Thursday, 31 December 2015

घर और ऑफिस

घर घर है। घर ऑफिस नही है। घर को ऑफिस मत बनाइये। घर आइये तो ऑफिस का भूत लेकर मत आइये। ऑफिस के रूल्स और रेग्यूलेशन्स घर मे बच्चों पर मत लागू कीजिये। ये आपका फ्रस्ट्रेशन है केवल। वैसे ये आपकी अपनी खुशी कि आप ऑफिस का कितना प्रेशर लेकर घर मे जी रहे हैं। क्योंकि आप ये समझ तो पा नही रहे हैं कि इससे नुकसान कितना हो रहा है। अब ऑफिस के प्रेत-प्रभाव मे आप बच्चों से, दोस्तों से, संबंधियों से जो एक्यूरेसी चाहते हैं, वह संभव ही नही है। ऑफिस फाइलों के सहारे चलती है, जबकि घर रिश्तों के सहारेचलता है। घर मे स्मृतियाँ होती हैं, परम्पराएँ होती हैं, उम्मीदें होती हैं, सपने होते हैं, प्रेम होता है और शांति होती है। ऑफिस मे रिकॉर्ड्स होते हैं, नियम होते हैं, प्लान होते हैं, टारगेट्स होते हैं, प्रोफेशन होते हैं, रिजल्ट्स होते हैं और अशांति होती है। शराब पीकर अगर ऑफिस आए तो आपको पनिशमेंट मिलेगा लेकिन शराब पीकर घर आएंगे तो दरवाजे पर ही खड़ी चिंता मिलेगी। ऑफिस अक्षम, अनपढ़, कमजोर या गुंडा, अपराधी के लिए अपने पास जगह नही रखती पर घर इन सबको समेट लेता है, घर मे इन सबकी गुजर हो जाती है। ऑफिस के प्रेशर अलग, ज़िंदगी के प्रेशर अलग....घर, ऑफिस दोनों को गड्डमड्ड कर रहे हैं आप। यह सही है कि ज़िंदगी मे ऑफिस एक उम्र के बाद आती है लेकिन यह भी तो सही है कि ज़िंदगी मे घर ऑफिस के बाद भी रहता है। घर देर तक रहता है ज़िंदगी मे इसलिए ज़िंदगी को भी देर तक रहना चाहिए घर मे। ऑफिस आपको सिखाता है कि ये जो इंसानी इकाई है, अगर वह पैसा नही बनाता है तो उसका होना व्यर्थ है। जबकि घर आपको सिखाता है कि अगर पैसा नही बनाते हैं तो भी आप इंसानी इकाई हैं। घर ज़िंदगी है यार...और ऑफिस ज़िंदगी का जरिया मात्र। ऑफिस को घर पर सवार मत होने दो, वरना ज़िंदगी फिर संकटों मे घिर जाएगी। ऑफिस का रोबोट अगर घर मे भी रोबोट ही बना रहे तो रोबोट ही रोबोट हो जाएँगे चारो तरफ। इंसान कम हो जाएँगे तो ज़िंदगी भी कम हो जाएगी। सभ्यताओं के मशीन बनाते जाने के अपने ही खतरे होते हैं। याद रखिए रिश्ते तभी तक रिश्ते होते हैं, जबतक उनमे गर्मी होती है। रिश्तों के बीच जैसे-जैसे नियम दाखिल होने लगते हैं, वैसे-वैसे ये गर्मी कम होने लगती है। नियम और शर्तें जितनी ही बढ़ेंगी, रिश्ते और रिश्तों की गर्मी उतनी ही घटेगी और जब रिश्तों की गर्मी घटेगी तब हममे बाजारूपन बढ़ेगा। इसलिए गहराई से सोचिए तो घर भी बाजार के ही हवाले है।.... और ऑफिस की जरूरत बाजार को ही है, घर को भला ऑफिस कि क्या जरूरत...!

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