स्यमंतकमणि त्रिपाठी उन दिनों गोरखपुर मे आरपीएफ के सिपाही थे और मेरे बाबूजी के दोस्त थे। मेरी उम्र तब यही कोई 22,23 साल रही होगी। एकदिन यूं ही अचानक वे हमारे घर आए और हमसे बोले कि हमारे प्रमोशन का चांस है। आपको सोर्स लगाना पड़ेगा। मैंने समझा हंसी कर रहे हैं,इनके लिए हम कहाँ से सोर्स लगाएंगे,वो भी आरपीएफ मे हमारा कौन है। वैसे भी तब हम विद्यार्थी थे और सोचते थे कि ये सब काम बड़ों के ही होते हैं,हम क्या जाने कैसे होता है प्रमोशन। लेकिन स्यमंतक जी तो स्यमंतक जी ही थे। सोर्स कहाँ,किसके जरिये और कैसे पकड़ना है,ये सारा कुछ ब्लू प्रिंट वे अपने साथ लेकर आए थे। बोले--गोरखपुर आईजी के पेशकार आपके परिचित हैं,बस वही से कल्ले फूटेंगे सोर्स के। हमने पूछा कैसे...?उन्होने पूरी कुंडली ही मेरे सामने रख दी। बोले--पेशकार साहब से कहिए...वो आईजी साहब से कह देंगे। जो आईपीएस अफसर हमारे इंटरव्यू के लिए आ रही है,उनका नाम जया वर्मा है और वो आईजी साहब की बैचमेट है।
मैंने बाबूजी से पूछा तो उन्होने हँसते हुए इजाज़त दे दी। हमलोग अलग-अलग साइकिलों से आईजी बेंगलो चले। बिछिया,मोहद्दीपुर होते नेशनल हाइवे पर धीरे धीरे साइकिल चलाते हुए जब हमलोग आईजी कैम्पस मे स्थित पेशकार साहब के क्वार्टर पर पहुंचे तो दरवाजा खोलकर पेशकार साहब ऐसे चिहाए जैसे खुद आईजी साहब ने ही दस्तक दे दी हो। बेचारे इतने सज्जन आदमी थे कि उनके लिए अगर हम एक हज़ार बार सज्जन लिखें तो भी उनकी सज्जनता समाएगी नहीं इन शब्दों मे। सज्जनता की साक्षात मूरत थे सुषमाकर दुबे। दूध देने वाले ग्वाले को ग्वाला जी और जूते सिलने वाले मोची को भी मोची जी कहके बुलाते थे। वर्दी मे न हों तो आप मान ही नहीं सकते कि ये आदमी पुलिस मे भी हो सकता है। कभी ऐसी ही किसी मुलाक़ात मे उनका हमसे अपनापा हो गया था। स्यमंतक जी भी एक नंबर के वाक कला विशेषज्ञ थे। इधर हम बैठे बैठे चुपचाप मिठाई खाते रहे,चाय पीते रहे और उधर उन दोनों की जम गयी। स्यमंतक जी का अपना परिचय देने का अंदाज ही उन्हे बहुत पसंद आ गया--मै लॉं ग्रेजुएट हूँ और आरपीएफ मे सिपाही भी। दुबे जी ने साहब तक बात पहुँचाने की हामी भर ली और हमलोग वापस लौट आए।
स्यमंतक जी धुन के पक्के आदमी थे। एक ही सोर्स पर अवलंबित रहना रिस्की मानते थे सो उन्होने और भी संपर्क खोजे और दसियों सोर्स तैयार कर डाले। हरेक से कहा,सभी ने वायदा किया और आश्वस्त होकर वे इंटरव्यू की तैयारियों मे जुट गए। वो दिन भी आया जब इंटरव्यू हाल मे इनका नाम पुकारा गया और स्यमंतक जी आरपीएफ कमांडेंट जया वर्मा के सामने कुर्सी पर थे। सबसे पहले नाम ही पूछा। जवाब आया-स्यमंतकमणि त्रिपाठी। स्यमंतकमणि की कथा सुनाइए....सवाल सुनकर उनकी बांछें खिल गईं। शब्द चयन और वाक्य विन्यास के धनी स्यमंतक जी प्रभावशाली हिन्दी बोलते थे। महाभारत की यह प्रसिद्ध कथा सुनाते सुनाते उन्होने अफसर के दिलोदिमाग पर कब्जा कर लिया। इसके बाद तो अफसर जैसे सवाल पूछने पर उतारू हो गयी और स्यमंतक जी जवाब देने मे खुशी महसूस करने लगे। इंटेलिजेंट आदमी थे ही। भाषा,भाव और विचार पर गहरी पकड़ थी,सो अलग।
करीब घंटेभर के सवाल जवाब के बाद जया वर्मा उम्मीदवार की योग्यता पर बेहद खुश हुईं और खुद उनसे ही उनकी प्रशंसा भी की। अपनी पर्सनल डायरी मे उनका नाम नोट किया और अगले उम्मीदवार की पुकार पड़ गयी। संकेत उन्हे इंटरव्यू के दौरान ही मिल गया था। जब रिजल्ट आया तो स्यमंतकमणि त्रिपाठी को सबइंस्पेक्टर के पद पर प्रमोशन मिल चुका था। वे दारोगा जी हो गए थे। अब खुशियों का आलम ये कि दाबे न दबे....और रोके न रुके....। शाम हुई तो मैंने देखा स्यमंतक जी की साइकिल चली आ रही है। हम सभी बड़े उत्साह से उठ खड़े हुए और उनका स्वागत किया। उन्होने बड़ी हर्षित मुद्रा मे झोले से मिठाई के दो डिब्बे निकाले और बोले-एक डिब्बा इस प्रमोशन के लिए परिवार का। एक डिब्बा सोर्स लगाने के लिए आपका। ....और जल्दी से तैयार होइए दुबे जी के यहाँ भी चलना है,उनको भी मिठाई पहुंचानी है। मैंने झोले मे झाँककर देखा,मिठाई के कई डिब्बे रखे हुए थे। मैंने पूछा इतनी सारी मिठाई.....? वे बोले जहां जहां और जिससे जिससे सिफ़ारिश कारवाई थी,मिठाई तो सबको खिलानी है।
मैंने स्यमंतक जी से कहा कोई जरूरत नहीं है सबको मिठाई पहुंचाने की। प्रमोशन आपका आपकी काबिलियत से ही हुआ है। सोर्स फोर्स कोई काम आया नहीं। उन्होने पूछा-ये कैसे कह सकते हैं आप...! हमलोग खुद गए थे दुबे जी से कहने...! हाँ,लेकिन मैंने वो बात आपको तब नहीं बताई थी। दुबे जी ने बाद मे बताया था मुझे कि मैंने तो बात साहब तक पहुंचा दी थी,लेकिन साहब ने बात आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था। कहा था कि जया वर्मा बहुत स्ट्रिक्ट अफसर हैं। वे किसी की सुनती भी नहीं और हम ऐसी बात उनसे कहते भी नहीं। इस तरह देखें तो क्या पता आपका नाम उनतक पहुंचा भी था या नहीं। और अगर पहले से नाम पहुंचा होता तो उनकी डायरी मे पहले से ही नोट भी होता। ये प्रमोशन तो इंटरव्यू मे आपके जोरदार प्रदर्शन पर हुआ है,ऐसा मुझे लगता है।
मेरी इस बात के जवाब मे स्यमंतक जी ने लाख टके की एक बात कही जो मेरे दिमाग मे 23,24 साल पहले इंप्रिंट होकर रह गयी और आज भी जबतब दिमाग खटखटाती रहती है। उन्होने कहा कि चलिये मान लिया किसी ने कुछ नहीं किया होगा। लेकिन हमने तो इन सबसे अपनी बात कही थी न। ...तो हम ये क्यो न मान लें कि इन सबकी कोशिशें हमारे काम आयीं। हम ये क्यो न सोचें कि इन सबने अपना ज़ोर जरूर लगाया होगा। आखिर जिस काम के लिए तब हमलोग दौड़ रहे थे,उसके लिए खुद पर भरोसा तो नही था।...तो अब इसे अपनी सफलता मान लेना कृतघ्नता होगी न...! हम ऐसा क्यो न समझें कि जिस जिससे हमने कहा था,उन सबने हमारे लिए शक्ति लगाई और इस सफलता का श्रेय उन सबको जाता है...! किसी ने कुछ नहीं किया ये मान लेने से दस किलो मिठाई तो बच जाएगी लेकिन इतने सारे लोगों से मन भी तो खराब होगा।...लेकिन सबने हमारा साथ दिया ये मान लेने से दारोगा बन जाने की खुशी कितनी बढ़ जाती है। हम तो आज हर उस आदमी को अपनी खुशी मे शामिल करना चाहते हैं,जिससे जीवन मे कभी भी कुछ भी सीखने को मिला हो। पता नहीं उस दिन इंटरव्यू मे किसकी कौन सी सिखावन,किसका कौन सा आशीर्वाद या किसकी कौन सी शुभेच्छा काम आई हो...! आज तो हम सारे शहर के मुंह मे एक लड्डू रख देना चाहते हैं।
यह बात मेरे जेहन मे घुस गयी। हम दोनो ने एक बार फिर साइकिल उठाई और शहर भर मे तीस चालीस किलोमीटर साइकिल चलाकर मिठाई के वे दसियों डिब्बे उनके हकदारों तक पहुंचाये। हमारी ये स्मृतियाँ तो यहीं समाप्त होती हैं लेकिन विचार भाव कुछ आगे भी चलते हैं। इसे ही संस्कार कहते हैं दोस्तों...! ये हमारी सोच के संस्कार हैं जो हरेक के प्रति हमारे मन मे कृतज्ञता भाव के बीज बोते हैं। गर्दन अंकडकर नहीं,विनम्रता के भाव मे स्थिर रहकर जीवन जीने की कला सिखाते हैं। इन और इन जैसे संस्कारों का समुच्चय ही हममे हमारी संस्कृति गढ़ता है। अपने संस्कारों और संस्कृतियों से परिचय करना हो तो सामाजिक,पारिवारिक रिश्तों की गहराई मे उतरिए,अपने बुजुर्गों के साथ कुछ देर साइकिल ही चलाइए। उनके पैरों मे कुछ देर बैठिए। बूढ़ी पपनियों को जरा उलाटकर उनमे निहारिए। अनुभूत और अव्यक्त सत्यों का खजाना भी तो मिल सकता है। हो सकता है कुछ पुण्यश्लोक,कुछ दैवीय ऋचायेँ,कुछ फरिश्ताई आयतें ही दिख जाएँ वहाँ। हो सकता है वहाँ कुछ शास्त्र,कुछ उपनिषदें ही लिखी पड़ी हों। जीवन-पथ पर चार फलांग भी आगे चल चुके लोग अपने पास जीवन के सूत्र रखते हैं। हो सकता है आदर और अपनेपन का एक स्पर्श उलझी हुई ज़िंदगी का कोई सुलझा हुआ सिरा ही पकड़ा दे। उनकी गांठ मे सब कुछ कंकर पत्थर ही नहीं होता। सोने की खदान भी हो सकती है। एक बार उन झुर्रियों मे झाँकिए तो सही.....!
(स्यमंतक जी अब रिटायर हो चुके हैं और गोरखपुर के तारामंडल क्षेत्र मे ही कहीं घर बनवा लिया है। गोरखपुर के मित्रों को अगर कहीं वे दिख जाएँ तो उनसे मेरा प्रणाम जरूर कहिए।)
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