Monday, 2 November 2015

यहाँ है असहिष्णुता

कोई इन्टरनेशनल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी है--मूडीज़ नाम है उसका। उसकी तमाम माफिक रिपोर्ट्स पर इतराने वाले भाजपा के मंत्रियों ने उसकी ताजा रिपोर्ट पर चिचियाना शुरू कर दिया है। इस रिपोर्ट मे एजेंसी की तरफ से कहा गया है कि केंद्र सरकार अपनी साख खो रही है। अब चूंकि मंत्रियों के चिचियाने से खोयी हुई सरकारी साख वापस आ जाती है,इसलिए वातावरण इन चिचियाहटों से भरा हुआ है। इन मंत्रियों मे सरकार से लेकर संगठन तक के मंत्री शामिल हैं,इनमे सोशल मीडिया मे उपस्थित सरकार के हजारों,लाखों मंत्री प्रवर भी शामिल हैं। बगैर इस बात से कुछ सीखे कि दिवंगत यूपीए सरकार के मंत्री भी इसी तरह चिचियाते चिचियाते चले गए। उस दौर मे भी जब उस सरकार और उसके मंत्रियों के काम पर सवाल उठते थे तो बिना अपने गिरेबान मे झाँके वे चिचियाने लगते थे। उस चिचियाने का सुखद परिणाम देश को मिला और निरंकुश अहंकारी सरकार भूलुंठित हो गयी। चिचियाना एक राजनीतिक क्रिया है। इसमे सभी माहिर नहीं होते। यूपीए के दौर मे सर्वश्री बैरिस्टर कपिल सिब्बल,अनर्थशास्त्री पी॰ चिदम्बरम,विकलांग सेवी श्री सलमान खुर्शीद और चिरयुवा माननीय दिग्विजय सिंह जी चिचियाहट कर्म के विशेषज्ञ लोग थे। ये लोग यूपीए सरकार की तेरहवीं तक चिचियाते ही रहे अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ये चिचियाना उन्होने सरकार के दूसरे कार्यकाल मे शुरू किया था,जो अंतिम दो तीन सालों मे इतना बढ़ गया कि देश को एक करवट लेनी पड़ी.....और बस देश की एक ही करवट हमेशा पर्याप्त होती रही है। एनडीए सरकार की खास विशेषता ये है कि इन लोगों ने अपनी शुरुआत के शुरुआती सालों मे ही यूपीए वालों की पूरी गुणवत्ता हासिल कर ली है। एनडीए के बैरिस्टर श्री अरुण जेटली साहब इधर तीन दिन से चिचिया रहे हैं। दिवंगतों की ही भांति इनकी चिचियाहट मे भी खिसियाहट भाव की प्रधानता है। चिचियाते हुए जेटली साहब तीन दिन से सवाल पर सवाल दाग रहे हैं। हर सवाल की एक ही धुन,वो भी विलंबित लय मे है---कहाँ है असहिष्णुता...? कहाँ है असहिष्णुता...? कहाँ है असहिष्णुता...? ये सवाल सुन सुनकर मुझे भगवान राम की याद हो आई है। कहाँ है सीता.....? कहाँ है सीता....? कहाँ है सीता.....? मुझे लग रहा है जेटली साहब अवतारी पुरुष हैं और अंतर्यामी भगवान की तरह ही सबकुछ जानते हुए भी नरलीला कर रहे हैं। आइये भगवन...! हम दिखाएँ....! कहाँ भटक रहे हैं आप...!जटायुवों ने हर युग मे देखी है सीता।
डॉ काशीनाथ सिंह ने कहानियाँ और उपन्यास तो कई लिखे हैं लेकिन ताजा चर्चा उस उपन्यास की जिसका नाम है 'उपसंहार'। यह उपन्यास महाभारत बीतने के बाद कृष्ण के अंतिम दिनों का कथानक है। महाभारत युद्ध मे चरम सफलता के बाद एकाकी हुए कृष्ण के मनोमंथन और ब्याध के हाथों हुई उनकी मृत्यु की बहुश्रुत गाथा इस उपन्यास की भावभूमि है। इस उपन्यास को लिखने से पहले लेखक ने मौसलपर्वणि,मौसलपर्व,श्रीमदभागवत,हरिवंश पुराण,युगांधार,युगांत,भारत सावित्री और द्वारका का सूर्यास्त ......आदि जाने कितने-कितने ग्रन्थों का अध्ययन किया और कथानक की प्रामाणिकता के लिए उनसे संदर्भ लिए। एक लेखक ने पूरी पीड़ा के साथ अपना प्रसव काल भोगा और अपने समाज को उसका दर्पण सौंपा। जी हाँ,मैंने पूरे मनोयोग से पढ़ा है ये उपन्यास। फरवरी 2014 मे उपन्यास प्रकाशित हुआ और सितंबर महीने मे उनके पास धमकियाँ आनी शुरू हुईं। इन धमकियों के पीछे का ज्ञान देखिये,देखने लायक है---तुम काशीनाथ हो...?क्यो लिखा बे कृष्ण पर उपन्यास....? मुहम्मद साहब पर क्यो नहीं लिखा....? ईसा पर क्यो नहीं लिखा....? तीन दिन तक अलग अलग नंबरों से हर घंटे आने वाली फोन काल्स से परेशान लेखक तीन दिन सोया नहीं। साहित्यिक पत्रिका 'तद्भव' के संपादक अखिलेश जी ने जब सारे नंबर ट्रेस करवाए तो पता चला कुछ नंबर गुजरात के,कुछ तमिलनाडु,केरल,कर्नाटक,पंजाब और कुछ हरियाणा के नंबर थे। कलबुर्गी की हत्या के बाद स्वाभाविक ही काशीनाथ जी सोचने पर मजबूर हुए। भ्रम फैलाये जा रहे हैं कि काशीनाथ जी ने अपना सम्मान लौटाने का फैसला बादल दिया है। नहीं जनाब,काशीनाथ जी ने चेक भेज दिया है और मोमेंटों लेकर खुद दिल्ली जाने की तैयारी मे हैं। जेटली साहब....! यहाँ है असहिष्णुता....दिखी आपको....?

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