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जिन घरों मे बेटियाँ हैं, वे सवाल पूछती हैं- पापा, अफ़रोज छूट गया....?? हाँ बेटी। ...और बस इसके बाद एक निविड़ निस्तब्धता छा जाती है। न किसी के पास कोई सवाल होता है, न किसी के पास कोई जवाब होता है। आंखे चुरा के बाप बेटी दोनों, दोनों से पार पा लेते हैं। सुनिए, एक वाकया सुनाता हूँ-------
करीब दो साल हुए होंगे। अपने बीएचयू के 5,6 इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स शाम को गंगा घाट पर आए। गर्मियों के दिन थे और किसी पार्टी से होकर आ रहे थे सो सबने पी भी रखी थी। अचानक से प्रोग्राम बना कि नहायेंगे और बारी-बारी सब कूद पड़े गंगा मे। उस दिन काफी देर तक नहाते रहे वे स्टूडेंट्स उस दिन हॉस्टल नही लौटे। धीरे-धीरे सरगर्मियाँ बढ़ीं और खोजबीन शुरू हुई। कुछ सुरागरशी हुई तो जिम्मेदार लोग घाट पर पहुंचे। पता चला नहाते तो बहुतों ने देखा लेकिन नदी से वापस निकलते किसी ने नही देखा। गंगा मे गोताखोर कुदाए गए और अनहोनी एक-एक कर मुर्दा जवान जिस्मों की शक्ल मे बाहर आने लगी। एक-एक लाश निकलती जाती और हाहाकार मचता जाता। चेहरे पहचान पहचान के घरवालों को फोन किया जाता रहा, सूचना दी जाती रही। इस प्रकरण मे एक खास बात बताने की ये है कि एक बच्चे की लाश बहुत खोजने पर भी नही मिली। घर पर सूचना उसके भी दे दी गयी थी। उसके पिता थे ही नही। माँ का इकलौता लड़का था। माँ के साथ और भी परिजन आए थे और एकाध हफ्ते की खोजबीन के बाद सब निराश होकर वापस लौटने लगे, लेकिन कोई माँ ऐसे कैसे निराश हो जाती जब उसे पता हो कि मेरा बच्चा तो यही डूबा था, फिर सवाल बनता है कि वही से वो निकलता क्यो नही। सेना के गोताखोर बुलाये गए और उन्होने तकनीकी और मशीनों के सहारे दूर दूर तक जाल बिछाकर खोजा। शायद नीचे कहीं फंसा हो ये सोचकर घाट की सीढ़ियों के निचले तल तक गोते मार मार के खोजा लेकिन आसपास करीब 5,6 किलोमीटर की खोज के बाद सेना के जवान भी निढाल हो गए लेकिन लाश नही मिली।
42-44 साल की एक वेल एजूकेटेड माँ ने अपने बच्चे को पढ़ने भेजा था और उसे बुलाकर बता दिया गया कि आपका बच्चा मर गया और हम उसकी लाश आपको नही दे सकते, दे क्या हम तो आपको दिखा भी नही सकते। हमारी तकनीकी, हमारा विज्ञान, हमारा कानून सब हार गए। अब जब एक माँ को उसका बच्चा जीवित न सही, मृत ही सही, लौटाने मे व्यवस्था फेल हो गयी तो मुंह चुराने लगी, लेकिन माँ किससे मुंह चुराये भला। बिना बेटा लिए लौट गयी तो उसे सामना तो खुद का ही करना है, जवाब तो खुद को ही देना है। जब सवाल है तो जवाब तो चाहिए न। उसके बाद उस माँ ने घाट पर ही एक कुर्सी मँगवा ली और जम के वही गंगा के सिर पर बैठ गयी। अब उसकी बातचीत गंगा से शुरू हुई। तुम तो माँ हो, माँ का सीना फट रहा है और तुम निर्लज्ज की तरह बहे जा रही हो। तुम्ही ने लिया न मेरा बेटा.....तो दो अब। मै ऐसे कैसे जाऊँ खाली हाथ। तुम बेटा भी नही देती, बेटे की लाश भी नही देती। करीब-करीब चार-पाँच दिन वो रोज सुबह आ के घाट पर बैठ जाती, पैसे देकर गोताख़ोरों से बेटा खोजवाती और देर रात बेटे के हॉस्टल लौट जाती। अखबार वाले जमे रहते और उस बेज़ार माँ का करुण क्रंदन रोज की खबर का हिस्सा होता। .......और हुआ ये कि एक दिन वो विधवा माँ अपनी तार-तार उम्मीदों के साथ खाली ही हाथ अपने घर, अपने गाँव या अपने शहर लौट गयी। मै सोचता हूँ कैसे लौटी होगी वो औरत। क्या सोचकर लौटी होगी। एक माँ का यूं अपना जवान बेटा खोकर और लाश भी न पाकर पूरी तरह निराश होकर लौटना हमारी सभ्यता की बेहद खतरनाक तस्वीर है। क्या आपको नही लगता....?
किसी भी वजह से आई हो, मौत तो कुबूल हो जाती है, लेकिन लाश तो हर मृतक की चाहिए होती है। क्योंकि आगे भी कुछ दिन जीना होता है। अपने परिजनों की अंतिम विदा के बाद हम सभी उनकी लाशों के सहारे जीने के ढंग और रिवाज तलाश लेते हैं कुछ दिन के लिए। फिर उसके बाद जीवन के कुछ सिरे पकड़ मे आने लगते हैं। इसीलिए लाश का बरामद होना या किसी सूत्र अथवा सूचना का हाथ लगना हर हाल मे हर देश के कानून मे एक बाध्यकारी जरूरत है। वरना फिर कानून कौन सी भाषा गढ़ेगा अपने लिए। किस भाषा मे बोलेगा कानून कि वो जो कल जिंदा था, आज मर गया। कैसे मानें.....? क्यो मानें....? क्या सबूत है कि वो मर गया....? सवाल आप कितने भी पूछ डालिए मगर ये हुआ है कि व्यवस्था की विफलता ने एक माँ को इसी बनारस से खाली हाथ वापस भेजा और कानून अपने ही मुंह पर कालिख मलता रहा कई-कई दिन। बनारस दम साधकर रोज पढ़ता था उस माँ का आना भी, लौट जाना भी। लेकिन जब लाश नही मिली, तो कानून का क्या हुआ, उस मुकदमे का क्या हुआ, ये कभी किसी ने जानने कि कोशिश नही की। कभी किसी ने इस विषय मे कोई सवाल नही उठाया। विधान, नैतिकता या करुणा का कोई प्रश्न कभी आकार ही नही ले सका सभ्यता के सवाल पर हजारों लड़ाइयाँ लड़ चुके समाज के मनोमस्तिष्क मे।
इसे चेतावनी समझिए कि ये अब भी हो रहा है। जी हाँ अभी भी हो रहा है। हम कितने मुर्दा समाज हो चुके हैं, ये होना इसकी एक बानगी भर है। ज्योति सिंह उर्फ दामिनी उर्फ निर्भया के साथ जो हुआ, उसे उसी दर्द और उसी छटपटाहट के साथ व्यक्त करने के लिए मेरा शब्दकोश पूरी तरह रिक्त है। पर उसके अपराधी के साथ जो हुआ, उसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास एक सार्थक, एक सक्रिय और एक बेखौफ आक्रोश है। जिस देश मे कानून का राज है, ये बताते नही थकते व्यवस्था के पहरेदार, उस देश का सर्वशक्तिमान कानून अभी दो दिन पहले तक देश की अदालतों मे अपना सिर धुनकर गुजरा है। शर्म उसे फिर भी नही आती कि न्याय नही हुआ। व्यवस्था और व्यवस्था का कानून दोनों हिजड़े साबित हुए और तब का नाबालिग आज बालिग होकर कानून के फंदे से आज़ाद है। संसदीय नौटंकियाँ भी लगातार जारी हैं। 16 से 18, फिर 18 से 16 के दायरे नाप रही व्यवस्था को शायद पक्का मालूम है कि 15 साल 11 महीने का कोई नाबालिग अब इस कानूनी बदलाव के बाद किसी निर्दोष ज्योति सिंह को वैसे दुर्दांत जख्म नही दे सकता। जो व्यवस्था आज ज्योति के माँ बाप को न्याय देने से भाग खड़ी हुई है, उसके नाम पर लानतें भेजने के अलावा भी तो कुछ पुरुषार्थ हो हमारा। हमने तब भी लिखा था कि मत करना भरोसा। कोई सोनिया गांधी नही दे पाएगी तुम्हें न्याय। क्योंकि न्याय जैसी कोई चीज़ होती ही नही है व्यवस्थाओं के पास। सभ्य समाज जानता है कि न्याय की जरूरत ही न पड़े, तब है आदर्श न्याय की स्थिति।
कोई व्यवस्था किसी विक्टिम को न्याय दे ही नही सकती, ये तो स्थापित तथ्य है, लेकिन समाज.....?? समाज क्या करता है आखिर....?? हम क्या करते हैं, ये कुछ तय किया है कभी...?? एक समाज के रूप मे तुम्हारी क्या भूमिका है विश्व गुरु...?? कानून माना निठल्ला है, व्यवस्था माना नपुंसक है, लेकिन तुम जवाब दो अब ज्योति का हत्यारा अफ़रोज कहाँ है....! आखिर कहीं तो होगा ही, लोगों के बीच ही होगा, कितना भी रहस्यमय अंदाज हो व्यवस्था का, छोड़ा तो धरती पर ही होगा, हिंदुस्तान मे ही होगा। फिर वो कौन लोग हैं जिनकी खाल इतनी मोटी हो चुकी है कि उन्हे एक पगलाई-पगलाई फिरती माँ की आँखों का बेबस खून नही दिखता...? कौन हैं वे लोग जो ज्योति की हालत से विकल नही हुए थे...? कौन हैं वे लोग जिन्हे बेटी को न्याय दिलाने की झूठी लड़ाई मे फंसे इन माँ बाप की बेबसी विचलित नही करती...? वे जो लोग भी हैं, क्या उन्हे नही मालूम कि देश मे उस एक अपराधी के लिए कितना आक्रोश है...?? हो चुका न्याय प्रणाली का न्याय..., देखी जा चुकी अदलतों की सीमा..., पूरा हो चुका व्यवस्था का संकल्प। लेकिन ये समाज अभी मरा तो नही है....तो क्यो नही खोजा जा रहा है समाज द्वारा समाज का दुर्दांत अपराधी...? खोजिए उसे, पकड़िए उसे, देश का वृहत्तर समाज तय करे कि उसका क्या किया जाना है...! कानून का पंचायत राज भी अभी लागू है देश मे। पंचायत के फैसले वैधानिक भी होते हैं। देश अगर जिंदा है, जिंदा लोगों का है तो इतनी बड़ी बेरहमी और इतनी बड़ी विडम्बना को पचा के कैसे जी पा रहे हैं हम...? कैसे आगे जी पाएंगे...? और बेटियों को कौन सा मुंह दिखाएंगे...? कबतक इस देश की माँएं गंगा घाटों से खाली हाथ वापस लौटती रहेंगी...? किसने छिपा रखा है अफ़रोज को........?????????????????
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