Saturday, 19 March 2016

आग का समाधान तो दो बाल्टी पानी से ही होगा

कई मित्रों को इस उलझन मे पड़े हुए देख रहा हूँ कि देश मे आग लगी हुई है और ऐसे मे गीत कविता कहानी चित्र रिश्ते नाते भाव भंगिमाओं वसंत फागुन आदि की पोस्ट कैसे लिखी जाय। ऐसी उलझन मे पड़े सभी मित्रों से निवेदन करना चाहता हूँ कि पहले तो इस भंगिमा से बाहर निकलें कि देश मे कोई आग लगी हुई है। कोई आग नही लगी है देश मे । हाँ, देश मे बहसें चल रही हैं और किसी भी लोकतान्त्रिक समाज मे बहसें चलनी ही चाहिए। ये इन्टरनेट की दुनिया ने ये अवसर मुहैया करवाया है कि समाज का एक प्रतिनिधि टुकड़ा सोशल साइट्स के जरिये तमाम सोशल अनसोशल मुद्दों पर आँधी उठाए हुए है। कुछ समय पहले तक ऐसा संभव नही था। जवान होते हुए लोकतन्त्र ने इस देश दुनिया मे बहुत लंबे समय तक एकतरफा संवाद झेला है, सरकारी आदेशों निर्देशों और नियमों क़ानूनों का अनुगमन भर किया है। अभी ये संभव है कि आप अपनी सरकार से, सरकारी मुलाजिमों से, जिम्मेदारों से दोतरफा ही नही बहुतरफा संवाद स्थापित कर सकते हैं। सवाल पूछ सकते हैं, जवाब मांग सकते हैं और सबसे बड़ी बात कि अपनी राय रख सकते हैं। तो बेधड़क ऐसी बहसों मे आइये, शामिल होइए लेकिन इसे आग लगना मत समझिए, मत कहिए। ऐसा कहा जाता है कि देश जब आजादी की लड़ाई मे उलझा हुआ था तब हरिवंश राय बच्चन जैसे मूर्धन्य कवि मधुबाला और मधुशाला के गीत गा रहे थे। लेकिन अपने संकुचित नजरिए और उद्भ्रांत दृष्टि से पिछले युग का आकलन करने वाले लोग प्रायः ये भूल जाते हैं कि समीक्षक दृष्टि को इतना क्रूर और सतही नही होना चाहिए। किसी को फाड़ खाने वाली नज़रों से देखने के बजाय एक निरीक्षणात्मक नज़र से देखने का अभ्यास डालिए तो बहुत से अनदेखे सच भी बरामद हो सकते हैं। वहीं अगर आप पूर्वाग्रहों की गठरी लादकर आकलन करेंगे तो बहुत संभव है कि सही जानकारियों और तथ्यों तक पहुँच न बना सकें। गौर करें तो यह भी पाएंगे कि 1935 के आसपास के जमाने मे हरिवंश राय बच्चन अपनी उसी मधुशाला की रूबाइयों के साथ अमिताभ बच्चन के अस्सी वाले दशक से कहीं बड़ा स्टारडम रखते थे। मधुशाला की रूबाइयाँ खुद बच्चन के कंठ से उतरकर कभी कभी तो वंदे मातरम की अर्थवत्ता भी ग्रहण कर लेती थीं और देश ने बच्चन की धुनों पर झूमते हुए आज़ादी का संघर्ष अपने सीने पर झेल लिया। जब हम देश कहते हैं तो उसका अर्थ केवल बॉर्डर और बंदूक नही होता। ऐसा करें कि जब हम देश कहें तो उसका अर्थ जनमानस और जनभावना भी हो, देश के अर्थ मे शामिल कुछ गीत भी हों, कुछ चित्र भी हों, कुछ रिश्ते नाते भी हों, कुछ निजी एहसास, कुछ चुहलबाजियाँ भी हों, कुछ पेड़, कुछ नदियां, कुछ प्रकृति और कुछ प्रेम भी हो। देश मे अगर कहीं कोई आग सी दिख रही हो, तो उसकी जलन मे जलने के बजाय, उसकी आंच को तापकर अपने मन की गलन और जकड़न भी तो उतारी जा सकती है। आग मे आग मिलाने के बजाय उसका राग भी तो पकड़ा जा सकता है। किसी भी आग का समाधान तो दो बाल्टी पानी से ही होगा। इसलिए दोस्तों, बेबाक मन से अपना मन उड़ेलना जारी रखिए। अगर खाना, पीना और सोना जागना नही छोड़ा जा सकता तो सपने देखना कैसे छोड़ा जा सकता है भला। तो साहब खूब लिखिए, जम के लिखिए और ये देखिये 22 साल के @ujjwal pandey क्या लिख रहे हैं-- smile emoticon
कितना खोया कितना पाया।
इतने अनुभव कहाँ से लाया।
बेफिक्री की चादर ओढ़े,
नीद मे सोया रहता हूँ मै।
ख्वाब मे खोया रहता हूँ मै॥
सहमा सा एक पग चलने मे,
डरता था कुछ भी कहने मे।
दुनिया वाले क्या सोचेंगे,
अब परवाह न करता हूँ मै।
अपनी धुन मे बहता हूँ मै॥
नीद गंवाई चैन गंवाया,
कागज के कुछ टुकड़े लाया,
भूख नही वे मिटा सके जब,
अब खेतों मे जाता हूँ मै।
चटनी रोटी खाता हूँ मै॥

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