Sunday, 6 December 2015

मन की बात


 
करोड़ों लोग आज फेसबुक यूज़ कर रहे हैं। लाखों लाख लोग हर वक़्त कुछ न कुछ कह रहे हैं, ऐसा जैसे अभिव्यक्तियों का मानो विस्फोट हुआ हो। कोई विचार लिख रहा है तो कोई भाव उकेर रहा है, कोई तस्वीरें दिखा रहा है तो कोई व्यापार भी कर रहा है। जाने अनजाने एक दूसरे के जीवन मरण से भी जुड़े हुए हैं लोग। एक दूसरे के साथ रिश्तेदारियों का नेटवर्क बन गया है चहुंदिश...!कुल मिलाकर ये कि जो जहां है, वही से जुड़ा हुआ है और बोल रहा है, लगातार बोल रहा है। कितना दबा कुचला था अबतक आदमी का मन...! इस आभासी कही जाने वाली दुनिया को आभासी मानने की जुर्रत न करें। अपनी अपनी जमीन और अपने अपने इलाके मे हम सभी असल के लोग हैं, आभासी हममे से कोई नही है। सभी के अपने परिवार हैं, सभी का अपना समूह है, सभी का एक विशिष्ट चरित्र है, सभी के अपने जीवन व्यापार हैं, कठिनाइयाँ और आसानियाँ हैं, सभी के अपने-अपने बंद पिंजरे और सभी के अपने-अपने खुले आसमान हैं। सभी मे प्रेम है, सभी मे विवेक है, सभी मे आक्रोश है, सभी मे क्रोध है, सभी मे ललक है, सभी मे लालच है। सभी मे सबकुछ है, नही...?
फिर एक सवाल पैदा होता है कि एक समाज के रूप मे हम सभी यहाँ फेसबुक पर कर क्या रहे हैं...? बोलने के अलावा...? ऐसा कहते हैं और बिलकुल सच कहते हैं कि इस देश की,इस आबोहवा की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत अत्यंत सम्मृद्ध है। एक समाज के तौर पर अपने जीवन मे क्या वह आंतरिक सम्मृद्धि महसूस कर पा रहे हैं हम...? हम सभी एकदूसरे को नकारात्मकता से बचने की सलाहें देते हैं, हमारी अपनी रचनात्मकता हमे सुखी कर रही है क्या...? हमारे आसपास का समाज किस तरह के विमर्श मे शामिल है...? एक समाज के तौर पर हम सभी मिलकर क्या कर रहे हैं...? केवल और केवल राजनीतिक बयानों पर बहसें अधिकतर फेसबुक वाल्स पर चल रही हैं। क्या अपनी अपनी राजनीतिक आस्थाओं से निर्देशित होता हुआ लोकव्यवहार करने वाले समाज का ध्यान अपनी खुद की स्थिति पर है...? सामाजिक समस्याओं का समाधान क्या ढूंढ लिया हमने...? हर आदमी के अंदर कोई न कोई राजनीतिक पार्टी घुसी हुई है, क्यो...? सामाजिक विषयों का अकाल तो नही है। पर ऐसी हर चर्चा औंधे मुंह गिरती देखी जाती है। जो समाज के, देश के लिए चिंतित होगा, वो तो समाज और देश की बात करेगा न। अब समाज क्या करेगा, ये तो समाज को तय करना चाहिए न...? फिर समाज सरकारों से निर्देश क्यो ले रहा है...? समाज राजनीति से लाभ क्यो लेना चाहता है...?
समाज का एक एक बड़ा हिस्सा राजनीति के हवाले हो चुका है। जो बहुत बड़ा एक हिस्सा राजनीति के प्रभाव मे नही रहता, उसे चुनावों के जरिये प्रभाव मे लाया जाता है और चुनाव हर साल होते हैं। चुनाव के कार्यक्रम समाज की सुविधा के अनुसार बनाए जाने चाहिए। शादियों के मौसम मे कई बार चुनाव टल जाते रहे हैं। बच्चों की परीक्षाएँ हों तो चुनाव टल जाते रहे हैं। अगर ज्यादा ठंड या बरसात हो तब भी चुनाव टाले गए हैं, लेकिन मैंने कभी नही देखा कि किसानी का मौसम चल रहा है इसलिए चुनाव नही होंगे...? राजनीति समाज के साथ गलत करती रही है। उसे गलत ही करने की आदत है। हम देखते हैं खेती चुनावों के समय रुक जाती है। खेती मे चइती और अगहनी दो मुख्य फसलें होती हैं। ये खेती का पीक टाइम होता है। ये अगहनी खेती का दौर है। धान घर मे पंहुंचाना होता है और गेंहू के साथ साथ दलहन तिलहन बोना होता होता है। उसके लिए खेत खाली करने होते हैं,खेत जोतने होते हैं। अधिकतर छोटे किसानों के पास ज़मीनें कम होती हैं। वे उसी मे धान भी बोते हैं, उसी मे गेहूं भी। पलिहर खेत अब कम ही दिखते हैं। इन महीनों मे खेती और गृहस्थी के हज़ार कामों का दबाव होता है और इन महीनों मे किसान और कुछ नही करता, सिर्फ और सिर्फ खेती करता है। लेकिन चुनाव आ गए तो किसान भी उस मेले मे शामिल होने के लिए ललचाने लगता है। कितना भी बीत गया हो पर गाँव अभी बहुत कुछ अपनी रवायतों मे बचा हुआ है। सड़कों से थोड़ी दूर बसी आबादियों के बीच आज भी चुनाव मेले ठेले कि ही तरह गुलज़ार रहते हैं। चकल्लसों मे शामिल रहकर हम सब खुश होते हैं, किसान भी इतना खुश होता है कि अपनी सालभर की कमाई को दांव पर रखकर अलसा जाता है। बस चुनाव के बाद, बस चुनाव के बाद कहते हुए सुना हमने लोगों को। खेत मे तैयार फसल अभी खड़ी है,आधी कटी भी है तो पूरी नही कटी है, ऐसे दृश्य आम हैं और ये तब है जबकि अबतक अगैती गेहूं की आधी से ज्यादा बुआई हो जानी चाहिए थी। सामूहिक तौर पर बुआई अगर दस दिन भी लेट हो तो फसल के उत्पादन मे कमी दर्ज की जाती है।
पहले जिला पंचायत फिर ग्रामसभा....गाँव का लगभग तीन महीनों का समय चुनावों मे गया। इन चुनाव के कार्यक्रमों ने उत्तर प्रदेश मे गेहूं की खेती पीछे कर दी। राजनीति ने कृषि व्यवस्था को चोट पहुंचाई। और अब आपसे कहेगी कि आपके लिए हम आयात करेंगे। फिर वह इनवेस्टमेंट बटोरेंगी और हमसे आकर कहेंगी कि महोदय हमने आपके लिए इतना कर्ज जुटाया है। राज्य और केंद्र का सवाल नही, राजनीति के कुएं से निकलने वाली इन सरकारो का चरित्र ही यही बन गया है और हमारे बाकायदा सहयोग से बना है। सरकारें समाज से पैसे की भाषा मे बात करती हैं। और खुद पैसे की खपत के लिए बड़े से बड़ा बाज़ार खड़ा करती जाती है। सारा दोमुंहापन तो साफ है, फिर क्यो राजनीति से निर्देश ले रहा है समाज....? अब सवाल खेती का है तो ये तो बड़ा गौण सा सवाल है। इसपर कौन बोले, इसपर कौन माथा मारे, मेरा कोई सीधा संबंध तो खेती से है नही, यह सोचकर चुप रह जाने वाले बहुत हैं, जो हर हाल मे ही होते खेती पर ही निर्भर हैं। उनकी अर्थव्यवस्था का भी खेती से चोली दामन का साथ है। बस उन्हे एहसास नही होता कि खेती के साथ हुए मज़ाक को बेटी के साथ हुए मज़ाक की तरह लेता रहा है खेतिहर समाज...! और खेतिहर समाज से अलग कौन है यह तो तय कीजिये न। जो अलग मान रहे हैं खुद को, वे कृपया कृषि नियमावली न समझाएँ॥इस सवाल का जवाब ढूँढे कि राजनीति से निर्देश क्यो ले रहा है समाज....?

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