यह कहावत हमारे आपके गांवों मे आज भी कही जाती है। मतलब ये कि सूअर को कितना भी नहला धुला सजा संवार के रखिए, वो गंदगी मे मुंह जरूर मारेगा। गिरगिट की गरदन की चाल देखिये। उसको माला पहनाने का फायदा है कोई...?अब यह लड़ाई उस गर्त मे चली गयी है, जहां जाकर आदमीयत अपने लिए शरण खोजती है। जैसे खुशवंत सिंह के हर लेख मे एक औरत और एक बोतल शराब की चर्चा जरूर होती थी, वैसे ही देखता हूँ देशभक्ति के नाम पर चल रही हर लड़ाई कोंडोम और नंगी लड़कियों पर जाकर विराम पाती है। लड़ाई का कोई सार्थक परिणाम मिले या नही मिले, दो चार गाड़ी कोंडोम जरूर मिल जाता है इन चरित्रवानों को। सुना है इंजेक्शन भी ढूंढ निकाले हैं और गर्भनिरोधकों की रेंज भी। मुझे अभी अभी कहीं एक निष्कर्ष भी सुनने को मिला कि जेएनयू की नब्बे प्रतिशत लड़कियां माँ बनाने की क्षमता खो चुकी हैं क्योंकि वे हाई परसेनटेज लेड वाले कोंडोम्स और पाइल्स का प्रयोग करती हैं। एक प्रयोग उड़ीसा के आदिवासी जंगलों और गांवों मे भी चल रहा है। अमेरिका की कुछ मिर्गीरोधक टीके बनाने वाली कंपनियों ने अपने ये टीके इन अनपढ़ आदिवासियों के बीच उतारे हैं। आठ से बारह साल तक की किशोरियों पर इस दवा का प्रयोग ऑब्जेक्ट की तरह किया जा रहा है। दावा यह कि कभी मिर्गी नही आएगी,लेकिन रिज़ल्ट यह कि पिछले दस-पंद्रह सालों मे पैंतीस से चालीस परसेंट तक लड़कियां बंध्या हो चुकी हैं। मेरे दिये आंकड़े दुरुस्त करने की जरूरत हो सकती है लेकिन उससे बड़ी जरूरत उन लड़कियों की ज़िंदगी दुरुस्त करने की है जो बेमौत मारी जा रही हैं। जैसे पहली बार जब कोई जहर आदि बनाते हैं, तो उसका प्रयोग मक्खियों चूहों या दूसरे जानवरों पर करते हैं। चूंकि खुले हुए आर्थिक दौर की ये मल्टीनटीनेशनल कंपनियाँ हमारे आका के घर से आती हैं इसलिए वे अपनी दवाओं की आजमाइश अपने जंतुओं पर भी नही करते, हमारी जीती जागती लड़कियों पर करते हैं और सरकारी अनुमति से करते हैं। जेएनयू की लड़कियों के सर्वे करने वालों, वो तो पढ़ी लिखी लड़कियां हैं। अपनी सुध रख लेंगी। इन अनपढ़, अनजान बच्चियों और उनके माँ बाप की सुध लो न।
Saturday, 19 March 2016
सूअर के सेनुर आ गिरगिट के माला, कब्बों ना सोहाला।
यह कहावत हमारे आपके गांवों मे आज भी कही जाती है। मतलब ये कि सूअर को कितना भी नहला धुला सजा संवार के रखिए, वो गंदगी मे मुंह जरूर मारेगा। गिरगिट की गरदन की चाल देखिये। उसको माला पहनाने का फायदा है कोई...?अब यह लड़ाई उस गर्त मे चली गयी है, जहां जाकर आदमीयत अपने लिए शरण खोजती है। जैसे खुशवंत सिंह के हर लेख मे एक औरत और एक बोतल शराब की चर्चा जरूर होती थी, वैसे ही देखता हूँ देशभक्ति के नाम पर चल रही हर लड़ाई कोंडोम और नंगी लड़कियों पर जाकर विराम पाती है। लड़ाई का कोई सार्थक परिणाम मिले या नही मिले, दो चार गाड़ी कोंडोम जरूर मिल जाता है इन चरित्रवानों को। सुना है इंजेक्शन भी ढूंढ निकाले हैं और गर्भनिरोधकों की रेंज भी। मुझे अभी अभी कहीं एक निष्कर्ष भी सुनने को मिला कि जेएनयू की नब्बे प्रतिशत लड़कियां माँ बनाने की क्षमता खो चुकी हैं क्योंकि वे हाई परसेनटेज लेड वाले कोंडोम्स और पाइल्स का प्रयोग करती हैं। एक प्रयोग उड़ीसा के आदिवासी जंगलों और गांवों मे भी चल रहा है। अमेरिका की कुछ मिर्गीरोधक टीके बनाने वाली कंपनियों ने अपने ये टीके इन अनपढ़ आदिवासियों के बीच उतारे हैं। आठ से बारह साल तक की किशोरियों पर इस दवा का प्रयोग ऑब्जेक्ट की तरह किया जा रहा है। दावा यह कि कभी मिर्गी नही आएगी,लेकिन रिज़ल्ट यह कि पिछले दस-पंद्रह सालों मे पैंतीस से चालीस परसेंट तक लड़कियां बंध्या हो चुकी हैं। मेरे दिये आंकड़े दुरुस्त करने की जरूरत हो सकती है लेकिन उससे बड़ी जरूरत उन लड़कियों की ज़िंदगी दुरुस्त करने की है जो बेमौत मारी जा रही हैं। जैसे पहली बार जब कोई जहर आदि बनाते हैं, तो उसका प्रयोग मक्खियों चूहों या दूसरे जानवरों पर करते हैं। चूंकि खुले हुए आर्थिक दौर की ये मल्टीनटीनेशनल कंपनियाँ हमारे आका के घर से आती हैं इसलिए वे अपनी दवाओं की आजमाइश अपने जंतुओं पर भी नही करते, हमारी जीती जागती लड़कियों पर करते हैं और सरकारी अनुमति से करते हैं। जेएनयू की लड़कियों के सर्वे करने वालों, वो तो पढ़ी लिखी लड़कियां हैं। अपनी सुध रख लेंगी। इन अनपढ़, अनजान बच्चियों और उनके माँ बाप की सुध लो न।
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