Saturday, 19 March 2016

अमन और तालीम ही स्थायी समाधान हैं

एक समय ऐसा भी था जब पठानकोट का मास्टरमाइंड हमारी जेल मे बंद था। याद आ रहा है 1999 का वह प्लेन हाईजैक। मसूद अज़हर का भाई रऊफ असगर भाई को छुड़ाने की जुगतें लगा रहा था और हमारा प्लेन हमारी वायु सीमा मे घुसकर काबुल उड़ा ले गया। अटल जी की सरकार थी। प्लेन के सवारों के बदले छः आतंकियों को रिहा करने की शर्त थी। अंततः शर्त पूरी की गयी और तत्कालीन विदेश मन्त्री प्लेट मे सजाकर इन आतंकियों को काबुल ले गए। इस फैसले के पीछे वीपी सिंह के कार्यकाल मे हालिया मरहूम मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बिटिया के अपहर्ताओं की शर्तें मानकर खूंखार आतंकियों को रिहा करने की नजीर थी। इसे हम संप्रभु राष्ट्र कहते हैं, जिसकी दो दो सरकारों ने आतंकियों के सामने घुटने टेके। ये वही मसूद अज़हर है, जो तब काबुल मे छोड़ा गया था और तबसे लेकर आजतक पाकिस्तान मे छिपा बैठा है। जैश ए मुहम्मद का नेटवर्क उसके ही नेतृत्व मे सक्रिय है। पठानकोट हमले के पीछे इसी शातिर का हाथ था। ये हमारे हुक्मरानों की घुटना टेक नीति का परिणाम है। बात हुक्मरानों की करें तो आज ममता दीदी घेरे मे हैं। हिंसक भीड़ के सामने घुटने उन्होने भी टेके हैं। वोटों की फसल वहाँ भी कटने वाली है और तलवारें चमकाने पर कोई रोक नही है। मालदा की हैरतअंगेज़ हिंसा लज्जित करने वाली है। सरकारी अलमस्ती की पोल खोलने वाली है। लोकतन्त्र के मंदिर पर बदनुमा दाग लगाने वाली है। हिंसक समूह के बरक्स एक सरकारी चुप्पी हो तो कभी गुजरात होता है, कभी भागलपुर होता है, कभी सिख विरोधी दंगे होते हैं तो कभी मालदा होता है। समाज, समूह और सरकारों को पता होना चाहिए कि तलवारें चमकाने का वक़्त गया। अमन और तालीम ही स्थायी समाधान हैं इसके सिवा कुछ नही। जी हाँ, मै मानता हूँ कि इस ढाई लाखा मालदाई जलसे मे हिंसा थी, फिरकेवाराना नवैयत थी, होशविहीन जोश था, मजहब की ताबेदारी थी, अंधी सोच थी, नफरत थी और राजनीतिक किस्म का मजहबी तांडव था। वहाँ बस एक चीज़ जो नही थी, उसका नाम तालीम है। अगर तालीम होती तो उस हवाई समस्या का समाधान भी होता, जिसके कारण ये हिंसा हुई बताई जाती है। किसी एक कमलेश तिवारी को कहाँ कहाँ काटोगे भइया। वो कानून के फंदे मे तो है। अब क्या चाहिए आपको...? भीड़ कहकर जान बचाए देता हूँ वरना ढाई लाख लोगों का हुजूम भीड़ नही होता, जो भी होता है वो योजनाबद्ध होता है। योजनाएँ बनाइये देश के उत्थान के लिए, पतन के लिए नही। पैगंबर और रसूल सांप्रदायिक नफ़रतों से ऊपर होते हैं, बहुत ऊपर होते हैं।

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