Sunday, 6 December 2015

विकास खाकर पेट भरा करेंगे...!

धनखेतों मे अमूमन नवंबर के आखीर तक धान के बिखरे हुए बोझ नही दिखते लेकिन कल गाजीपुर से लौटते हुए हम देख रहे थे खेतों से धान अभी उठा नही है। आमतौर पर ये समय गेहूं की बुआई का होता है इसलिए अबतक धान खलिहानों मे पहुँच चुका होता है और खेत खाली हो चुके होते हैं। लेकिन बरसात कम होने और जाड़ा भी अबतक कायदे से शुरू न होने के कारण धान पकने मे समय तो लगा ही, अपनी दुश्चिंताओं मे किसान अलग से उदासीन है। पहले हुए जिला पंचायतों के बाद अभी ग्राम पंचायतों के चुनाव ने भी बहुत कुछ फंसा रखा है। महीने भर चुनावी उलझनों मे उलझा रहा किसान अब झुंझलाया हुआ है। ध्यान देने की बात है अलसाई हुई किसानी और झुंझलाई हुई जवानी देश के हित मे नही होती। पर हम देख रहे हैं दुनिया के सारे व्यापार, सारे व्यवहार दुनिया वालों का ध्यान खींचे हुए हैं। सड़कों की नापजोख हो रही है। परमाणु बिजली घरों मे बिजली बनाई जा रही है, बड़े शहरों की गोद मे स्मार्ट शहरों का बिछौना लग रहा है। गलियों और नुक्कड़ों पर मल्टीप्लेक्स उगाये जा रहे हैं, कहीं वोट पड़ रहे हैं तो कहीं चोट पड़ रही है, कोई देश मे दौड़ रहा है तो कोई विदेश मे घूम रहा है। बीजेपी वाले सरकार चला रहे हैं, सपा वाले महोत्सव मना रहे हैं और कॉंग्रेस वाले 27 साल पुराने आईने मे अपनी बदशकली का मुयायना कर रहे हैं। कुल मिलाकर विकास की सीढ़ियों पर पूरी व्यवस्था गुत्थमगुत्था हुई पड़ी है। कुल मिलाकर रहने के, पहनने के, चलने के, उड़ने के, मचलने के, सँवरने के सारे इंतजाम देशव्यापी शक्ल लिए पड़े हैं। व्यवस्था बस खाने के इंतज़ामों मे नही उलझना चाहती। क्योंकि वो तो देश के किसान मजूर की पुश्तैनी ज़िम्मेदारी है। उनके बाप दादों ने ही मर मर के भी अपना हाड़ तोड़ते रहने और एड़ी का पसीना कपार पर चढ़ जाने की हद तक देश को खिलाते रहने का हलफ उठाया हुआ है। अभी तो किसानों की पीढ़ियाँ उसका निर्वाह मरते खपते कर रही हैं लेकिन अगर हालात यही रहे तो वो दिन दूर नही, जब किसानी पूरी तरह से विस्थापित होकर विकास के गले आ पड़ेगी और लोग केवल विकास खाकर पेट भरा करेंगे...!

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