राष्ट्रभक्ति का नया खोमचा जेएनयू मे शिफ्ट किया गया है। देश की दो हुतात्माएँ एक दूसरे के सामने ताल ठोंककर खड़ी हैं। मजहब की किताबों मे लिखा हुआ है कि आदमी जब मर जाता है तो आत्माएं जाकर परमात्मा मे मिल जाती हैं, लेकिन एक नाथूराम के बाद अफजल गुरु दूसरे हुतात्मा हुए जिनकी आत्मा को परमात्मा ने धक्के मारकर वापस इंडिया भेजा। परमात्मा सोचते हैं, समझते हैं और भारत की चिंता करते हैं यह बात अब आईने की तरह साफ है। अगर हुतात्माएँ भी परमात्मा मे विलीन होने लगें तो भारत मे देशभक्ति का बाज़ार कैसे चलेगा...? केंद्र की नयी सरकार के पास फिर काम क्या होगा...? परमात्मा को भी देशभक्त भाजपा सरकार और उसकी कामकाजी छवि की चिंता रहती है, इन दो हुतात्माओं का प्राकट्योत्सव देखा तो यह बात मेरी नज़र मे सिद्ध हो गयी। परमात्मा की यह कृपा पाकर केंद्र सरकार का मन देखिये कैसा तो बिरजू बिरजू महराज हुआ जा रहा है। अबतक का नाच देखकर संकेत बिलकुल साफ हैं कि सरकार इस मामले को सुलझाने के मूड मे नही है। गृहमंत्री की देशभक्ति भावना देखी आपने...? हाफ़िज़ सईद का एक फर्जी ट्वीट दिखाकर कह दिया कि जेएनयू मे लश्कर-ए-तैयबा घुस आया है। राजनाथ सिंह की इस भोली मक्कारी पर मुझे दया आई। स्पष्ट है कि गृहमंत्री दिनरात, सुबहशाम भक्ति भाव मे तिरोहित हो चुके हैं वरना उनके गृहमंत्री होते ये तैयबा फैयबा नाक के इतना नीचे भला कैसे घुस पाते और देशपूजा मे इतना खलल डाल पाते। खैर, बाद मे हाफ़िज़ सईद का वास्तविक ट्वीट भी आया, जिसमे उस भावी हुतात्मा ने भारत सरकार की खिल्ली उड़ायी। देखिये न कैसे इस बैठे ठाले आतंकवादी को हमारी देशभक्त सरकार ने भारत के बारे मे गाल बजाने का मौका दे दिया।
राष्ट्रविरोधी नारे इस देश मे यूं तो पहले भी लगते रहे हैं और पाकिस्तानी झंडे भी लहराये जाते रहे हैं। लेकिन ऐसा करने वालों से पुलिस कानून के दायरे मे रहकर निपटती रही है। क्योंकि उद्देश्य तब लगी हुई आग को बुझाना होता था। अभी क्या है कि कश्मीर मे हुतात्मा अफजल के समर्थकों के साथ मिलजुलकर सरकार भी बनानी है और जेएनयू मे अफजल विरोधी राष्ट्रभक्ति मार्का खोमचा भी लगाए रखना है इसलिए पुलिस तो पुलिस, जेएनयू मामले मे न सिर्फ पूरी केंद्र सरकार, बल्कि भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के नामधारी नेता भी इस एक मोर्चे पर उस एक खोमचे के इर्द गिर्द आ डटे हैं। याद रखिएगा लगी हुई आग बुझाई जा सकती है, लेकिन लगाई और फैलाई हुई आग जल्दी नही बुझती। एक सुर मे मच रहे ये कोहराम सुनिए न। सारे छात्र-छात्राएं, सभी अध्यापक, पूरा विश्वविद्यालय और सारे विपक्षी दल सब एक साथ राष्ट्रविरोधी हैं। इनके नारे सुनिए- जो मोदी सरकार के साथ है, केवल वह राष्ट्रभक्त है, बाकी सब देशद्रोही हैं। पुराने लोगों को कुछ याद आया...? इमरजेंसी के दिन याद करिए जब इन्दिरा गांधी को ही राष्ट्र का पर्याय घोषित कर दिया गया था। उन दिनों उनपर भी सवाल उठाने वाले तमाम लोग देशद्रोही मान लिए गए थे। ये वही कोंग्रेसी नुस्खा है। अलबत्ता इन्दिरा को उस निरंकुश मानस तक पहुँचने मे दस बारह साल के सत्ता सुख ने सहारा दिया था। लेकिन अपने मोदी जी को यह निरंकुश मानस पहले ही दिन मिल गया था। ये आलरेडी 'पहुंचे हुए' देशभक्त थे और अभी भी हैं। इसलिए लोकतांत्रिकता और बहुलता की भावनाएं रद्दी की टोकरी मे डाल दी गयी हैं और चूंकि जेएनयू अपनी शुरुआत से ही इन मूल्यों का मुखर प्रतिनिधित्व करने वाला संस्थान रहा है इसलिए उसकी घेरेबंदी की जा रही है। जेएनयू को उग्र राष्ट्रवाद की प्रयोगशाला बनाने का यह खेल भले ही नया लगता हो, लेकिन दक्षिणपंथ का यह सपना बहुत पुराना है। आप चाहें तो एक सवाल पूछ सकते हैं कि मात्र 31 फीसदी वोट लेकर आई सरकार को यह हक़ किसने दिया कि शेष 69 फीसदी देश को देशद्रोही घोषित कर दे।
दरअसल मोदी सरकार के पास गिनाने के लिए कोई एक उपलब्धि भी नही है। इसलिए निगेटिव पॉलिटिक्स के अलावा उसके पास कोई और चारा भी नही बचा है। जिस विकास दर का वह अभीतक ढिंढोरा पीट रही थी, उसपर उसी के लोगों ने सवाल उठा दिये हैं। लगभग हर सात दिन पर एक के अनुपात मे हुई विदेश यात्राओं की आँधी मे अबतक निवेश नाम की भिखमंगई का एक कटोरा भी नही भरा। यह 'आलोकप्रिय' कहे जाने वाले बजट का साल भी है ध्यान रखिएगा। अगले कुछ महीनों मे पाँच विधानसभाओं के चुनाव भी होने हैं। ऐसे मे जनता को ठोस सवालों से हटाकर भावनात्मक चढ़ान और उतरान पर उलझाए रखना भाजपा को आसान समझ मे आता है, इस खेल को जितनी जल्दी समझ लिया जाय, उतना ही अच्छा है।
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