Saturday, 19 March 2016

घुनों का आक्रमण और मेरा मुकदमा


 मेरे घर पर इन दिनों घुनों ने हमला किया हुआ है। पूरे घर मे जहां देखिये फर्श से लेकर बिस्तरों तक, अलमारियों, दीवारों और छतों तक बस इन्ही के काफिले हैं। काले-काले और छोटे-छोटे से रेंगते हुए ये घुन बहुत कुछ बिगाड़ भले नही पाते हैं लेकिन संख्याबल के साथ हैं तो एक माहौल तो बनाए ही हुए हैं। कभी कभी पैरों के नीचे आ जाते हैं तो बेचारे पिस भी जाते हैं। जब जब कोई घुन पिसा है, मैने हरबार यही सोचा कि शायद अब भाग जाएँगे लेकिन अबतक तो ये मेरी भूल ही साबित हुई है। अब जो पिसने से डर जाय वो भी भला घुन क्या हुआ। आप चाहें तो सामूहिक संहार ही कर डालिए, लेकिन वे हैं कि बदस्तूर चीनी सेनाओं की तरह उतराते जाते हैं, बढ़ते आते हैं। घर मे आजकल सबके जिम्मे एक अतिरिक्त काम ये बढ़ा हुआ है कि जो चाहे, जब चाहे एक झाड़ू उठा ले और पूरा घर बुहार आए। अगर पूरा घर बुहार दें तो कम से कम पाव भर घुन तो निकल ही आएंगे। लेकिन अजीब मुसीबत ये है कि एक जगह टिकते भी नही, बटोरकर कहीं एक जगह करते ही फिर भर्र से चल पड़ते हैं। ले जाकर कितना भी दूर कर आयें, घंटा भर बाद देखिये तो रेंगते रेंगते फिर दरवाजे पर और सरकते सरकते फिर दीवारों पर। किसी से कहने मे भी शर्म आती हैकि घुनों ने हमला किया हुआ है। कोई सांप, बिच्छू होते तो कहते भी बनता। घुनों ने आक्रमण किया है, ये सुन के ही लोग हँसना शुरू कर देते हैं।
आखिर ये आ कहाँ से रहे हैं, पता करना चाहा तो पता ये चला कि वो मेरी पड़ोसन हैं जो अक्सर पाकिस्तान की तरह व्यवहार करने लगती है। उनके गेंहू के कंटेनर मे घुन घुस गए हैं, जबतक उनको यह पता चला, तबतक चौथाई गेंहू आटे, चोकर और भूंसी की शक्ल मे रूपांतरित हो चुका था। उनके घर तो भूकंप ही आ गया जैसे। पूरा घर लपट गया। धो धो के गेंहूँ छतों पर सुखाया गया, कंटेनर को धूप दिखाई गयी और घुनों को पड़ोसियों की सेवा मे छोड़ दिया गया। जब मैंने उनसे कहलवाया कि ये घुन आप ही के घर से आ रहे हैं तो उन्होने पूरे पाकिस्तानी अंदाज़ मे कहलवा भेजा कि सबूत दीजिये। वे लोग भी यह बात मानते हैं कि हम भी अक्सर हिंदुस्तान की तरह व्यवहार करने लगते हैं। एक से एक और कड़ी से कड़ी चेतावनियाँ देने लगते हैं। एक दिन मैंने सबको बुलाकर दिखाया भी कि ये देखिये इन घुनों का यात्रा पथ...! ध्यान से निरीक्षण कर लीजिये। ये चले घुन आपके स्टोर से ....और ये यहाँ चौराहा बनाया .....और ये यहीं से भिन्न भिन्न दिशाओं मे बढ़ लिए। भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश पूरा पड़ोस परेशान है। लेकिन पाकिस्तान ये मानने को फिर भी तैयार नही कि ये घुन उसकी जमीन से ही आ रहे हैं। और नही तो मामले का अंतर्राष्ट्रीयकरण भी कर रहे हैं। एक दिन झाड़ू लगाते हुए हमारी फोटो खींचकर मुहल्ले भर को दिखाया कि देखिये अपने घर के घुन बटोरकर मेरे घर की ओर डाल रहे हैं। अब हिंदुस्तान उन्हे बातचीत की मेज पर बुलाना चाहता है, लेकिन घुनों के सहारे अपनी आक्रमण योजना से फिलहाल वे खाली नही हो पा रहे हैं और इधर हम हज़ार जुगतें तलाशने मे लगे हुए हैं। झाड़ू मारते मारते थककर कभी पानी डालकर बहाने की कोशिश करते हैं। दस मिनट मे सब नालियों मे बहने भी लगते हैं लेकिन रक्तबीज की तरह दस मिनट बाद ही देखिये तो उनकी दूसरी टुकड़ियाँ फिर दरवाजे पर। अब एक दिन मैंने घुनों के प्रतिनिधिमंडल से ही बात करने की सोची और संधि पत्र भिजवाया तो उनका जवाब आया कि हमलोग शांतिप्रिय लोग हैं और अपने काम से ही हमे फुर्सत नही है। मुझे भी अंततः मामला उनकी बिरादरी मे ले जाना पड़ा। सभी प्रकार के जोंकों, किलनियों, घुनों, मच्छरों और अंठया, अँठई को बुलाया गया और पंचायत बैठी। मैंने पंचों के सामने इस नाहक घुनाक्रमण का प्रश्न रखा और घुनों के नेता से सफाई मांगी गयी। सबसे नुकीली सूंड वाले उनके सरदार घुनाधिराज ने ऑबजेक्शन किया- रक्त पीने वाली इन जोंक आदि जातियों के साथ हमारी पंचायत क्यो बुलाई गयी है...? दुनिया जानती है कि हम तो पानी भी नही पीते। ऑबजेक्शन सस्टेंड हो गया...!
न्यायाधिपति आर्य मच्छर ने मुझसे सवाल पूछा—आपने इन गुट निरपेक्ष घुनो पर आक्रमण करने का आरोप लगाया है। आक्रमण से हुए नुकसान का ब्योरा दीजिये। नुकसान...? अब तो मेरी अक्कल चकरायी। यकबयक मुझे कुछ नही सूझा। नुकसान जैसी कोई चीज़ हुई भी तो नही। लेकिन मैंने किसी कुशल वकील की तरह अपना मुकदमा संभाला। मेरा बयान नोट किया गया—एक तो ये लोग झुंड मे आते हैं और दिनरात मेरे घर मे पड़े रहते हैं। हमारे पाँवों के नीचे पिस जाते हैं। ऊपर से हमारे बीवी बच्चों को हरवक्त झाड़ू लगाते रहना पड़ता है। न्यायमूर्ति ने घुनाधिपति की ओर देखा। वे मूंछों मे ही मुसकुराते हुए उठे और गंभीर आवाज़ मे बोले—अभियोजक का बयान हास्यास्पद है। इतनी कवायद के बाद भी अभियोजन अभी तक ये नही बता पाया कि हमारे बाल बच्चों ने इनका नुकसान क्या किया...? क्या अपने ही घर मे दो चार बार झाड़ू लगा देना किसी तरह का नुकसान कहलाता है...? जैसा कि वादी ने खुद भी स्वीकार किया है कि हम खुद ही उनके पैरों तले पिस जाते हैं। प्वाइंट नोट किया जाय आर्य। हम या हमारी प्रजा इन्हे या इनके परिवार को पीसते नही, बल्कि खुद ही पिस जाते हैं। ये हिंदुस्तान की सरकार की तरह हमे घेरने वाले भूल गए कि हम हिंदुस्तान की जनता की तरह सदियों सदियों से पीसे ही जाते रहे हैं। खुद कोई नुकसान कभी नही किया इनका। ले देकर हमारे पास केवल यह संख्याबल है जो इन्हे बर्दाश्त नही होता। जब भी हम एक साथ निकलते हैं, इनका इंद्रासन डोलने लगता है और ये नाहक हमपर मुकदमों की झड़ी लगा देते हैं। घुनों के इस जोरदार जवाब के बाद अदालत की निगाह मेरी ओर उठी और अचानक से मैंने अपनी निगाह अपनी फाइलों की ओर मोड़ ली। मुझे जवाब देना था। ...............खोजकर जवाब देता हूँ मित्रों। फिलहाल मुकदमा मुल्तवी है।

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