अपने गाँव की सरकार चुनकर आ रहे हैं हम। अब कोई जीतेगा कोई हारेगा, ये तो तय होगा 13 तारीख को लेकिन जनता का पक्ष तो कल तभी जीत गया, जब खूब झूमकर वोट पड़े। कल मेरे गाँव और मेरे बूथ पर सत्तर प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश मे ग्राम पंचायतों के चुनाव हो रहे हैं। लोकसभा, विधानसभा और अन्य स्थानीय निकायों से अलग ग्राम पंचायतों के ये चुनाव बहुत टफ होते हैं। एक-एक आदमी पहचाना जाता है। एक एक आदमी पर काम होता है। एक एक आदमी पर निगाह रखी जाती है। एक एक आदमी हीरो होता है। एक एक आदमी के पीछे कई कई आदमी लगाए जाते हैं। दिनो दिन, हफ्तों हफ्तों, महीनो महीनों तक एक युद्ध चलता है, जिसके बाद आदमी आदमी नही रह जाता, पूरी तरह एक वोट मे तब्दील हो जाता है। ......और उसके बाद आती है कत्ल की रात...! वो आखिरी रात कि जिसकी अगली सुबह वोट बरसने होते हैं, ग्रामसभा की किस्मत तय होनी होती है। इतने दिनों मे मुर्गों और बकरों से खाली हो चुके इलाके इस रात दारू की गंगा मे नहाते हैं।....और इस तरह हमारे गाँव लोकतन्त्र का ये सर्वाधिक पेचीदा पर्व मनाते हैं। पेचीदगियाँ यहीं खत्म नही होतीं। इसी कत्ल की रात बूथ पर पहुंचे अधिकतर प्रिसाइडिंग ओफिसर्स दो दो हज़ार मे खरीद लिए जाते हैं, कितने ही मतदानकर्मी तो केवल मुर्गों और शराबों की दावतों पर बिक जाते हैं। कत्ल की इस पूरी रात जाग जागकर पहरे दिये जाते हैं और एक एक वोट की पहरेदारी की जाती है कि कहीं कोई बहकने न पाये। मैंने कई गांवों मे कई बूथों पर घूमकर देखा, अलस्सुबह 6 बजे से ही लाइनें सजनी शुरू हो गयी थीं। प्रत्याशियों और एजेन्टों के अपने-अपने दावे और गरीब गुरबा के अपने अपने इरादे। सूरज का पारा चढ़ता जाता है, वोटरों की लाइन बढ़ती जाती है और उम्मीदवारों कि अंकड़ उतरती जाती है। रुझान कुछ समझ मे ही नही आ रहा है। अंदर एजेन्टों की जुबान भी सूख रही है। वोटर कायदे से खूब छुपाकर मुहर लगाता है और उसका इरादा क्या है, कोई नही भांप पाता है। अंदर से लेकर बाहर तक गहमा गहमी है। अभी तो हर कोई जीत रहा है, कोई नही हार रहा है। दोपहर होते होते सभी के गुणा गणित भहराने लगते हैं। जेबें हल्की नही, अब तो खाली हो रही हैं। काम जो होना था, वो तो हो गया, उम्मीदवारों की उम्मीद ही नही, खुद उम्मीदवार भी पीछे सरकने लगे हैं। अब शाम हो रही है। मतदाता ने फैसला कर दिया है, मतपेटियाँ ले जायी जा रही हैं। प्रत्याशियों के चेहरे पर धूल पुती हुई है। कोई अंदाज़ा नही लगा पा रहा है कि जनता जनार्दन ने कहा क्या आखिर...! गरीब गंवई वोटर अब बहुत चालाक हो गया है। पूरे प्रचार भर सबकी खाता है, सबकी गाता है, लेकिन वोट देने वो पूरा मन बनाकर जाता है। राम रहीम सबकी सुनता है, लेकिन गाँव की किस्मत कैसे लिखनी है, ये वो केवल अपने मन मे गुनता है। महीनेभर सिर धुनकर उम्मीदवार अब थकान उतारने और नाजायज खर्चों का हिसाब लगाने बैठे हैं, .....और मालिक मतदाता नुक्कड़ नुक्कड़ हो रही चुनावी चकल्लसों के मजे ले रहा है, मालिक मतदाता अपने काम पर जा रहा है।
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