दिल्ली चुनावों के बाद जो निगेटिव घिनौना ट्रेंड देखा गया था,बिहार चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर दिखा है। जिनके पैरों पर गिर गिर के वोटों की भीख मांगी थी,उन्हे दिल्ली,पंजाब और मुंबई का अहंकार अब मजदूरी के लिए बुला रहा है। नाशुक्रों की बौखलाहट का बुरा नहीं मानते हम,ये डंके की चोट पर सुनिए। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की भाषाई और सांस्कृतिक एकरसता हमे एकसाथ खड़ा करती है इसलिए आज फिर बिहार की तरफ से बोल रहा हूँ और हमेशा बोलता रहूँगा। अपनी राजनीतिक जमीन खो देने के बाद पगलाए भक्तों ने ही नही,अब केंद्रीय सरकार के मंत्रियों और बीजेपी के पदाधिकारियों ने भी बिहार के जातिवाद मे अपनी हार के श्रोत ढूँढने शुरू कर दिये हैं। विरोधी को कुत्ता बिल्ली कहने की अपनी घटिया असांस्कृतिक मानसिकता के बावजूद ये अभागे लोकतन्त्र की बात करते हैं। दिल्ली को भी लगाते लगाते जब इनका तेल चुक गया था तो गालियां दे देकर भंडास निकालते रहे थे ये लोग महीनों तक। ...और अब सॉफ्ट टारगेट मिला है बिहार। भूले हुए हो तुम कि तुम्हारे आका ने भी सॉफ्ट टारगेट ही समझा था और गुजरात का झुनझुना लेकर बिहार के डीएनए से खेलने चल पड़े थे। अभी तक कोमा मे हैं। हांजी हाँ,पाकिस्ताम मजे ले रहा है। परिणामों का नही,तुम्हारी अहमक़ बयानबाजियों का,जिसमे न कहीं महंगाई थी,न कहीं गरीबी थी,न कहीं बिहार ही था,न कोई इस मिट्टी की सोच ही थी.....बस जिसमे पाकिस्तानी पटाखों का थोथा भय था,विकास की नामुराद उलटबाँसियाँ थीं....और था बिहार का अपमान....घोर अपमान। हाँ....हैं हम मजदूर....और बनाया है हमने मज़दूरियां कर कर के अपना देश। तुम्हारे मुंबई और पंजाब भी बनाए हैं हमने। ....और याद रखना,चुभा बहुत है ये चुनाव एक एक बिहारी को। पूरा दम साध के सुन रहे हैं हम अबतक तुम्हारी गालियां... और जवाब इसका भी देंगे। हम देंगे जवाब क्योंकि हमे मालूम है विकासवादी इस दुनिया मे हर बड़ा कहलाने वाले देश को बिहारी वैज्ञानिकों और गणितज्ञों के शोध आज भी सीना चौड़ा करके चलने की वजह देते हैं।
लौटो बिहारियों लौटो...! अब लौटो कि तुम्हें देस बुला रहा है तुम्हारा। तुम जहां भी,जैसे भी हो,लौटो अपनी जन्मभूमि,अपनी मातृभूमि की ओर लौटो। आओ गढ़ेंगे मिलकर नई मुंबई और दिल्ली हम इसी सरजमीं पर...! सबसे ज्यादा बोलियाँ,सबसे ज्यादा भाषाएँ,सबसे ज्यादा लेखक,सबसे ज्यादा कवि,सबसे ज्यादा दार्शनिक,सबसे ज्यादा संस्कृतियाँ,सबसे ज्यादा लोकोत्सव,सबसे ज्यादा मेधाएं,सबसे वजनदार लोक परम्पराएँ,सबसे सम्मृद्ध इतिहास...और सबसे कीमती भूगोल रखने वाला बिहार अगर मजदूर है तो इसीलिए दशरथ मांझी भी उसी के गर्भ से पैदा होता है। आओ लौटो राजहंसों.....,खोदेंगे अपनी खदानें,जिएंगे अपने पहाड़ों के बीच,और जोतेंगे अपनी धरती। ....और भगाओ मिलकर उन लालची भेड़ियों को जो हमारी खदाने खोदकर अपनी तिजोरी भरते हैं और हमे मजदूर बनाने का मुगालता पालते हैं। आओ कि वो चेतना,वो दृष्टि तुम्हारी ही धूसर आँखों मे,तुम्हारे ही खुरदुरे पाँवों मे,तुम्हारे ही श्रमशील हाथों मे है,जो संस्कारों और संस्कृतियों का मेला रचती है। विरासत बिहार की हमारा आईना है,इसलिए शब्द बिहारी को हम गाली नही रहने देंगे, यह शब्द हमारे गौरव का वाहक बने, हम इसे पुरस्कार बनायेंगे अपना। आओ,मिलकर दिखाएंगे दिया विकास के उन मक्कार नारेबाजों को, व्यापार जिनका धंधा है, ऐबसर्ड खुद जिनका वजूद है और लूट जिनका कैरेक्टर है। भूलिये कि कोई लालू आ रहा है या कोई नीतीश। बस इतना याद रखना कि ये साम्राज्यवादी किस्म की दूषित और शोर मचाती,प्रलापी राजनीति को एक सशक्त और संभावनाशील विकल्प मुहैया करवाया है जनमत ने। बता दो दुनिया को कि ये विकल्प जाया नही होने देंगे हम। हलफनामे भरो कि मतदाता की लोकनिगरानी मे चलेगी बिहार की सरकार। गंगा के किनारे ये जो चिराग बिहार ने जलाया है,उसकी जोत से जोत जलाते चलेंगे हम और गंगा का पूरा किनारा रोशन करेंगे अपने पसीने से। आओ मिलकर दिखाएंगे इन आँखों के अंधों को कि हमे दूसरों के लिए ही नहीं,अपने लिए भी पसीना बहाना आता है। लौटो राजहंसों.... लौटो !
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