Saturday, 19 March 2016

12 फरवरी 1948


गांधी को गए 13 दिन हो चुके। ये उनके तेरहवें का दिन है। इस सभा मे जुटे हैं वे सभी, जिन्हे 2 फरवरी को गांधी ने यहीं बुलाया था। सेवाग्राम। लेकिन इसके पहले ही 30 जनवरी आ गयी। कहते हैं तीन गोलियों ने आगे बढ़ते गांधी को रोक लिया था। ये नही कहते कि गांधी को गोलियों ने नही, तीन घातक गोलियों को गांधी ने अपने सीने पर रोक लिया था। आखिर सत्य क्या है...? क्या गांधी के काम को उनको मारने वाले ने रोक थामा...? या फिर तीन गोलियों ने एक मनुष्य को देवत्व प्रदान कर दिया...? जो भी हो, गांधी तो गए....और अब क्या....?
ठीक एक महीने बाद उसी सेवाग्राम मे 13 मार्च 1948 को एक बार फिर जुटे हैं कुछ लोग, कुछ स्त्रियाँ, कुछ पुरुष। राजधानी से आए प्रधानमंत्री नेहरू। उनके साथ शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद। सभा की अध्यक्षता करने डॉ राजेन्द्र प्रसाद, व्यंग्य शिरोमणि आचार्य कृपलानी, मतभेदी जेसी कुमारप्पा, कोमल मन जय प्रकाश और सबसे ऊपर अनूठी आभा बिखेरते विनोबा। विषय वही है कि गांधी तो गए...और अब...? जब भी शंकाओं ने घेरा, हम बापू के पास दौड़े आते थे। अब बापू नही रहे, तो किसकी ओर देखें...? क्या करें...?यह आत्म परीक्षा पाँच दिन की। दस सत्रों मे विहंगम अवलोकन; देश का, समाज का, राजनीति का, रचना का, भविष्य का, वर्तमान का। सभी अपने खयाल साफ़गोई से रखते हैं। अगर आलोचना करते हैं तो अपनी भी करते हैं और सबको सत्य की तराजू पर तौलते हैं। उसको भी तौलते हैं, जिसे अभी छः हफ्तों पहले कुर्बान होते देखा है। सरदार वल्लभ भाई पटेल सभा के केंद्र विंदु हैं। गांधी की तहों मे लिपटे कुछ विशेष जन नही आ सके हैं। आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया, निर्मल बोस, सरोजिनी नायडू और चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य के न आ पाने से सभा गरीब लग रही है। सभी जानते हैं कि जिस सभा मे वे जुड़े हैं, उसे गांधी ने ही बुलाया था, उन्ही का कल्पित और रचित यह आयोजन सितारों से जड़े उस आसमान की तरह लगता है, जिसका चंद्रमा गायब है।
सभा के सामने प्रश्न है कि गांधी ने जिन रचनात्मक संस्थाओं का निर्माण किया और जो संस्थाएं उनसे प्रेरित होकर काम कर रही हैं, अब उनका क्या हो...? एक नयी ऊर्जा की जरूरत है। नेहरू ने एक उर्दू लफ्ज बोला है, जिसका अङ्ग्रेज़ी अनुवाद मुश्किल है। एक नयी फ़िज़ा चाहिए, वे कहते हैं। कुमारप्पा ये फिजा देखते हैं अहिंसा मे और देश के गरीब गांवों मे। गांधी से ओतप्रोत कुमारप्पा कह रहे हैं कि कॉंग्रेस और दिल्ली की नयी सरकार अब एक हो गयी है; गांधी से दूर, उनके तौर तरीकों से दूर। सदमे से अभी भी उबर नही पाये प्यारेलाल सभा को आखिरी वसीयतनामे की याद दिलाते हैं, जिसमे गांधी ने कहा था- कॉंग्रेस को अब खत्म हो जाना चाहिए। उसका काम पूरा हो चुका। लोकसेवकों का एक राष्ट्रीय संघ बने, जो गाँव गाँव मे फैल जाय और लोक की सेवा करे। कॉंग्रेस गांधी का यह सुझाव पहले ही रद्द कर चुकी है। गांधी के राजनैतिक और गैरराजनैतिक वारिस इन विकल्पों पर विचार करते हैं। विनोबा कह रहे हैं--एक भाईचारा बने, जिसमे हर वह आदमी शामिल हो जिसे गांधी का रास्ता अनुकरणीय लगता है। बात से बात निकलती है। बहस मे बहस जुड़ती है। फिर आकार लेता है एक व्यापक भाईचारा 'सर्वोदय समाज'। कुछ शाब्दिक सुधार हो रहे हैं। एक संगठन भी आकार ले रहा है 'अखिल भारत सर्व सेवा संघ'। गांधी से प्रेरित, अभिप्रेरित सभी रचनात्मक संस्थाओं का एक मिलापी संघ। विनोबा जी ने कहा कि हमारा लक्ष्य करोड़ों गांधी बनाने का होना चाहिए। विनोबा ने सर्व सेवा संघ को एक दर्शन दिया- थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली। 68 साल बीत गए। सर्व सेवा संघ ने वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक ढांचे के सामने एक विकेंद्रित मॉडल तैयार कर रखा है, जिसमे गांधी के सपनों के देश की रूपरेखा है, जिसमे वास्तविक सत्ता ग्राम सभाओं और नगरपालिकाओं को मिले और चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार हो तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्व न्यायोचित हों। यद्यपि करोड़ों गांधी बनाने का कोई प्रयत्न भी किया गया हो, ऐसा दावा तो नही किया जा सकता। पर सर्व सेवा संघ के पास भारत के भविष्य का एक गांधीयन ब्लू प्रिंट जरूर मौजूद है। विकास के रशियन, जापानीज़, चाइनीज़, अमेरिकन और ब्रितानवी मॉडलों को आजमाने मे अबतक व्यस्त रही सरकार को एक बार विकास का गांधीयन मॉडल भी अपनाना चाहिए।

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