसपर पकड़ नही रही, कहीं कुछ तो है जो छूट रहा है। मेरे बाबा कहते थे कि जीतो चाहे हारो, लेकिन मूल जोखिम न बिगाड़ो। मूल जोखिम यानी जैसे चाहो जियो, दोस्त बनाओ, दुश्मन बनाओ, लड़ाई करो, झगड़ा करो, दीवानी करो फौजदारी करो, लेकिन मौके पर प्रेम से हाजिर रहो। बड़े बुजुर्गों के पाँव जरूर छुओ, औरतों से इज्जत से बात करो, बच्चा किसी का भी हो,उसे प्यार से देखो, चिड़ियों के लिए दना पानी जरूर रखो, गाय गोरू दुश्मन का भी अंझुराया दिखे तो पगहा खोल दो, खेत मे अनाज किसी का भी नुकसान हो रहा हो, तो पशु को हांक दो, पेड़ दुश्मन का भी सूख रहा हो तो एक लोटा पानी डाल दो, पेड़ से दातून तोड़ो चाहे फल, उसपर डंडा न चलाओ, बेटी दुश्मन की भी हो तो गाँवभर की बेटी है, दामाद किसी मजूर, मुसहर का भी हो, तो उसे वही भाव दो......। लेकिन अब वो बात नही है, वो सिखावन नही है, वो संस्कार नही है, कहीं नही है। आज़ादी तो आई, पूरे धज के साथ आई और बेशुमार मात्रा मे आई, पर घुटन कुछ ज्यादा ही दे गयी, हमसे हमारा खुला आसमान छीन ले गयी। मेरी ज़िंदगी मे वो एक जगह आज भी है, जहां मुझे मेरा खुला आसमान मिल जाता है, माँ के पास चला जाता हूँ। आपको भी मिल जाएगा। माँ के पास जाइए तो सही।
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