Monday, 28 September 2015

हिन्दू मुसलमान एक है...!

हिन्दू मुसलमान मे मेरे देखे कोई अंतर नहीं पाता हूँ मै । हाथ,पाँव,नाक,कान,मुंह सब एक जैसे ही होते हैं दोनों के।और नहीं तो रोज़ देखता हूँ एक ही ठेले पर खड़े होकर वही गोलगप्पे दोनों रस ले लेकर खाते हैं।दोनों को ही एक ही जैसा खट्टा,मीठा स्वाद भी आता है।मिर्च लग जाय तो दोनों एक ही तरह से काँखते हैं,कुछ मीठा हो जाय तो बांछें भी दोनों ही की खिल जाती हैं।अलबत्ता ये बाँछें शरीर मे होती कहाँ हैं,ये न हिन्दू को मालूम है न मुसलमान को।दोनों ही को ध्यान से देखिये एक ही जैसे सोचते भी हैं।अभी देखिये दिवाली आने वाली है,फिर होली आएगी।इन त्योहारों पर वो मुसलमान जो जरा जाहिल है,फेसबुक पर लिखेगा-कहाँ गए वो सारे बुद्धिजीवी लोग जो हमको बक़रईद पर उपदेश देते हैं कि जानवर मत काटो।ये पटाखों की आवाज़,ये पानी की बरबादी रोकने के लिए कोई बुद्धिजीवी क्यो नहीं लिख रहा कुछ?बिलकुल वैसे ही जैसे जब बक़रईद आती है तो वो हिन्दू जो जरा जाहिल है,वो लिखना शुरू कर देता है-होली,दिवाली पर हमे उपदेश देने वाले कहाँ गए सारे बुद्धिजीवी?अब क्यो नहीं उपदेश देते कि जानवर मत काटो।देखिये न कैसे बिलकुल एक ही ढंग से सोचते,बोलते,खाते-पीते और जीते हैं हिन्दू मुसलमान।अब जैसे जाहिलियत मे दोनों एक समान व्यवहार करते पाये जाते हैं,वैसे ही बकैती मे भी दोनों एकदूसरे के बराबर ही बैठते हैं।दोनों बताते हैं कि हम और हमारा धर्म तुमसे श्रेष्ठ हैं बे।

बहुत पढे लिखों की बात तो नहीं करता पर जो लोग शिक्षित होते हैं,वे प्रायः हिन्दू या मुसलमान नहीं रह जाते,थोड़ा सा इंसान हो जाते हैं।अब जब इंसान हो जाते हैं तो जाहिलों की तरह एड़ी वाली बुद्धि से नहीं,खोपड़ी वाली बुद्धि से सोचने लगते हैं।वे लोग सोच पाते हैं कि यार जिस धर्म नाम की चिड़िया के हम इतने दीवाने हैं,उसका असल मकसद क्या है।अब देखिये न धर्म की किताबों मे लिखा बताते हैं कि राम जी जब रावण को मारकर लौटे तो अयोध्या ने खुशी के दिये जलाए।इस प्रसंग मे ये कहीं लिखा नहीं मिलता कि अयोध्या मे पटाखे भी फोड़े गए थे।अगर कहीं कुछ लिखा हुआ मिले भी तो पक्का जानिए वो किसी न किसी बकैत का ही काम होगा।उस समय तीर भाले चलते थे भइया,तोप,गोले और बारूद का जमाना ही नहीं था वो।तो ये पटाखे का शोर और बारूद का धुआँ तो हमने अपनी खुशी से बाद मे जोड़ा न । फिर इसे धर्म क्यो कहते हो भाई..? ये भी मजहब की ही किताबों मे लिखा बताते हैं कि बक़रईद कुर्बानी देने का त्योहार है।बहुत साफ संदेश है कि किसी पूर्वज ने कभी जनहित और धर्महित मे अपने जिगर का टुकड़ा कुर्बान कर दिया था । अब कुर्बानी हमे भी देनी है तो बकरा खरीदेंगे,उसे काटेंगे,खाएँगे और सालभर झूठ बोलेंगे कि हमने भी अपने जिगर के टुकड़े की कुर्बानी दे दी । दूसरे की जान लेते हैं और कहते हैं कुर्बानी दी है।अरे यार कुर्बानी तो बकरे ने दी न,आपने कैसे दी?एक तमाशा और करते हैं--ऊंट को काटने का जश्न मनाते हैं।पूरा एलाका सड़क पर,गलियों मे,छतों पर,बारजों,खिड़कियों,रेलिंगों तक पर लटक कर सार्वजनिक हिंसा का यह क्रूर कर्म देखता है।मेला लगता है साहब मेला।वे कहते हैं हम खुशी मना रहे हैं। यही बात वो लोग भी कहते हैं। दीपावली के पटाखों के शोर और बारूद की गंध से बेहाल पक्षी मानव रहित जंगलों मे चले जाते हैं और महीनों नहीं लौटते तो मारे खुशी के पटाखे छोडने वाले दोहरे हुए जाते हैं।दूसरों को कष्ट देकर और दूसरों की जान लेकर खुशी मनाने की इन दोनों अदाओं को जरा करीब से महसूस कीजिये।कहीं से अलग नज़र आते हैं हिन्दू मुसलमान....?

खैर,बारूदी गंध की खुशियाँ तो डेढ़ महीने बाद मनाई जाएंगी । अभी बकरों की कटान से उत्पन्न खुशी हमारे सिर चढ़ के बोल रही है।बनारस मे इस साल लाख,दो लाख,तीन लाख.......यानी जितने भी जानवर काटे,खाये और डकारे गए,उन सबके चमड़े,हड्डियाँ,सींगें और शेष अवशेष यहाँ मरती हुई वरुणा के किनारे लाकर तीन दिन से गाड़े जा रहे हैं।मनों या टनों जो खून निकला,वो सब अपने ही दर्द से बिलबिलाती हुई गंगा माई की गोद मे डाल दिया गया है।दुर्गंध के भयानक भभके से इधर करीब बीस हज़ार की आबादी चक्कर खा रही है,उल्टियाँ कर रही है और इस तरह बनारस खुशी मना रहा है।एक बार जरा ज़ोर लगाकर बोलिए नमामि वरुणे...! थोड़ा और ज़ोर लगाकर चिल्लाइये नमामि गंगे....!!और ये नारा तो खैर सबसे ज्यादा ज़ोर लगाकर बोलने की जरूरत है-- हम हिन्दू मुसलमान सब एक हैं....एक हैं...एक हैं....!!!!!!!!!

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