Thursday, 31 December 2015

एक रिजोल्यूशन ऐसा भी


 
हमारे गांवो मे स्लम्स तैयार हो रहे हैं। एक तरफ ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएँ तन रही हैं,तो दूसरी तरफ अपनी ज़मीनों मे बढ़ती जा रही हैं झोपड़ियाँ भी। गाँव मे विकास आयातित होकर पहुँच रहा है। मुंबई,पंजाब और गुजरात तो पीछे छूट गए हैं, अब गांवों मे पैसा दुबई,मस्कट और शरजाह से आ रहा है। इस बिज़नेस के दलाल गांवों से सीधे संपर्क मे रहते हैं और नए लड़कों को अच्छी तनख्वाह के आंकड़े दिखाकर अरब, यमन, लीबिया और ईरान आदि देशों मे भेजते हैं। ग्रामीण आबादी की औसत प्रति व्यक्ति आय की तुलना मे इन देशों से कहीं ज़्यादा पैसा कमाने वाले ये लड़के दो-दो, तीन-तीन साल पर घर आते हैं। न जाने क्या-क्या काम उन्हे करना पड़ता है वहाँ रह कर...! कुछ जो फक्ट्रियों, कम्पनियों मे हैं, वो तो फिर भी सम्मान से जी लेते हैं। लेकिन कुछ जो निजी नौकरियों मे हैं, वे तो काफी हद तक दैहिक,दैविक,भौतिक हर तरह का शोषण भी सहते हैं। लेकिन जो भी करते हैं,यहाँ गांवों मे अपनी अट्टालिकाएँ तनवाते चलते हैं। इस तरह गाँव की प्रजा मे एक नया एलीट क्लास पैदा हो रहा है। ये तथाकथित पिछड़ों और दलित बस्तियों मे उगा एलीट क्लास है,जो समाज मे समृद्ध सवर्णों के साथ उठ बैठ कर अपने को धन्य समझ रहा है और ये सब मिलकर गाँव की राजनीति को दिशा दे रहे हैं। ज़ाहिर है राजनीति दिन पर दिन आपराधिक ही होती जा रही है। एक चुनावी जीत मात्र के लिए आर्थिक भ्रष्टाचार का नंगा नाच होता है अब गांवों मे। चुनावी भ्रष्टाचार किसी जमाने मे बूथ लूटने की हद तक ही होता था। लेकिन अब मतदाता को खरीदने की शक्ल मे होता है। शराब, मांस, कपड़े और रुपये बांटे जाते हैं। ये दृश्य उस राजनीति के हैं जिसे धनाढ्य और नवधानध्य वर्ग चला रहा है। मूल समाज की चेतना इस दृष्टि से आक्रोश मे है पर अफसोस की वह खुद कुछ कर पाने की स्थिति मे नही है।
हमारे समाज का वह हिस्सा जो आज भागा-भागा फिर रहा है, वह मूल समाज नही है। मूल समाज का स्वभाव अपनी गति पर चलना है,भागना नही है। तेज़ गति से अपनी जगह बदल रहा समाज देश के मूल समाज से अलग हो जाता है और रास्ता भटक जाता है। विकास मे संलग्न यह हमारे मूल समाज का भटका हुआ हिस्सा हैं। आप कहेंगे कि विकास के लिए या विकास के पीछे या विकास के साथ-साथ भागना कौन सा गुनाह है......! बिलकुल गुनाह है जनाब....॥!आप नाहक प्रकृति चक्र को उलट रहे हैं। ध्यान दीजिये जब गति के बल से कोई एक आगे बढ़ रहा होता है तब गति के ही बल से लाखों पीछे भी छूट रहे होते हैं। सबसे बेहतर हो जाने की कोशिश मे जब हममे से अनेक ऐसी कोशिश कर रहे होते हैं तो वैध-अवैध सब साथ-साथ कर रहे होते हैं। यह अवसर केवल मनुष्य को ही हासिल है कि वह ज्यादा बुद्धि, ज़्यादा शक्ति और ज़्यादा पैसा लगाकर अमीर बन सकता है। जबकि प्रकृति की बाकी सभी रचनाएँ चींटी से लेकर हाथी तक, दूब से लेकर बरगद तक सब अपनी ही गति से चलना चाहते हैं। वह तो आदमी ही है जो उनमे भी अपनी औकात भर गति का विज्ञान रोपता रहता है। खाद-पानी, यूरिया, पोटाश, इंजेक्शन आदि देकर फलों-फूलों, सब्जियों और जानवरों की स्वाभाविक गति को बढ़ाता रहता है और प्रकृति का चक्र अपनी कोशिशों से उलटता रहता है। गति बढ़ा देने से कोई जीव हो या कोई वनस्पति हो,उसका मूल्य थोड़ा ज़रूर बढ़ जाता है। लेकिन मूल औकात घट जाती है। चार दिन की ज़िंदगी दो दिन की रह जाती है।
जी हाँ, सही समझ रहे हैं आप। हम यही कह रहे हैं कि प्रयत्नपूर्वक अपनी गति क्यों बढ़ाते हैं आप...? प्रतिस्पर्धा की दुनियाँ गला काट है। उसमे क्यों उतरते है आप....? पैसा कमाने की धुन मे वह काम क्यों करते है जिसे करने मे मन नही लगता.....? प्रकृति ने हर चेतन हृदय मे अपार संभावना रखी हुई है। उसके लिए उचित वातावरण तो दीजिये। विकास के लिए ज़रूरी तापमान और माहौल की रचना कीजिये। गति बढ़ा देने या ज़ोर लगा देने या पैसा खर्च कर देने से बीज से पौधे नही निकलते। उचित वायुमंडल और समुचित पोषण मिले तो वे अपना विकास अपने आप पा लेते हैं। विकास करने की नही, खुद होने की वस्तु है। अब सवाल ये कि उचित पोषण तक से वंचित हम लोग उचित वातावरण कहाँ से लाते इसलिए उचित विकास भी नही कर पाते। मूल समाज की सामूहिक चेतना हमेशा ही ओजस्वी रहती है। रामराज मे भी वह धोबी के मुंह से फूट पड़ती है। गुरु को ईश्वर से भी ऊपर का दर्जा देने वाली चेतना से सम्पन्न भारत का मूल समाज द्रोणाचार्य को गुरु का सम्मान नही देता क्योंकि वे गुरुता के अपने आचरण से भटके हुए थे। दरअसल भटकने की एक प्रवृत्ति होती है। जो हमारी ऊर्जा का खूब दोहन करती है। इसीलिए विकास के साथ साथ हमारा अवमूल्यन होता चलता है। कैसा रहेगा, अगर विकास को नकारने का रिजोल्यूशन पास करें..... smile emoticon

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