जब दिया जलायें तो उसकी रोशनी मे आये हर चेहरे को जरा गौर से देखें। जहां बोध दिखेगा,वहाँ ज्यादा विरोध नही मिलेगा। और जहां विरोध ज्यादा है,वहाँ बोध नही मिलेगा। सुजाता से खीर क्या ले ली,विरक्त बुद्ध को विलासी बुद्ध कहकर उनके पंच-प्यारों ने उनका आदर करने से इनकार कर दिया। लेकिन चेहरे का दमकता हुआ दर्प और आकर्षण तो खींचता था। अब सत्य को शब्दों मे कैसे ढालें..! सत्य की व्याख्या शब्दों से तो नही हो सकती। हाँ,चेहरा सत्य की व्याख्या अवश्य कर देता है। असल मे तो चेहरा ही सत्य का शास्त्र है। अरे,थोड़ा सा मुस्कुरा दो तो प्रेम की व्याख्या हो गयी। आँखों मे थोड़ा सा पानी भर लो तो करुणा की व्याख्या हो गयी। बोधगया का ज्ञान बुद्ध किसी और को भी दे सकते थे,पर उन्हे तो अपने पंच-प्यारों की ही तलाश थी और वे उन्हे सारनाथ मे मिले। बुद्ध से मानवता सम्बोधि की भिक्षा आज भी सारनाथ मे मिल जाती है। सत्य की अपनी सुगंध होती है। लेकिन बिना एक दिया जलाए सत्य की उलझन भी सुलझती नही। बिगड़े हुए रेडियो को ठीक करने के लिए उसकी ट्यूनिंग ठीक करनी पड़ती है,कभी कभी ज्यादा बिगड़े हुए रेडियो को बजाने के लिए उसे एक थप्पड़ लगा देते हैं। smile emoticon रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद को ऐसे ही एक थप्पड़ से छू दिया तो दुनिया ने देखा ही,क्या रेडियो बजा साहब। आइये,दिये की लौ को हथियार बनाएँ और सत्य के इस समर मे आयें.... आप सभी को प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं...!
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