Thursday, 31 December 2015

कुछ सवाल

कुछ सवाल तो अरविंद केजरीवाल से भी पूछे ही जाने चाहिए। आपका राजनीतिक अस्तित्व ही भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने मे है। आप भ्रष्टाचार को किसी भी विधि से सहयोग, संरक्षण या पोषण देते नज़र आएंगे तो देश बौखलाएगा ही। सत्य, सदाचार और सत्याग्रह के संघर्ष मे अगर आप थोड़ी सी भी मिलावट करेंगे तो परिणाम कत्तई सही नही आएगा, यह ध्रुवसत्य है। सवाल ये कि राजेन्द्र कुमार पर यदि भ्रष्टाचार के आरोप हैं तो वो आपका पसंदीदा प्रधान सचिव कैसे हो सकता है...? आपको उसके कामकाज की शैली और अतीत की जानकारी नही थी, इस बात पर कैसे भरोसा हो...? राजेन्द्र कुमार ने स्वास्थ्य, शिक्षा आईटी विभागों का सचिव और वैट कमिश्नर रहते हुए कई निजी कंपनियों को विधि विरुद्ध फायदा पहुंचाया बताते हैं, यदि इन तथ्यों की जानकारी आपको थी तो उनकी नियुक्ति कैसे की आपने...? सवाल ये कि आज़ादी की दूसरी लड़ाई का नाम सुनकर जो लोग देशभर से ही नही, दुनियाभर से इकट्ठे हो गए थे, आपके पीछे खड़े होकर आपको इन बुलंदियों पर पहुंचाने वाले आपके वे साथी आज कहाँ हैं...? वे लोग जो आपके खड़े किए गए देशव्यापी आंदोलन मे अपना सुख-दुख भूलकर आपके लिए दिन दिनभर, रात रातभर सड़कें और गालियां नापते रहे, जब उनका मोहभंग होने लगा तो आपने इस छीजती ताकत को बचाने के लिए क्या किया...? जिस बनारस ने आपको सिर आँखों पर बैठा लिया था और जिनके सुख-दुख मे हमेशा शामिल रहने का आपने भरोसा दिलाया था, उस बनारस की गलियों ने आपको दुबारा नही देखा, क्यो अरविंद जी...? गांधीवादी और समाजवादी आंदोलनों के वे पुराने स्तम्भ, जो ढलती हुई उम्र मे भी अपने जीवनभर के अनुभवों के साथ आपके दिखाये सपनों के पीछे लामबंद हो गए थे और कई-कई महीने सुदूर गाँव देहातों तक की धूल फाँकी थी, आपने उन सबसे मुक्ति क्यो पा ली...? व्यवस्था बदलने की आपकी छटपटाहट को हमने आपकी आँखों मे देखा है, दिल्ली के दूसरे चुनाव के बाद मजबूत पकड़ के साथ सत्ता मे लौटने के बाद इस छटपटाहट को मूर्त रूप देने की दिशा मे दिल्ली की सरकार ने कौन से नए चरित्र अपनाए, जिसका संदेश गया हो देशभर मे...?
अगर इन सवालों के जवाब मे आपके पास केवल एक संदिग्ध किस्म की चुप्पी ही है, तो माफ कीजिएगा अरविंद जी, देश को एक और राजनीतिक पार्टी की जरूरत नही थी। राजनीतिक, कूटनीतिक और बेईमान लक्षणाओं से युक्त चार, साढ़े चार सौ पंजीकृत राजनीतिक दलों का बोझ ढोते-ढोते पहले ही इस देश की कमर टूटी जा रही है। शीला दीक्षित, रॉबर्ट वाड्रा और अंबानियों के खिलाफ आपके पास ढेरों सुबूत थे, आपने ही बताया था, हम क्या जानते थे भला...! उन सबपर कुंडली मारकर क्यो बैठ गए आप, देश इन सवालों पर आपके जवाब चाहता है। निश्चित रूप से सीबीआई की साख हमेशा से संदेह के घेरे मे रही है, यहाँ तक कि देश की सर्वोच्च अदालत ने भी उसे पिंजरे का तोता कहा, इसलिए आज भी उसका दुरुपयोग हो रहा है और अपनों को बचाने तथा आपकी बची खुची हिम्मत को तोड़ने के लिए हो रहा है, इस बात मे कोई संदेह नही है। एक राजेन्द्र कुमार के बहाने केंद्र की सरकार ने बिना किसी सूचना या अनुमति के आपके कार्यालय मे सीबीआई भेजकर एक चुने हुए मुख्यमंत्री को प्राप्त विशेषाधिकार और संवैधानिक गोपनीयता के नियम का स्पष्ट उल्लंघन किया है, इस बात मे भी कोई संदेह नही है लेकिन संदेह इस बात मे भी नही है कि अपनी साख आपने भी गंवाई है। ये मौका अपने प्रतिद्वंद्वियों को खुद आपने ही मुहैया करवाया है। ये ठीक है कि आपने अपने कई मंत्रियों और अधिकारियों को निकाला और उनके मामले सीबीआई को सौंपे, लेकिन हमारा सवाल ये है कि आपने उन्हे रखा ही क्यो था...? असल मे होता ये है कि जब आप उच्च नैतिक मूल्यों की बात करते हैं तो आपसे अपेक्षाएँ बढ़ जाती हैं और आप जानते हैं कि नैतिक सवालों के जवाब राजनैतिक तरीकों से नही दिये जाते। दिल्ली की सरकार और केंद्र की सरकार के बीच पैदा हुए इस विवाद का जवाब तो अब अदालत ही तय करेगी, लेकिन अरविंद केजरीवाल और आज़ादी की दूसरी लड़ाई मे अपना सबकुछ झोंक देने वाले आपके पुराने साथियों के बीच पैदा हुए इन सवालों के जवाब कौन तय करेगा अरविंद जी, कुछ बोलेंगे आप....?????

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