एक बार दादा धर्माधिकारी मुंबई से पटना जा रहे थे। वरिष्ठ स्वतन्त्रता सेनानी होने के अतिरिक्त दादा धर्माधिकारी तब महाराष्ट्र धारा सभा के सदस्य भी थे। ट्रेन मुगलसराय पहुंची तो उसी डिब्बे मे चढ़े तत्कालीन बिहार सरकार के स्वास्थ्य सचिव। बातचीत चली तो दादा ने पूछ लिया क्या हाल हैं बिहार मे कालाजार के। नयी सरकार के आने से हालात कुछ नियंत्रण मे आये...? स्वास्थ्य सचिव बोले--दादा, आपके आशीर्वाद से बहुत नियंत्रण हुआ है। बड़ी सफलता ही कहेंगे इस वर्ष बिहार मे कालाजार से सिर्फ ढाई परसेंट मौतें हुई हैं। बातचीत के बीच अचानक ध्यान गया बगल मे बैठी महिला सिसकियाँ लेकर रो रही थी। दादा एकदम से परेशान हुए। उन्होने महिला को ढांढस बँधाते हुए उनसे रोने की वजह पूछी। बुजुर्ग दादा के शालीन व्यक्तित्व से आश्वस्त होकर उस महिला ने घूँघट परे हटाते हुए कहा कि पिताजी इन लोगों की बातचीत हमेशा आंकड़ों मे होती है। बिहार मे इस वर्ष कालाजार से ढाई परसेंट मौतें ही भले हुई हों, लेकिन मेरा पति तो हंड्रेड परसेंट मर गया। और कहने की जरूरत नही कि ट्रेन मे उस डिब्बे का माहौल पूरी तरह भींग गया और स्वस्थ्य सचिव महोदय नज़रें चुराने लगे।
मुंबई से लेकर पठानकोट तक। कहानी तो वही है। बदला क्या है...? श्रद्धांजलि क्यो और किसे देनी है। सरकार से सहानुभूति रखी जाय या एयरबेस और सिविल पुलिस के लापरवाह अफसरों से...? व्यवस्था का वह पूरा हिस्सा जो इस वारदात के आसपास खेल रहा था, उसकी एक एक गतिविधि को परखिये। गृहमंत्री राजनाथ सिंह कहते हैं कि खुफिया रिपोर्ट्स पहले मिल जाने का फायदा ये हुआ कि नुकसान कम हुआ। वित्तमंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि मामूली नुकसान की कीमत पर बड़ी सफलता हासिल हुई है। यानी कुछ ही जवानों की कीमत पर हमने एयरबेस मे स्थापित तमाम जरूरी सामरिक एसेट्स और यंत्र, मशीनें आदि बहुमूल्य वस्तुएं बचा ली हैं। इसका अर्थ ये हुआ कि सात आठ जवानों के मरने का क्या वो तो देश मे बेरोजगारों की फौज पड़ी है, फिर मिल जाएँगे लेकिन ये एसेट्स नष्ट हो गए होते तो कहाँ कहाँ भीख मांगते फिरते। अलग बात है कि देश मे कोहराम है। समाज और परिवार असमय और अर्थहीन मौत मर गए अपने जवान बेटों की लाशों पर खून रो रहे हैं। ये मरने वाले सौ परसेंट मर गए तो क्या देश ने 'मामूली' नुकसान पर बड़ी सफलता तो पायी।
और वो सफलता क्या है...? सफलता ये कि जिस स्थान पर निगाह डालने की सोचने से भी पहले दुश्मन की रूह कांप जानी चाहिए, उस स्थान पर, अपने घर मे, अपने सर्व सुरक्षित एयरबेस मे हम उनसे तीन दिन तक लड़ते रहे, जहां हमे बताया जाता रहा है कि परिंदा भी पर नही मार सकता और उन पाँच छः को मारते मारते हम अपने छः सात गंवा बैठे ये सफलता है। तीन दिन पहले एसपी का अपहरण हुआ और उनकी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल किया गया। एसपी की सूचना पर उनके वरिष्ठों ने अतिखुफियागिरी का परिचय दिया और प्रथमदृष्ट्या दोषी या अपराधी उन्हे ही मान लिया। ये सफलता का पहला सूत्र था। उसके बाद चालीस किलोमीटर के रकबे मे फैले इस अतिसुरक्षित एयरबेस पर सावधानी और सुरक्षा का आलम देखिये कि दो आतंकवादी उसके पहले ही अंदर घुस चुके थे। बाकी के चार सरकारी गाड़ी मे अंदर घुसे और जिनपर हमे गर्व है, वे लोग इस पूरी हलचल से अनजान रहे, पूरी तरह बेखबर रहे। जवानों की कर्तव्यपरायणता का ये आलम तो गर्व करने से कुछ कम का अधिकारी ही नही। वे चौबीस घंटे छिपे रहे उस जोन मे जो हाई नही, हाईएस्ट एलर्ट वाला जोन है। जहां सेना है, जहां सामरिक महत्व के अतिसंवेदनशील एसेट्स और दस्तावेज़ हैं, जहां देश की इज्जत है, जहां देश की नाक है और कुल मिलाकर ये कि जहां देश की सारी उम्मीद है। तीन दिन तक दिल्ली से पठानकोट तक हज़ार सामरिक कौशल लगाकर भी अंततः कल वो बिल्डिंग ही उड़ानी पड़ गयी जिसमे वे पूरे आराम से कब्जा जमाये बैठे थे।
कैसा शर्मिंदगी का आलम है। अगर दुश्मन पाकिस्तान है, तो क्यो न हँसे वो हमपर...! वो तो आजमा चुके हैं हमे भी, हमारे हाई एलर्ट को भी और हमारे गर्व को भी। वे जानते हैं कि हिन्दुस्तानी हाई एलर्ट भी ऐसा होता है, जिसमे जब कोई घटना पठानकोट मे हो जाती है, तो बनारस के स्टेशनों पर कुत्ते दौड़ाए जाने लगते हैं साथ साथ पठानकोट मे सफलता और मिशन समाप्ति की घोषणा भी कर दी जाती है। हमारा हाई एलर्ट ऐसा होता है कि जो पुलिसवाले ड्यूटी पर अक्सर खैनी मलते पाये जाते हैं, वे सेना के जवानों के झोले भी चेक करने लगते हैं। हमारा हाई एलर्ट ऐसा होता है कि जब हमारे एयरबेस से जवानों के शव निकाल रहे होते हैं तब देश के छोटे छोटे कस्बों और शहरों मे पुलिस आम राहगीरों और शहरियों के ऊपर डंडे पटक रही होती है, उनकी गठरियाँ खोलकर सतुआ पिसान चेक कर रही होती है और लगभग उसी समय हाई एलर्टेड अचूक सुरक्षा व्यवस्था के बीच नोएडा जैसे 'विकसित' शहर मे एक पढ़ी लिखी लड़की को चार पाँच कुत्ते बलात्कार के लिए खींच रहे होते हैं।
अपनी जान गंवा चुके अपने जवानों को आइये अब श्रद्धांजलि देने का सिलसिला बंद करें। देनी ही है तो मरे हुओं को तिलांजलि देने की परंपरा रही है। जी हाँ तिल की अंजलि दें उन्हे जो कर्तव्यवीर तो कहलाते हैं पर कर्तव्य की बेदी पर देरी से पहुँचते हैं। निस्संदेह इस भारी लापरवाही और अकर्मण्यता के पीछे साधारण जवान नही, सेना और सिविल पुलिस के अफ़सरान खड़े हैं, वे बड़बोले राजनेता खड़े हैं, जिन्हे अपनी सेना पर आज सबसे ज्यादा गर्व हो रहा है क्योंकि मरने वाले उनकी ऐश के लिए अपनी ज़िंदगी लुटा बैठते हैं। हम अपने मृतकों को तिल की अंजलि देने वाले समाज के रहवासी हैं। मृतक का सम्मान मृतक की तरह ही होना चाहिए। ये शहादतें व्यवस्था द्वारा हम पर लादे गए बोझ की तरह हैं क्योंकि इन शहादतों की कोई जरूरत नही थी देश को क्योंकि कोई युद्ध नही लड़ रहा है देश। जरूरत तो इस बात की थी कि लफ़्टिनेंट कर्नल निरंजन और उनके शहीद साथी अपने परिवार मे रहे होते, अपनी नवब्याहता पत्नी और बेटी के सिर पर आज भी निरंजन का साया होता, काश वे लोग जीवित रहते और देश तथा सेना को लंबे समय तक उपलब्ध रहते...! हमारे शहीदों को देश की व्यवस्था ने मारा है, वे विक्टिम हैं...और आज का सबसे बड़ा सवाल ये है कि जिस देश मे ऐसे ऐसे भी.... विक्टिम हैं, उस देश मे आम आदमी को कौन पूछता है। उसका क्या हाल है...?
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