आप पढ़ते-पढ़ते थक जाएंगे लेकिन हम लिखते-लिखते नही थकेंगे। देश की व्यवस्था जनविरोधी है। हमारी व्यवस्था धीरे-धीरे एनजीओज़ की शक्ल मे ढाली जा रही है। अगर यही मान लें कि जापान से फंडर आया था फंड देने से पहले साइट देखने तो कल शिंजों के सामने मोदी एकदम फिसड्डी साबित हुए, केवल भीख पाएंगे और कुछ नही मिलेगा यह भी तय है। सशर्त अनुदान हो या इतनी बड़ी कीमत पर सहयोग मिले भीख ही तो कहलाता है। इस आस्था-यात्रा के समानान्तर जापान से एक धमकी भी जारी हुई है कि भारत का परमाणु कार्यक्रम जापान की शर्तों के नीचे चलेगा, वरना भीख वापस मांग ली जाएगी। मोदी अपनी चुस्ती-फुर्ती से दिखाना चाहते हैं कि लोग उन्हे तेज तर्रार भी मान लें। बनारस मे वणिक मोदी नही दिखे, धार्मिक मोदी ज्यादा दिखे जिसकी चेतना मे कर्मकांड ज्यादा है, विकास की तो परछाई ही नही दिखी कल की वाराणसी-यात्रा मे। शिंजों अबे के निजी संस्कार भी बौद्ध हैं, सरकारी संस्कार भी बौद्ध हैं। यहाँ सारनाथ के पूरे बौद्ध-परिसर मे भी स्वागत और सुरक्षा की वैसी ही और उतनी ही तैयारी की गयी थी, जितनी और जैसी दो राष्ट्राध्यक्षों के लिए होनी चाहिए। प्रसिद्ध जापानी मंदिर के तो कहने क्या...! दुल्हन की तरह सजा था मंदिर और तीर्थ जैसा सजा था सारनाथ। एक से एक बौद्ध भिक्षु और समाज के गणमान्य लोग इंतज़ार ही करते रह गए लेकिन अंतिम समय मे शिंजों अबे ने वह पूरा कार्यक्रम ही रद्द करके साफ संदेश दिया कि वे कितने धार्मिक हैं। ये मानने मे कोई हर्ज भी नही होगा कि जापान ने कोई आरती गाकर अपनी तरक्की नहीं हासिल की है।
अगर बनारस को समझाना ही उद्देश्य था तो बेहतर होता कि अबे को बीएचयू ले जाते, डीएलडबल्यू ले जाते। देश की अभियात्रिक तरक्की के नमूने दिखाते। बनारस के इतिहास से परिचित कराने के लिए अबे को सारनाथ तो हर हाल मे ले जाते। ट्रोमा सेंटर ही दिखाते....कुछ भी दिखाते पर बनारस दिखाते। भले नही बनाया हो पर अधिकतर बनारस वाले ट्रोमा सेंटर को भी मोदी का बनवाया हुआ ही मानते हैं। हाँ, ये जरूर है कि महामना का बीएचयू और भारत सरकार का डीएलडबल्यू दिखाते तो भारत और बनारस की असली ताकत दिखती लेकिन इसमे दिक्कत इतनी थी कि इसका श्रेय मोदी चाहकर भी नही ले पाते। इसलिए वो उन्हे वहसब दिखाने ले गए, जिसका होना ही अपने आप मे एक चुटकुला है। न जाने क्यो होती है ये आरती...? गंगा की ज़िंदगी बचाने के लिए क्या क्या किया जा सकता है, इसका जवाब जानकारों के पास है और वेतन देकर सरकार जानकारों को विश्वविद्यालयों मे रखती है। अबे आरती मे शामिल हुए और उतनी देर की उनकी शारीरिक मुद्राओं को भारत की सफलता की तरह पेश किया गया। अबे ने टीका लगवाया। अबे ने हाथ उठाया। अबे ने हाथ जोड़े। ये सब सरकारी उपलब्धियों मे शामिल है। लेकिन ये किसी ने नही कहा कि बनारस मे आकर भी बौद्धों के तीर्थ सारनाथ न जाने का फैसला करके शिंजों अबे ने भारत को अपना वह चेहरा दिखाया जिसपर जापान जैसे देश का पीएम होने के बावजूद 45 मिनट तक किसी सड़ांध से उमसती सीवर ढोती नदी के किनारे किसी आरती पूजन के कर्मकांड मे बैठने की खीझ भी थी। जी हाँ ये खीझ ही थी क्योंकि वे जापान से हैं और क्योंकि वे बुलेट ट्रेन चलाते हैं। कल सबकुछ योजनाबद्ध नही था, सब कुछ सोची समझी रणनीति के तहत नही था, जो कुछ भी था, सब आवेग मे हुआ। इधर आज बनारस के अखबारों ने अपने बड़े बड़े पेजों पर सरकारी वैभव की कहानियाँ और मोदी-अबे के मेन्यू छापे हैं।
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