कल रात रेडियो मिर्ची पर आरजे साइमा बोल रही थी। चेन्नई के लोगों के लिए हम दुआ करने के अलावा कुछ नही कर सकते। मेरा ध्यान उसके इसी एक वाक्य पर देर तक अंटका रह गया। अपने अहंकार मे अंकड़ा हुआ विज्ञान क्या दम तोड़ गया...? मशीनी इंतज़ामों और हवाई किलेबंदियों की हद पर पहुँच गए क्या हम कि इतनी बड़ी आबादी को राहत पहुँचने के लिए अब दुआओं का ही आसरा बच गया केवल...? आश्वस्त रहिए हम जैसे लोग चीखते-चिल्लाते मर जाएँगे, लेकिन सरकारों के कान पर जूं नही रेंगेगी। न कोई फर्क पड़ेगा पूंजी के सौदागरों को, न कोई फर्क पड़ेगा पार्टियों के हाथ बिक चुके आस्थावानों को, और न कोई फर्क पड़ेगा विनाश को खुला आमंत्रण देते विकास की अनियंत्रित सोच और उसके योजनाकारों को। लेकिन जमीन और प्रकृति के साथ जब इस तरह खुल्ला बलात्कार होता है तो प्रकृति को तो फर्क पड़ता है भाई और देखिये फिर पड़ गया है फर्क। चेन्नई के हालात बेहद भयावह हैं। आने वाली खबरों की छोड़िए, इधर के जो लोग वहाँ फंसे हुए हैं, फोन पर उनकी जुबानी बातें सुनिए तो रोंगटे खड़े हो जाएँगे।
और हम फिर चिल्ला चिल्लाकर कहना चाहते हैं कि मुंबई और उत्तराखंड के बाद ये जो महाविनाश चेन्नई को रौंद रहा है, उसका अगला पड़ाव हम हैं, आप हैं, तैयार रहिए विकास के मजे लूटने के लिए। पूरा चेन्नई द्वीप बना हुआ है। सारा का सारा विकास औंधे मुंह बाढ़ के पानी मे डूबा सिसकियाँ मार रहा है। ट्रेनें, उड़ानें, मोबाइल, टेलीफोन, एटीएम, बिजली, पेयजल सब बंद है, सब खत्म है। अय्यर नदी के बंधे से छोड़े गए पानी ने उन इलाकों मे कोहराम मचा रखा है, जिन्हे अबाध बिजली मुहैया कराने के लिए इसे बनाया गया था। पिछले सौ सालों की ये सबसे भयावह बाढ़ है, तिरुवल्लूर, चेन्नई और काँचीपुरम इस बाढ़ की डुबान मे हैं। जयललिता सरकार के हाथ, पाँव, देह, दिमाग सब फूले हुए हैं। रोज पब्लिक को विकास का बाटी चूरमा खिलाने वाले ये खिलाड़ी अब कह रहे हैं कि ये ऐक्ट ऑफ गॉड है। सुना आपने....? चेन्नई की आफत मे सीधा ईश्वर का हाथ है। हांजी, सही कह रही हैं आप मिस जयललिता...! जब विनाश होता है तो वो ईश्वर ही करता है, वो तो विकास है जो आप जैसे धरती के भगवान करते हैं।
पिछले कुछ सालों मे चेन्नई का गगनचुम्बी विकास हुआ है। मुंबई मे दसेक साल पहले जो विनाश किया था ईश्वर ने, उससे कुछ नही सीखा किसी ने। न चेन्नई ने ही, न बाकी देश ने ही। पिछले साल कश्मीर की भयावह प्राकृतिक आपदा से भी कुछ नही सीखा तो ईश्वर का मन बढ़ गया। उसने विनाश कर दिया उस चेन्नई का, जिसका शहरी नियोजन बाकी हिंदुस्तान की ही तरह त्रुटिपूर्ण है, अनियंत्रित है। नदियों और तालाबों के किनारे यहाँ तक कि उन्हे पाटकर उनके ऊपर हुए निर्माण, शहरी इलाकों मे पानी की सतत और निर्बाध निकासी की अव्यवस्था और शहरों पर बढ़ते आबादी के अनियंत्रित दबाव का नतीजा है ये सामने। घनघोर आश्चर्य है कि ये सब चेन्नई मे हो रहा है, जिसे वैज्ञानिक रूप से देश के उन्नत शहरों मे गिना जाता है। चेन्नई मे प्राकृतिक सम्पदा के साथ खूब बलात्कार हुए हैं। शहर के पारंपरिक तालाबों और झीलों को पाट-पाटकर निजी बिल्डरों ने अपना विकास किया है और जलीय व दलदली इलाकों मे कोंक्रीट के बड़े बड़े जंगल खड़े करके सरकारों ने चेन्नई का विकास किया है और ये सब मेरा आँखों देखा है।
चेन्नई को भी स्मार्ट सिटी बनाया जा रहा था। लाखों करोड़ों की योजनाएँ हवन हो गईं। ...अब......?? अपना बनारस भी इसी तर्ज पर स्मार्ट सिटी बनने की ओर है। एक नदी हम पूरी तरह पाटकर उसपर कालोनियाँ आदि बना चुके हैं। थोड़ा जो कुछ अभी बची हुई है, उस पर निजी बिल्डरों सहित वाराणसी नगर निगम की पूरी गिद्ध दृष्टि है। ये अस्सी का हाल है। वरुणा का हाल अभी दो दिन पहले ही हमने आप सभी से साझा किया था। रोज पाटी, रोज नोची और रोज बकोटी जा रही है वरुणा। शहरी कूड़े का पूरा पहाड़ वरुणा के ही गर्भ मे डालता है हमारा नगर निगम भी। शहर मे पुराने ऐतिहासिक तालाबों और कुंडों को इस हाल मे पहुंचाया जा रहा है कि एक दिन पाटकर उसपर महल दोमहले ताने जा सकें। विकास की नियंत्रणविहीन बाजीगरी बनारस की सड़कों और अब तो गलियों मे भी नंगा नाच खेलने की तैयारी कर रही है। सड़कों के किनारे से पूरी बेरहमी से पेड़ साफ कर दिये गए हैं। गंगा के किनारे घाटों पर दारू मुर्गे उपलब्ध कराये जा रहे हैं। गलियाँ उजाड़ी जाएंगी, स्मार्ट शहर बनाया जाएगा। अभीतक तो बनारस को किसी दैवी और अलौकिक शक्ति ने थाम रखा है, आगे का ईश्वर जाने....!
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