पत्नी की फूली हुई छातियाँ देखकर दिवाकर परेशान हैं। ढलती हुई उम्र की देह का ये तूफान दिवाकर की समझ मे बिलकुल नहीं आ रहा है। समझ तो खुद शैलजा भी नहीं प रही है। छातियाँ ही क्यों,शरीर के विभिन्न हिस्सों और गोपन अंगों का ये कसाव और तनाव तो वैसे भी बहुत बीते दिनों की बात हो गयी है। लेकिन कहाँ तो वे 18-20 की जवानी के दिन और कहाँ ये 42 पार का शरीर। शलजा और दिवाकर के दांपत्य मे तीन-तीन औलादें दाखिल हुईं। इस तरह का शारीरिक तनाव तो उन्ही दिनों की बात थी। तब शायद इससे भी ज्यादा होता हो,लेकिन तब उम्र साथ थी और शरीर मे ढलान का कहीं कोई एहसास नहीं था।
लेकिन ये क्या है....!और क्यो है....? सयाने हो चले बच्चों से भरे घर मे कुछ आपस की बातचीत भी कितना कठिन काम होकर रह गयी है...!दिवाकर हैरान,परेशान-से इशारों-इशारों मे ही कुछ समझना चाहते हैं। शैलजा इंकार की मुद्रा मे सिर हिलाती है। वह पति को आश्वस्त करना चाहती है--ऐसा कुछ नहीं है जी। अब इतने सालों बाद ये सब होगा...?बस पीरियड्स की अनियमितता के कारण....बस एक ही वजह है...और कुछ नहीं,और कोई बात नहीं।
हाँ,पीरियड्स भी तो....!इधर कई सालों से यह व्यवधान है। हर महीने के दस,बीस दिन आशंकाओं मे ही गुजरते हैं। यूं कभी कुछ होता नहीं,लेकिन कभी-कभी ये उद्विग्नता,ये आशंका महीने की सीमा पार भी कर जाती है। कभी-कभी तो दो-दो महीने की अनियमितता भी हो जाती है,लेकिन ऐसा उफान थोड़ी न होता है शरीर मे कभी। कितनी लापरवाह है शैलजा...! दिवाकर परेशान हैं--एक जगह तिक के इलाज नहीं करती । बस दो,चार दिन दवा चलायी-ठीक है...ठीक है का हल्ला शुरू...! डॉक्टर ने भी कह ही दिया है ये कोई बहुत सीरियस मसला नहीं है। खाना-पीना ठीक रखिए,एक्सरसाइज़ कीजिये--निवृत्ति का समय नजदीक है। बहुत सारे परिवर्तन होते हैं शरीर मे ये दौर ही ऐसा है।
सबसे ज्यादा जिसे प्यार करती है,इधर अपने छोटे बेटे पर ही सबसे ज्यादा गुस्सा भी निकालने लगी है शैलजा। उसे कोई और कुछ कह के निकल जाय,मजाल है...! सबसे ज्यादा प्यारा,सबसे ज्यादा करीबी,सबसे ज्यादा हिरोह है जिससे,अपने उसी बच्चे पर सबसे ज्यादा दांत किटकिटाती है शैलजा। बढ़ती उम्र के ये सब परिवर्तन जैविक हैं,बच्चे कुछ नहीं समझ पा रहे हैं। सब हलकान रहने लगे हैं। दिवाकर चिंतित हैं,यह सब कब ठीक होगा ! पूरी तरह मेनोपौज मे अभी कुछ साल तो लगेंगे ही। स्वभाव की यह अस्थिरता ही नहीं,हताशा,कुंठा,उदासी,परेशानी ये सब दिखेंगे। लगातार कई सालों की अशांति है यह स्त्री जीवन की।
लेकिन इस बार तो यह कुछ ज्यादा ही खिंच गयी। तीन महीने पार हो गए।दिवाकर किसी और संभावना से डरे हुए हैं। कई बार कई तरीके से पूछ चुके वे--कैसा लग रहा है...? तुम कोई बच्ची तो नहीं हो,कुछ तो पता चलता होगा...!!शैलजा पहले से ही परेशान;पति को फाड़ खाने वाली नज़रों से घूरती है--
एक बार कह दिया न वैसा कुछ नहीं है। मेरी परेशानी और मत बढ़ाओ सवाल पूछ-पूछ के। इस उम्र मे अब यही सब होना बाकी है न...?बुढ़ौती कनपटी पर चढ़ के नाच रही है,लौंडे बने फिरते हैं...! अरे धत्त ...जो पिछले 15 साल मे नहीं हुआ,वो अब होगा...!! सठियाओ मत अभी। उसके लिए उम्र पड़ी है।
दिवाकर चिड़चिड़ा उठे हैं लेकिन पत्नी के सामने से हट जाना ही ठीक लगा। जाते जाते बोले-
एक बार डॉक्टर को दिखा लेते हैं,फिर कोई बात ही नहीं।
शैलजा ने मना कर दिया। आप परेशान मत होइए। हो जायेगा,सब ठीक हो जाएगा। खुद ही तो कहते हैं मै बच्ची तो नहीं...! कुछ तो पता लगना चाहिए न...!
दस दिन और बीते तो दिवाकर घबरा उठे,धैर्य जाता रहा। डॉक्टर को फोन लगा दिया और पत्नी को आल्टीमेट फरमान सुनाया--कल डॉक्टर के यहाँ चल रहे हैं। मेरा मन परेशान है। कोई और वक़्त होता तो मै खुश ही होता लेकिन साढ़े तीन महीने का ये गैप और ये उठान अब देखा नहीं जा रहा। शैलजा की नज़र अपनी छतियों पर गयी। देह मे तनाव का ये आलम देखकर वह खुद भी हैरान,परेशान थी। हामी भर दी,ठीक है कर लो बात,हो जाय तुम्हारी वाली भी।
डॉक्टर मृणालिनी ने हाथ लगाते ही कह दिया--चार महीने का है।
शैलजा--ऐसा कैसे हो सकता है डॉक्टर !
"ऐसा ही है। यकीन नहीं होता तो जा के अल्ट्रासाउंड करा लो।"
चेहरे पर उड़ती हुई हवाइयाँ लिए शैलजा डॉक्टर के चैंबर से बाहर आई और पटी से बोली-
आप एक बार मिल लीजिये डॉक्टर से। क्या कह रही हैं वे मुझे कुछ समझ मे नहीं आ रहा। डॉक्टर ने दिवाकर के हाथ मे पर्चा थमाया--USG lower abdomin...।
अगले दिन रिपोर्ट आ गयी--18 weeks live gestation...।
दिवाकर के पैरों के नीचे से धरती सरक रही है। डॉक्टर पूछ रही है--अंतिम बच्चे की उम्र बताइये।
16 साल।
"इसे रखना है...?"
"नहीं........sssssss"
"बताया न,बच्चा चार महीने का है। एबोर्शन रिस्की है।"
डॉक्टर ने तलब किया,शैलजा बाहर निकली--आपको बुला रही हैं।
चेहरे पर उतार आई हवाइयों पर मन भर धूल डालते हुए दिवाकर डॉक्टर के सामने खड़े हैं।
"बच्चा चाहिए....?"
किसी स्वचालित मशीन की तरह इन्कार मे सिर हिलाते हुए दिवाकर को होश नहीं है कि वे क्या कह रहे हैं। बेटा बेटी घर परिवार लोक लाज...हे भगवान...!
"पैसे जमा कीजिये,कन्सेंट साइन कीजिये,दवा लगा देती हूँ,परसो लेकर आइये।"
अबतक दिवाकर कठपुतली मे और शैलजा पत्थर की मूरत मे बदल चुके हैं।
घर आए तो बेटी कॉलेज से लौटी-पापा,क्या कहा डॉक्टर ने...? मम्मी को दिखाया आज...?
जुबान सिली हुई है दोनों की--कुछ खास नहीं...यूं ही...परसो फिर बुलाया है...! समय लगेगा थोड़ा कोम्प्लीकेशन को समझने मे...!
दवा ने असर दिखाया। अगले ही दिन दर्द शुरू हुआ और शाम होते होते ब्लीडिंग शुरू। शैलजा ने दिवाकर को बाथरूम मे बुलाया और दिखाया--साफ हो गया सब,देखिये। पोलिथीन मे काले खून के थक्के--सहम उठे दिवाकर। सब हाथ मे लिया और कहीं दूर गए,सब डिस्पोज़ कर आए। मन मे एक राहत थी कि चलो जो कुछ भी था,अब ठीक है सब। कल डॉक्टर को सब बताएँगे। डॉक्टर ने पूरी रिपोर्ट सुनी और बेड एलॉट कर दिया। सेफ अबोर्टकिट की दवाइयाँ इन्सर्ट की और कहा-जाकर बेड पर लेटो। अभी समय लगेगा।
"अरे डॉ साहब सब हो गया"--दिवाकर हतप्रभ-से थे। "अब क्या बाकी है...?"
डॉक्टर ने पूरी बात समझाई--"सफाई करनी होगी...लेकिन बेबी के बाहर आने के बाद। खींच नहीं सकते न उसे। इंतज़ार कीजिये अभी।"
शैलजा बेड पर हैं। आसमान मे कलाबाजियाँ खा रहे हैं। दर्द बढ़ता जाता है।सिस्टर बता रही है-बच्चा बड़ा हो चुका है। पूरी प्रक्रिया चलेगी। दवा लग गयी है। अभी इंतज़ार कीजिये। स्टूल पर बैठे दिवाकर का हाथ थाम लेती है शैलजा और बुदबुदाती है--ज्यादा मत बोलिए,आप पर गुस्सा आ रहा है। चुप नहीं रह सकते तो हट जाइए यहाँ से।
बुदबुदाहट धीरे धीरे कमजोर पद रही है। शैलजा के मुंह से अस्फुट स्वर निकलता है-सब पहले जैसा ही हो रहा है। कमर मे हजार बिच्छुओं का डंक है। दिवाकर का मुंह सूखा हुआ है। क्या हो गया ये सब......!लगातार तीन घंटों का अनथक दर्द। शैलजा की आवाज़ निकली--हमे होश नहीं रहेगा। आप देख लेना क्या हुआ,ये सब झूठ भी बोलती हैं पैसा ऐंठने के लिए....!
दिवाकर बच्चों को फोन पर समझा रहे हैं--बेटा अभी नंबर नहीं लगा है,भीड़ ज्यादा है मरीजों की।तुम लोग अपना काम करो,हम देर शाम तक आएंगे। नर्स की आवाज़-रातभर लग सकता है सर...!
ओहह...तब तो सब जान जाएँगे--दिवाकर सबकुछ मैनेज कर लेना चाहते हैं। शैलजा बेड पर बेचैन हो रही है। डॉक्टर आकार देख गयी है। दिवाकर को बाहर जाने को कह दिया गया है। ये औरतों का ही वार्ड है। दरवाजे के शीशे से नज़रें गड़ाए दिवाकर का ध्यान पत्नी की हरकतों पर है। सांस तंगी हुई है दिवाकर की। बेड पर सिर रगड़ती हुई शैलजा अचानक पाँव फैलाकर रास्ता बनाती है और अर्ध मूर्छा की सी हालत मे ही आधा उठ बैठती है। डॉक्टर सिस्टर के साथ अभी अभी बाहर निकली हैं। दिवाकर दरवाजा भड़ाक से खोलकर अंदर दाखिल हुए और सीधे पत्नी के पास पहुंचे। शैलजा उन्हे सामने बुला रही है। घबराए हुए वे पैरों की ओर आते हैं। शैलजा साड़ी उठाकर दिखा रही है--देखिये तो क्या है। दिवाकर विस्फारित आँखों से एकटक देख रहे हैं। बेड,साड़ी और पेटीकोट को भिंगोते हुए खून के बीच लथपथ पड़ा हुआ 5,6 इंच का वह मानव शरीर...!
पूरा आकार...! पूर्ण आकृति...! एक-एक इंच के हाथ,पाँव,पेट,पीठ,सिर,धड़ सब है...सबकुछ है। बेहाल अधलेटी माँ और सनाका खा चुके,लुटे-पिटे-से खड़े पिता के बीच खून मे साना,लथपथ पड़ा 4 महीने का अविकसित बच्चा...जी हाँ,बच्चा...केवल भ्रूण नहीं है ये। सन्निपात भरी सी आँखों से देखते-देखते यकबयक दो बूंद आँसू के चू पड़े हैं दिवाकर की आँखों से। शैलजा बेहोश हो रही है। स्ट्रेचर,नर्सें,डॉक्टर...सब भागे आ रहे हैं। दरवाजे,खिड़कियाँ सब धड़ाधड़ खुल रहे हैं। पूरे बेड सहित शैलजा स्ट्रेचर पर है और स्ट्रेचर ऑपरेशन थियेटर की ओर...दाई आवाज़ लगाती है--भइया,जरा हाथ लगाना...! यंत्रचालित-से दिवाकर स्ट्रेचर का हैंडिल पकड़ लेते हैं,महिलाएं स्ट्रेचर छोड़ देती हैं। करुणा,प्रायश्चित,रूदन और टूटन को एक साथ अपनी आँखों मे समेटे ठगे-से दिवाकर अकेले ही स्ट्रेचर दूसरी मंजिल पर ऑपरेशन थियेटर के गेट तक ले गए। यहाँ से उन्हे वापस कर दिया गया। उन्हे याद आया--दवाइयाँ और सुइयां तो वही छोत गईं बेड पर ही....! नीचे आकर सब समेटा,पत्नी की चप्पल उठाई और ऊपर ऑपरेशन थियेटर के गेट पर आ पहुंचे। कैसी है शैलजा....वे नर्स से पूछते हैं। अभी समय लगेगा। बेबी आउट हो गया है। खेड़ी अभी अंदर है। खींचकर नहीं निकाल सकते न....इंतज़ार कीजिये,दवा सुई हो रही है। दिवाकर के हिस्से आया है बेसब्र इंतज़ार और लगातार की बेचैन चहलकदमी।
ये मुसलमान लड़की अभी-अभी आई है। पहला ही बच्चा है उसका। उसकी माँ और चाची उसके साथ हैं। वह चीख रही है। दर्द के मारे चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा रखा है। दो अपोजिट केस एक साथ रख दिये गए हैं। थोड़ा समय बीतते-बीतते शैलजा एहसासे कमतरी से और शबनम एहसासे बेहतरी से भर उठीं।
पैंटी लाइये,पैड लाइये,साड़ी लाइये या फिर नाइटी लाइये--नर्सों के फरमान दिवाकर दौड़-दौड़कर पूरी कर रहे हैं। कैसी है अब शैलजा--वे पूछना ही चाहते हैं कि अचानक दरवाजा खोलकर नर्स पूछती है-शैलजा के साथ कौन है?
"मै"
"अंदर आइये"
छोटी-सी ट्रे मे भरे खून और पानी के बीच तैर रहा है 6 इंच का एक वजूद...और उसका सुरक्षा कवच--खेड़ी। दोनों अलग-अलग...दोनों साथ-साथ भी।
"आपकी पत्नी ठीक हैं.2,3 घंटे बाद ले जा सकते हैं।.......लेकिन पहले इसका प्रवाह करना होगा...!"
दिवाकर के होश गुम हो चुके हैं। वे केवल देख भर रहे हैं,सुन कुछ नहीं पा रहे...! लज्जा,शर्मिंदगी और घोर पश्चाताप की आग उनकी निष्प्राणप्राय आँखों को झुलसा रही है। वे 500 का एक नोट दाई को थमाकर अपराधबोध से ग्रस्त हाथ जोड़े खड़े हैं--मेरी मदद करो,मुझे पत्नी की चिंता है। 500 का एक नोट एक बड़ी मुसीबत हल कर देता है। बेहोश पत्नी को संभालें या फिर अंजाने,अनचाहे ये जो कुछ हो गया है,उसका स्वागत से पहले ही अर्पण-तर्पण कर दें। 500 के इस नोट ने दिवाकर को उनकी पत्नी सौंप दी है। वे खून से भींगे पत्नी के कपड़ों से भरा पोलिथीन,उसकी चप्पल और दवाओं का पैकेट संभाले नीचे की ओर भाग रहे हैं,शैलजा स्ट्रेचर पर आ रही है। दिवाकर डरे हुए हैं...सिस्टर से पूछ रहे हैं---ये होश मे नहीं हैं क्या...?आवाज सुनकर शैलजा पथराई-सी आँखें खोलती है। रात के नौ बज गए हैं। शैलजा की चेतना लौट आई है पर आँखें अभी ठीक से खुल नहीं पा रही हैं,शरीर शिथिल है। दिवाकर ने ब्लाउज़ और पेटीकोट मे लेटी बेसुध-सी पत्नी की देह पर हरी साड़ी डाल दी है और नर्स के कहने पर चाय लेने आए हैं। चाय की एक घूंट अंदर जाते ही शैलजा को ज़ोर की मिचली आई है और तीन दिन से बिना कुछ खाये पिये शरीर ने उल्टियाँ करनी शुरू कर दी हैं। पूरे उपचार के बाद डॉक्टर ने 11 बजे रात को डिस्चार्ज किया।
घर आए आज तीसरा दिन है। आस-पड़ोस और बच्चों....सबसे सबकुछ छुपा लिया दोनों ने मिलकर। दवा चल रही है। आराम मिल रहा है। शैलजा का स्वास्थ्य सुधर रहा है लेकिन मन अभी ऑपरेशन थियेटर मे घायल ही पड़ा है। बच्चों के कान बचाकर शैलजा पूछ रही है--आपने देखा था....? दिवाकर ने पत्नी को तड़पकर देखा है-आँसू वहाँ कोरों मे अटके पड़े हैं। .......भूल जाओ अब सब....कुछ भी याद मत करो...कुछ मत सोचो....कुछ मत पूछो। दिवाकर पत्नी से आँखें चुरा रहे हैं। दोनों ही दोनों को संभालना चाहते हैं। खाना,पीना,दवा,दूध,फल.....इन सारे शब्दों का शोर मचाते हैं दिवाकर और शैलजा सूनी-सूनी आँखों से ये सारा शोर खा रही है। बच्चे बहुत खुश हैं कि मम्मी कई महीने से बीमार थी और अब ठीक है।
अस्पताल के बाद का चौथा दिन। आधी रात का समय;शैलजा दिवाकर को जगाना चाहती है। पत्नी की आवाज़ कानों मे पड़ रही है। दिवाकर की नीद खुल गयी है। वे शैलजा को ध्यान से देख रहे हैं। पत्नी की आँखें आंसुओं से डबडब हो रही हैं---यहाँ आइये,मेरे साथ लेटिए। एक नज़र सोये हुए बच्चों के ऊपर डालकर दिवाकर ने बत्तियाँ बुझा दी हैं और पत्नी की बगल मे आ लेटे हैं। शैलजा ने टेबल लैंप की रोशनी जलाकर छातियाँ खोल दी हैं—ये देखिये.....दिवाकर के हाथ खुद ब खुद उधर सरक आए--उफ़्फ़....इतनी तनी हुई....! एकदम गरम,जलती हुई-सी,एक झुर्री तक नहीं...कि जैसे बर्र ने काट लिया हो...और चेहरा सूज जाये...!....दर्द हो रहा है....शैलजा की आवाज़ पर चौंकते हैं दिवाकर। शरीर का यह हिस्सा तप रहा है। दिवाकर बेचैन हो रहे हैं---बुखार क्यो है इतना...? शैलजा ने फफककर रो दिया है। आँसू पीते होंठों से चार शब्द निकले हैं—बुखार नहीं,दूध है...!
दू...........ध....??!!!! अरे.....!! ये तो......!!! वो तो.....!!!! दूध....? हाँ लेकिन,दवा तो....!!!!
“दबाओ....,अपने हाथ से निकालो न...!”—दिवाकर के अस्फुट स्वर...!
उधर आधी रात के आलम मे सोयी हुई बस्ती सन्नाटा बुन रही है और इधर एक अपरिचित-से समय मे शैलजा ने अपना सिर दिवाकर के सीने मे दे मारा है।
-----तुम्ही दबा दो,मुझसे नहीं हो रहा..। किसी बिना आए ही चले गए हकदार के हिस्से का जलता हुआ दूध माँ की छातियों मे ताप और दर्द दोनों बनकर उतर आया है। चार दिन पहले का घायल शरीर दिवाकर की बाँहों मे है....और वे पत्नी की ब्लाउज़ उतार रहे हैं। पेटीकोट पहने लेटी हुई पत्नी की खुली हुई छातियाँ 20-25 साल पहले रोमांच रचती थीं,आज अवसाद गढ़ रही हैं। शैलजा की छातियों पर दिवाकर के हाथ हैं,पर उन्हे कुछ समझ मे नहीं आ रहा....कि करें क्या...! जब कुछ समझ मे नहीं आया तो उन्होने पत्नी को अपने सामने कर सीने मे भींच लिया है। तनी हुई छातियाँ जब पति के सीने से टकराती हैं तो इस दबाव मे देर तक पिसकर दूध उगलने लगती हैं। टप....टप....टप...टप....शैलजा और दिवाकर के बिस्तर पर दूध रिस रहा है। दिवाकर की बनियान भींग उठी है...! लगभग घंटे भर का दबाव...! लगभग गिलास भर दूध से नहा से उठे हैं दिवाकर...और तनाव के साथ-साथ ताप भी बहुत कुछ घट गया है। शैलजा दिवाकर की बनियान उतारकर निहार रही है...बनियान का दूध निचोड़ रही है...! ढेर सारा आँसू,ढेर सारा दूध और ढेर सारा खून अपनी देह से उलीचकर एक पुरानी माँ,अपनी नयी खाली हुई जगह को देखती है...और पति का हाथ अपने उदर पर रखकर पूछती है—
“मुझे भूलती नहीं उसकी शक्ल..,ये उसकी जगह खाली हो गयी है...,यहाँ आपकी जरूरत है...,आपने देखा था न उसे....??”
दिवाकर की जीभ पर पत्थर लटके हैं—भूल जाओ उसे,ऐसा कैसे कह दें....!ये जो दूध-दूध हुए दो शरीर लिथड़े पड़े हैं,ये सब क्या भूलने के उपाय हैं...!! भूल जाने से क्या हो जाएगा....!! भुलाया तो इनसे भी नहीं जा रहा...!! दिवाकर के अंदर से आवाज़ आयी है...,बात करनी पड़ेगी---
“हाँ,देखा था।”
“कैसा था...?” तड़पती हुई माँ की डहकती हुई आवाज़पगलाए पिता के कान बेधती है---
“बाल देखे उसके...? आप ही जैसे थे...!”
अब तड़पने की बारी दिवाकर की--
“तुमने देखा था...?”
“हाँ,मैंने देखा था...आपको भी तो कहा था देखने को...।“
पत्नी की आँखें हथेलियों से ढांपकर फफक पड़े हैं दिवाकर,बिस्तर हिचकियों से हिलने लगा है।
समय कैसा भी हो,गुजर जाता है…पर अपने निशान छोड़ जाता है। दिन,रात और घंटों,मिनटों मे बीतता समय हफ्तों मे ढल गया। सन्नाटे भरे कई दिन और दूध भींगी कई रातें बीत गईं। उसके हिस्से का दूध बिस्तरों मे निथरता रहा और माँ की हूक गले मे...! पत्नी की फूली हुई छातियाँ सामान्य हो रही हैं। दिवाकर का बोझ उतरने लगा है...लेकिन दूध का न्याय नहीं हुआ...और दूध का न्याय न हो तो सारी दुनिया का बोझ भले उतर जाय,माँ का बोझ नहीं उतरता। लेकिन माँ का बोझ उतारे कौन...! कौन...!! कौन....!!!
मम्मी दूध दो न...!—एक दोपहर सूखी आँखों ख़यालों मे गुम माँ,बेटी की आवाज सुन सन्न रह गयी...!
”दू.........ध......!!?” शैलजा बौराई सी एकटक बेटी को देख रही है। ये तो कभी दूध नहीं मांगती...दूध तो इसे पसंद ही नहीं...फिर....????
शैलजा आँख फाड़े गिलास मे गटागट दूध पीती बेटी को अपलक देख रही है...!
प्रकृति अलबेली....! पता नहीं क्यो...शैलजा आजतक नहीं समझ पायी...जब दूध माँ के वजूद का सवाल बन गया था,उन दिनों बेटी रोज ही दूध क्यो मांगने लगी थी...!!!
No comments:
Post a Comment