Thursday, 31 December 2015

उस आग मे निखरी ये अनकही लवस्टोरी


 
ये सरिता पाण्डेय हैं....और ये हैं उनके पतिदेव अजय पाण्डेय। गाँव मे इनको लोग प्यार से मंटू बाबा बुलाते हैं आजकल। अब सरिता के साथ इनके पतिदेव की फोटो इसलिए लगाई है क्योंकि ये दोनों मेरी नज़र मे एक परीकथा के नायक नायिका हैं। चाहता हूँ कि इस परीकथा के अबतक गुमनाम रहे ये नायक नायिका आज मेरी कलम से जलवा अफ़रोज हों। इसी कथा से निकलेगी सरिता के इस वीभत्स से दिख रहे चेहरे के पीछे की वो दास्तान भी, जो इन्हे नायकों का दर्जा देती है।
1998 का वर्ष खरामा-खरामा बीत रहा था, शादी की बात चलने लगी थी कि तभी अचानक एक दिन मंटू ने घर मे धमाका किया। शादी करूंगा तो सरिता से ही, वरना नही करूंगा। ....कौन, कौन, सरिता कौन....? अरे, बड़की भाभी की बहन सरिता और कौन सरिता। देश के एक निचाट कोने मे बसा हुआ धुर देहाती गाँव और वहाँ के धुर देहाती लोग। आप समझ सकते हैं क्या हुआ होगा...! अरे तूफान आ गया तूफान। न केवल उनके घर मे बल्कि पूरे गाँव मे। औरतों की महफिलें ऐसे शुरू होतीं--बाबा रे बाबा, अइसन लड़का लड़की ना देखे अबतक। ई कौन बियाह है रे। लड़कियां बूढियों को बतातीं-लव मैरिज आजी। हाँ....लभ मैरिज होत हौ। आज तलक त केहू के ना भयल ए गाँव मे लभ मैरिज। अब मंटू करिहें लभ मैरिज। लड़का लड़की पहिलही से दुन्नों राजी। बहुते खिचड़ी पकी होई। आ हाऊ सरितवा क देखा...मुसड़ी नीयर बीया आ लभ मैरिज करतीया। बाबा रे बाबा.....!
और इधर घर मे----खाना पीना सब बंद। जैसे मातम पसरा हो कोई। कोई किसी से बात ही क्यो करे। जो कभी पूरे गाँव मे नही हुआ, अब इस घर मे होगा। आखिर खानदान को मुंह भी दिखाना है कि नही। कहाँ जाएँगे, कौन सा मुंह दिखाएंगे--माता पिता की साझा समस्या। बड़की भाभी खुश...कि बन गयी बात तो अब बहन इसी घर मे आएगी...और बड़का भइया मौन....कि जो होगा देखा जाएगा। बाकी के भाई बहन सब मूक श्रोता...मूक दर्शक...! गाँव मे दूसरे के मंडवे मे हंसने वाले भी बहुत होते हैं, यहाँ भी थे। बची गाँव की नौजवान पार्टी तो वो मंटू के गलबहियाँ डाले दिन-दिनभर जोगीरा की तान छेड़े। उधर मंटू अलमस्त कि अब तो बोल ही दिया है। आई आम चाहे जाई लबेदा। उधर सुनते हैं अपने गाँव मे सरिता का घर से निकलना मुहाल---ईहे ईहे लइकिया ह....बहिनिया की देवरा से लभ मैरिज करथियsss। जमाना झकोर मार रहा था दोस्तों और ऐसे हर वक़्त मे आज भी हमारे समाज, हमारे बड़ों और हमारे बुजुर्गों की देह से कांटे छुरियाँ निकाल आते हैं और उसे तो खा ही जाना चाहते हैं, जिसने ये प्यार करने वाला अपराध कर डाला हो।
हमारे गाँव मे मंटू ये अपराध कर चुके थे और इन सारे काँटों से बेचारा अकेला छिल रहा था। इधर ये उधर वो, छिल तो दोनों रहे थे मगर झेल अकेले-अकेले रहे थे। फिर भी डटे हुए थे दोनों मिलकर अपनी कसमों के बल पर, अपने वायदों के बल पर, अपनी पसंद के बल पर, अपने प्यार के बल पर। मुझ जैसे भी तब यही सोच रहे थे कि नयी उमर का भूत है, शादी हुई तो भी, नही हुई तो भी उतर जाएगा एक दिन। हो गयी तो कोई बुरा भी नही। एक घर मे दो बहनें ब्याही तो जा ही सकती हैं। तबतक कोई भाभी चाची बोल दे---अरे नाही भइया। एक घरे मे दू बहिन ....माने दुसुमन फेल। दयादी सुरू हो जाई, दयादी। तबतक कोई तीसरी बोले--अरे, हमरे मौसी की जेठान के भौजी क बहिन उनकर देवरान भी रहलीं। खूब निबहल की......! घर-घर, गली-गली....और गाँव-गाँव बस एक ही चर्चा--मंटू क बियाह मुन्ना बो की बहिनिया से। ......लेकिन कुल जमा बताने की बात ये कि लाख विरोध, लाख उपदेश और लाख अपमान सहकर भी मंटू ने माँ-बाप, कुटुंब-परिवार अंततः सबको मना ही लिया कि ठीक है शादी वहीं होगी। मंटू जिद्दी थे, उनकी जिद के आगे घर मे सबको झुकना पड़ा। इधर सरिता के माँ बाप, बाकी के नाते रिश्तेदार, घर गाँव सबको मंजूर कि अगर उधर घर मे सब राजी हैं तो हम भी राजी हैं। कुल मिलाकर ये कि 6 मई 1999 को मंटू ने सरिता से ही शादी की और कहने की जरूरत नही कि बिना दहेज शादी की। बिना दहेज मतलब बिना दहेज...पूरी तरह दहेज रहित। कोई लेनदेन नही हुआ इसलिए मुंह सबके मुरझाए हुए थे सिर्फ दो जन को छोडकर। मंटू और सरिता, जिनहे अपनी धरती और अपना आसमान दोनों मिल गए थे।
सरिता बहुत खूबसूरत थी। मंटू का गाँव नयी दुल्हिन के लिए अनजाना नही था। वो भी इस गाँव के लिए अनजानी नही थी। बड़ी दीदी के ससुराल वो बचपन से आया जाया करती थी। इसलिए गाँव के हर घर मे आना-जाना था। गाँव ने उसे बड़ी होते देखा था। आमतौर पर किसी को सरिता से कोई शिकायत नही थी, शिकायत केवल प्यार की उस घोषणा से थी। शिकायत इस शादी से नही, इस तरह की शादी से थी। ऊपर-ऊपर सब ठीक से बोलते लेकिन बड़े बुजुर्ग भी और छोटे शुतुरमुर्ग भी अंदर अंदर खूब तिलमिलाते। अपने मन से कोई कैसे कर सकता है शादी। ठीक है बेटा, किए हो न ..... तुम्ही भोगोगे। ये जो भोगोगे का श्राप होता है न, उसके पीछे बड़े कातर दुख की कल्पना होती है लोगों की। जी हाँ लोक का सामूहिक अहंकार इसी शक्ल का होता है। अपने उस सामूहिक अहंकार की सुरक्षा मे वह प्रियजनों तक के लिए अनिष्ट की कल्पनाएं और यहाँ तक कि उसके लिए प्रार्थनाएँ भी करने लगता है। लोगों का निष्कर्ष यही होता था कि अपनी अंगुरी पर नचाएगी सबको। प्यार करके आई है न। मंटू तो पहिलही से नाचते हैं। सब जवानी का जोश और खुल्ली छूट का नतीजा है। एक प्रेम विवाह और समाज के हजार अफसाने, लेकिन समाज की इस बकबक और सवालगर्दी को उसके हाल पर छोड़ के मंटू एक दिन अपनी नयी नवेली दुल्हनिया के साथ सुंदर जीवन जीने की कशिश लिए मुंबई चले गए।
अब मुंबई तो ठहरी मुंबई। मुंबई ने खूब टहलाया दोनों को। लेकिन प्यार करने वालों ने जिगरा मजबूत रखा और धीरे-धीरे गृहस्थी जमा ली। दो बच्चे आए बारी-बारी। एक बेटा और एक बेटी। यहाँ से एक ट्विस्ट आया। शादी के चार-पाँच साल बीतते-बीतते शायद प्यार का खुमार थोड़ा उतरने लगा होगा और जिंदगी के झंझावात उलझाने लगे होंगे दोनों को। हम अंदाजा लगाते हैं कुछ बहसें हुई होंगी, कुछ तकरारें हुई होंगी, कुछ झंझटे आई होंगी, कुछ परिवार के तनाव आए होंगे....लेकिन जो भी हुआ हो, एक दिन मुंबई से खबर आई कि सरिता को आग ने या आग को सरिता ने...पकड़ लिया और सरिता जल गयी है। पता ये भी चला कि सरिता को आग से छुड़ाते-छुड़ाते मंटू भी ज्यादा ही जल गए हैं। हे ईश्वर, गाँव से परिवार के लोग मुंबई भागे। अस्पताल से लेकर घर तक महीने भर तांता लगा रहा। लंबे इलाज और मंटू की खूब सेवा से सरिता की जान तो बच गयी लेकिन शक्ल और शरीर वीभत्स हो गए। मंटू की शक्ल तो बच गयी, लेकिन शरीर उनका भी जख्मी हो गया था। इस बीच सभ्य समाज चर्चाओं मे व्यस्त रहा। यही होता है, यही होता है...लभ मैरिज का मजा आ रहा है। अरे, हम पहिले ही कहते थे... नही कहते थे क्या...? अब भोगें दोनों। और करें प्यार मंटू। अब तो सूरत बिगड़ गयी न...अब लो प्यार का मजा...आदि आदि। ये गलचौर जरूर होता था लेकिन दुखी भी सभी थे। ये एक अजीब सा कैरेक्टर है अपनी सामाजिक संरचना का। किसी के दुख से दुखी होंगे लेकिन उस दुख मे ही अपने लिए एक सुख मरीचिका का कोना भी तलाश लेते हैं। इन सबके बाद एक कॉमन बात जो सभी सोचते थे, वो ये कि उफान तूफान मचा के कर तो ली लेकिन मंटू अब निभा नही पाएंगे ये शादी। अभी उम्र भी क्या है, दूसरी हो जाएगी शादी लेकिन अब ऐसी लड़की के साथ कोई पागल ही रहेगा। देखने मे ही चेहरा कैसा तो भयानक लगने लगा है।
जिस शहर ने लविंग बर्ड्स का इस्तकबाल आग से किया था, मंटू ने वो शहर छोडकर गाँव लौटने का फैसला किया। गाँव पहले ही सभ्य समाज से भरा हुआ था। इस घटना के बाद लोगों ने मंटू और सरिता को और भी हल्के मे लेना शुरू कर दिया। समाज ने ही नही, समय ने भी बेरुखी दिखाई। गाँव मे कुछ समय बीता और एक दिन आया जब परिवार मे बँटवारे की नौबत आ गयी। मंटू और मंटू बो एक तरफ और बाकी परिवार एक तरफ। बड़ी बहन ने भी संयुक्त परिवार के समीकरण साधते छोटी बहन को तिलांजलि दे देना मुनासिब समझा। वे दिन दोनों की ज़िंदगी मे गुरबत के थे। एक कमरा, एक टिन शेड और अपने हिस्से की छोटी सी खेती पाकर मंटू ने जीवन की बिखरी कड़ियाँ समेटने की जद्दोजहद शुरू कर दी। लड़का था बहुत हिम्मती और असल मे तीरंदाज़। करीब-करीब सोशल बायकॉट की स्थिति थी और मंटू एक साथ दो दो मोर्चे पर थे। एक तरफ परिवार और बाकी समाज की उपेक्षा थी दूसरी तरफ उसकी दिमागी हालत, जिसे प्यार करके ब्याह लाये थे और जिसने प्यार के निर्वाह से ज्यादा आसक्ति निराशा और हताशा से लगा ली थी। मुफ़लिसी और कठोर श्रम के उन दिनों मे एक दिन ऐसा भी आया, जब मात्र एक हज़ार रूपये के लिए मंटू ने अपना मुंबई मे खरीदा हुआ मोबाइल बेच दिया। अपनी फटफटिया बेच दी और बगल के बाज़ार मे किराये पर लेकर कपड़े की एक दुकान खोल ली। मंटू की जिजीविषा पर समाज की वक्र दृष्टि पूरे निरीक्षण भाव से लगी थी। और करो लभ मैरिज...दुकान मंटू से नही संभली और अंततः नही चली। सालभर मे ही कदम वापस खींचने पड़ गए। कुछ दिन चिंता मे बीते लेकिन मंटू ने हिम्मत नही हारी। बिकी हुई दुकान के पैसे मे कुछ और जोड़ जाड़कर मंटू ने गाँव मे ही एक आटा चक्की शुरू की और गेंहू की पिसाई शुरू कर दी। ज़िंदगी एक बार फिर ढर्रा पकड़ने लगी।
इस बीच पता चला कि मंटू और सरिता का बेटा पढ़ने मे बहुत ज़हीन निकल रहा है। मंटू का पूरा ध्यान बच्चे की पढ़ाई पर था। बेटी अभी बहुत छोटी थी। मंटू ने अपने सपने उसी एक बेटे मे रोपने बोने शुरू कर दिये। मुझे बहुत इंतज़ार हुआ करता था कि मंटू मोबाइल कब लेते हैं। मेरा इंतज़ार लंबा नही खिंचा। उसी आटे की चक्की से एक मोबाइल भी निकल आया और कुछ समय बीता तो एक सेकेंडहैंड मोटरसाइकिल भी। इस बीच छोटा भाई मुंबई मे सेटल हो गया था और बाकी परिवार के बनिस्पत मंटू से अधिक लगाव रखने के चलते आर्थिक मदद और भावनात्मक सपोर्ट भी करने लगा था। सभ्य समाज का नाम यहाँ एक बार फिर लेना चाहूँगा, जिसे इंतज़ार था कि अब ये जोड़ी टूट जाएगी, लेकिन उसे निराश होना पड़ा। मंटू जिद्दी थे। शायद तय कर लिया होगा कि सरिता से प्यार तो करके ही दुनिया से जाएँगे। पत्नी के चेहरे की वीभत्सता चाहे किसी का मन मोड भी देती होगी, पर मंटू की पत्नी तो उनकी प्रेमिका थी। लोगों को उम्मीद थी कि मंटू दूसरी शादी तो जरूर करेंगे। कोई कैसे रह और जी सकता है किसी भयावह चेहरे के साथ अंतरंग होकर, पर जो न रह सके, जो समर्पण से डिग जाये, जिसे भयावहता परेशान करे, उसका नाम और कुछ भले हो, मंटू नही हो सकता था। मंटू ने एक नयी बात सोची, पत्नी को एक संस्था से जोड़ दिया और सरिता छोटे-छोटे गरीब मुसहर बच्चों को पढ़ाने लगी। कुछ आमदनी इधर से, कुछ आमदनी उधर से, कुछ संकल्प अंदर से, कुछ जिदें बाहर से....सब मिलाकर बच्चे पढ़ने लगे, ज़िंदगी चलने लगी और मंटू की नज़रें दो तीन साल बाद होने वाले प्रधानी के चुनाव पर जा अटकीं। मन ही मन का संकल्प और बिलकुल मूक साधना। मंटू ने एक-एक घर से दोस्ती गांठनी शुरू कर दी।
पूरे ग्राम सभा क्षेत्र मे चुनाव लड़ने का मन बनाकर जमीन बनाने मे लगे मंटू को अचानक निराशा हाथ लगी, जब पता चला कि उनकी ग्राम सभा की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो गयी है। पत्नी को चुनाव लड़ाने की हिम्मत नही पड़ रही थी क्योंकि फिर शादी से लेकर बरबादी तक के हज़ार किस्से सिर उठाते, आरोप लगते, सवाल पैदा होते। लेकिन इसी उधेड़बुन मे एक दिन सारी चिंता को एक तरफ झटककर मंटू ने आपस मे राय की और सरिता को चुनाव मैदान मे उतार दिया। मंटू और सरिता ने कुछ तय करके जैसे कमर कस ली हो और बड़े मनोयोग से चुनाव प्रचार मे लग गए। मुझे लगता है कि प्यार मे आपका समर्पण आपको वजनदार और मूल्यवान आदमी बना देता है। उसमे भी अगर आपके पीछे-पीछे आपकी कहानियाँ भी डोलती हों, तो कसौटियों पर निखर के उतरना ज्यादा ही जरूरी काम होता है, उसके बाद आपकी उपेक्षा और उपहास आपका विरोध बनकर फिर धीरे से समर्थन मे तब्दील हो जाता है। चुनाव के दौरान मंटू ने पत्नी का ये चेहरा किसी से नही छिपाया और साथ-साथ लिए प्रचार मे लगे रहे, अपने संकल्पों से लोगों को लुभाते रहे और अपने जिद्दी सपनों की पड़ताल भी करते रहे। हमने देखा लोगों की उम्मीदें टिकने लगी हैं, अपने गाँव मे कम सही, लेकिन दूसरे गांवों से आता हुआ समर्थन दिखने लगा। उस दिन चुनाव के बाद गाँव से लौटकर मैंने लिखा था कि हम अपने गाँव की सरकार चुनकर आ रहे हैं। मतों की गणना हुई तो सरिता पाण्डेय की उम्मीदवारी सबकी अपेक्षा उनको मिले 32 अधिक वोटों से स्वीकृत हुई और हमारे गाँव मे कभी अनेक लांछनाओं के साथ दाखिल हुई एक बहू हमारे गाँव की सरकार बन गयी है अब। लेकिन ये सफल यात्रा अकेले सरिता की नही थी। बल्कि सरिता ने तो एक बार कदम पीछे को खींच ही लिए थे। वो तो मंटू थे कि एक हाथ मे बीवी और दूसरे हाथ मे प्रेयसी को थामे गिरते, डगमगाते, संभालते, संतुलन साधते एक अदृश्य राह पर अनथक चलते रहे और आज एक पड़ाव पर पहुंचे हैं, मुकाम ये भी नही है, जज़्बा अभी चलते रहने का ही है।
एक शादी का दिन था और एक आज का दिन है, मंटू का जीवन अबतक जिंदगी के लिए संघर्षों से लगातार साहसपूर्वक जूझते हुए ही बीता है। लड़के जब चुनाव प्रचार मे नारा लगाते थे कि मंटू बाबा सरिता पाण्डेय जुझारू उम्मीदवार हैं तो इन शब्दों के पीछे सच मे जूझते चलने का मंटू का इतिहास बोलता था। शादी के बाद पैदा हुए संघर्षों मे पड़े तो दोनों एक दूसरे का हाथ थामे जूझते ही रहे और अपने ही तरीकों के रंग ढंग से अपने पारंपरिक समाज को जवाब देते रहे। अंततः समाज के बोल बचन अब थमे हैं और अब तो मंटू सरिता के बोलने के दिन आए हैं। दोनों बोल रहे हैं... smile emoticon

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