Sunday, 11 October 2015

लोकनायक

उस दिन यहाँ राजघाट स्थित गांधी विद्या संस्थान के एक आयोजन मे जेपी आए थे। सर्वोदय आंदोलन के तमाम बड़े नेता उस मौके पर बनारस पहुंचे थे। दो दिवसीय गहन वैचारिक गोष्ठी थी। सामाजिक आंदोलनों और प्रवाहों पर शोध की दृष्टि से गठित इस संस्थान का कोई भी आयोजन सामाजिक और वैचारिक उपादेयता की दृष्टि से राष्ट्रीय ही नहीं,अंतर्राष्ट्रीय महत्व का भी होता था,इसलिए इस कार्यक्रम मे आध्यात्मिक चेतना सम्पन्न विदुषी विमला ताई ठकार भी उपस्थित थीं। उस लंबे से हाल मे दो दरवाजे हैं। दोनों ही दरवाजों को अभ्यागतों के लिए खोल दिया गया था। हुआ ये कि जेपी आए तो इस दरवाजे से अंदर आए और विमला ताई आयीं तो उस दरवाजे से अंदर दाखिल हुईं। कार्यक्रम शुरू हुआ,लंबी चर्चाएं चलीं और बहस मुबाहिसों का दौर चला। कार्यक्रम के बाद सभा जब विसर्जित हुई तो लोग बाहर निकले। दोनों ही दरवाजों पर जूते चप्पलों का ढेर लगा था। बाहर आकार सभी अपने-अपने जूते चप्पल उन ढेरियों मे ढूंढ रहे थे और आगे बढ़ रहे थे। जिस दरवाजे से घुसे थे,उस दरवाजे से नहीं,जेपी दूसरे वाले दरवाजे से बाहर निकले और देखा कि विमला ताई दूसरे दरवाजे से बाहर निकाल रही हैं। दोनों ही दरवाजों पर खड़ी ये दोनों विभूतियाँ  कुछ देर अपने-अपने चप्पल ढूंढती रहीं। थोड़ी देर बाद यह देखकर लोग विस्मित रह गए कि जेपी विमला ताई की चप्पलें हाथ मे उठाए विमला ताई को ढूंढ रहे हैं। यह विस्मय तब थोड़ा और दोहरा हो गया जब देखने वालों ने देखा कि उधर से विमला ताई भी जेपी की चप्पलें उठाए लिए चली आ रही हैं। दोनों ही दोनों को एक दूसरे की चप्पलें पहनाने के लिए खोज रहे थे।
कल लोकनायक का जन्मदिन था। जयप्रकाश के लोकनायक होने की एक महागाथा है। किसी देश,किसी समाज या  किसी व्यक्ति की जो मेकिंग होती है,उसे समझना और उस वृत्त मे उतरना अपनेआप मे कितना रोमांचक होता है,यह जो छोटा सा दृष्टांत है,उसकी एक बेजोड़ बानगी है। क्रूर ब्रिटिश सत्ता से लोहा लेने का जेपी का दमखम देश 1942 मे देख चुका था। इसीलिए जब निरंकुश कोंग्रेसी सत्ता के खिलाफ जेपी ने अलख जगाई तो युवा शक्ति ने क्रांति की मशाल थाम ली और कवियों ने लोकतन्त्र के गीत गाये। जेपी की मेकिंग को समझने के लिए प्रभावती-प्रसंग विलक्षण और बेहद अनूठा प्रसंग है। प्रभावती ने बापू के आश्रम मे रहकर ब्रह्मचर्य का महासंकल्प ले लिया था। जेपी तब अमेरिका मे थे। जब उन्हे ये बात पता चली तो उन्होने गांधी जी को बहुत गुस्से मे पत्र लिखकर पूछा कि मेरी राय जाने बिना आपने प्रभावती को यह संकल्प कैसे लेने दिया। इस संदर्भ मे गांधी जी और जेपी के पत्रों का एक लंबा सिलसिला चला। वे पत्र पढ़ने लायक हैं। बाद मे जेपी भारत लौटे तो आमने-सामने की बहसें चलीं। इसी बहस मे गांधी जी ने जेपी से कहा था कि अगर तुम्हें प्रभावती के संकल्प से विरोध है  तो तुम्हें दूसरी शादी की अनुमति तो दे सकता हूँ लेकिन प्रभावती के संकल्प को तोड़ने कि इजाज़त नहीं दूंगा। गांधी जी से जेपी का लंबा झगड़ा चला। दुखित प्रभावती ने बापू से जेपी के व्यवहार के लिए खेद व्यक्त किया तब उन्होने कहा था-प्रभा,केवल जेपी ही वह आदमी है जो मेरे जाने के बाद मेरी भाषा बोलेगा।........और दुनिया जानती है जेपी ने पत्नी के उस व्रत-संकल्प का आजीवन निर्वाह किया और गांधी के जाने के बाद उनकी भाषा जेपी ने कैसे और कितनी बोली,वह सब इतिहास के पन्नों मे उसी गरिमा के साथ दर्ज है। 

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