सलमान खान के मामले मे व्यवस्था पूरी तरह गुंडई पर उतरी हुई है। सबके सामने प्रत्यक्ष तौर पर कानून जेब मे लेकर घूमेंगे, जो करना हो, कर लो। मुंबई हाई कोर्ट की टिप्पणी है कि आम जनमत क्या है, कानून के फैसले इस आधार पर नही होते। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने मे नाकाम रहा कि दुर्घटना के समय सलमान ने शराब पी रखी थी और वही गाड़ी चला रहे थे। अब सवाल ये है कि निचली अदालत के वे कौन से सबूत थे, जिनको मजबूत साक्ष्य मानकर उसने पाँच साल की सजा सुनाई थी...? अब तो वह गलत हो गयी। अगर निचली अदालत ने कमजोर और संदेहास्पद साक्ष्यों के आधार पर किसी निर्दोष नागरिक को पाँच साल की गलत सजा सुनाई थी तो उसने एक व्यक्ति के सम्मान का मान-मर्दन किया था और इस तरह संविधान भंग किया है। उन जजों को क्या सजा दी जाएगी...? दोनों अदालतों मे से कोई एक ही सही हो सकती है। किसी एक अदालत ने तो गलत निर्णय दिया है। बिलकुल हो सकता है कि सूप्रीम कोर्ट मे यह मामला फिर पलट जाय और आम जनमत जो मानता है, वही कोर्ट भी मान ले और सलमान खान को संजय दत्त की तरह पूरी सख्ती से जेल भेजा जाय। वैसे मे फिर हाई कोर्ट की समझ का क्या होगा...? यह वह समझ होती है, जो तय करती है कि साक्ष्य मजबूत है या कमजोर...? आम धारणा के ऊपर कोर्ट की टिप्पणी अनावश्यक है क्योंकि इलाहाब्द हाई कोर्ट का अयोध्या मामले मे फैसला हम सबके सामने है जिसमे जनमत का प्रभाव स्पष्ट है। विवाद से जुड़े हर पक्ष को चुप करने की कोशिश हुई, कोई निर्णय नही हुआ। मामले को स्वीकार करते समय सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि कोर्ट को विवादित जमीन का मालिकाना हक़ तय करना चाहिए था। जमीन को बांटना उसका काम नही है। जनमत के भय से सत्ता का कोई प्रतिष्ठान अछूता नही है, फिर भी जनमत अनदेखा इसलिए हो रहा है क्योंकि जनमत अपने रसूख और प्रभाव के लिए खुद गंभीर नही है। पूरी न्याय प्रक्रिया मे अन्याय के अंधेरे इतने घने हैं कि आप सबकुछ देख ही नही सकते। कहाँ कौन क्या छिपा रहा है, जनमत क्या जानता है भला। आज भी अङ्ग्रेज़ी भाषा हमारी कानूनी भाषा है।
अंधेर नगरी चौपट राजा। टके सेर भाजी टके सेर खाजा।
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